'या तो मैं लहराते तिरंगे के पीछे आऊंगा, या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा'

By रेनू तिवारी | Publish Date: Jul 24 2019 5:39PM
'या तो मैं लहराते तिरंगे के पीछे आऊंगा, या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा'
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कैप्टन विक्रम बत्रा कारिगल के हीरो माने जाते हैं। जब सरहद पर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा उस वक्त कैप्टन विक्रम बत्रा अपने घर हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में छुट्टियों पर थे।

कैप्टन विक्रम बत्रा भारतीय सेना के एक अधिकारी थे, जिन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर में 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वीरता के लिए भारत का सर्वोच्च और सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। कैप्टन विक्रम बत्रा कारिगल के हीरो माने जाते हैं। जब सरहद पर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा उस वक्त कैप्टन विक्रम बत्रा अपने घर हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में छुट्टियों पर थे। एक कैफे में अपने परिवार के साथ थोड़ा वक्त गुजार रहे थे। इसी दौरान परिवार के साथ घर आने की बातचीत पर कैप्टन विक्रम बत्रा ने कहा था कि ‘या तो मैं लहराते तिरंगे के पीछे आऊंगा, या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा। पर मैं आऊंगा जरूर।’ कुछ ही क्षणों बाद सरहद से बुलावा आ गया कि पाकिस्तान से युद्ध छिड़ गया है। इस बात को याद करके आज भी परिवार की आखें नम हो जाती हैं। ये बात विक्रम का मां ने खास बातचीत में कही थी। आप सोच सकते हैं कि विक्रम बत्रा की जुबान में जब इतना जज्बा था तो बाजुएं कितनी फौलादी होगी। कैप्टन विक्रम बत्रा की बाहदुरी के कारनामे केवल भारत में ही नहीं मशहूर हैं बल्कि पाकिस्तान में भी इस फौलादी के किस्से मशहूर थे इसलिए पाकिस्तानी आर्मी उन्हें 'शेरशाह' कहा करती थी।

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर जिले के घुग्‍गर में 9 सितंबर 1974 को कैप्टन विक्रम बत्रा का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपनी माँ से प्राप्त की, जो स्वयं एक शिक्षक थीं। 1996 में विक्रम ने इंडियन मिलिटरी अकादमी में दाखिला लिया। 6 दिसंबर 1997 को कैप्टन बत्रा जम्मू और कश्मीर राइफल्स की 13वीं बटालियन में बतौर लेफ्टिनेंट शामिल हुए। दो साल बाद ही उन्हें प्रमोट कर कैप्टन रैंक दी गई।

कैप्टन विक्रम बत्रा ने कारगिल युद्ध में पांच सबसे इंपॉर्टेंट पॉइंट जीतने में अहम रोल निभाया था। कहते हैं कि ऊपर से नीचे गोलियां चलाना आसान होता है। पाकिस्तानी घुसपैठिये टाइगर हिल पर कब्जा करके बैठे थे और नीचे भारतीय सेना पर लगातार फायरिंग कर रहे थे ऐसे में योजना बनाई गई टाइगर हिल पर चढ़ने की। पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए पांच इंपॉर्टेंट पॉइंट को जीतना बेहत जरूरी था। कैप्टन विक्रम बत्रा ने हर पॉइंट जीतने में मदद दी। सबसे पहले तो अपने साथियों के साथ विक्रम बत्रा ने घुसपैठियों से प्वांइट 5140 छीन लिया था। उनके बाद वह पॉइंट 4875 से पाकिस्तानी घुसपैठियों को पीछे हटाने चल दिए। इस पॉइंट की चढ़ाई बहुत कठिन थी। यह पॉइंट 17 हजार फीट की ऊंचाई पर था और 80 डिग्री की चढ़ाई पर पड़ता था। कारगिल युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा अपने एक साथी को बचाते-बचाते शहीद हो गये। कहते हैं कि दुश्मनों की गोलीबारी के दौरान उन्होंने अपने साथी से अंतिम शब्दों में यह कहा था कि 'तुम हट जाओ। तुम्हारे बीवी-बच्चे हैं।’ 


कारगिल युद्ध में उनके जिंदा बचे एक साथी नवीन ने बताया था कि अचानक एक बम उनके पास अकर गिरा और एक पल में फट गया जिस विस्फोट में मैं बुरी तरह घायल हो गया था। लेकिन अचानक कैप्टन विक्रम बत्रा ने आकर मुझे वहां से तुरंत हटा दिया। जिससे मेरी जान बच गई। लेकिन जैसी ही कैप्टन दूसरे साथी को बचाने के लिए आगे बढ़े, लगातार बमबारी में जिसमें दूसरे ऑफिसर को बचाते हुए उनकी जान चली गई।
 
कारगिल युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा से जुड़े एक वाकये को उनके साथी ने शेयर करते हुए कहा कि जब भी बत्रा गोलियों से दुश्मनों को भून देते थे तो वह कहते 'ये दिल मांगे मोर'। साथी ने आगे बताया कि पाकिस्तानी आर्मी लगातार गोलियां और बम बरसा रही थी ऐसे में उन्होंने भारतीय सेना को चिढ़ाते हुए कहा कि ‘हमें माधुरी दीक्षित दे दो। हम नरमदिल हो जाएंगे।'  इसके जवाब में AK-47 लेकर कैप्टन विक्रम बत्रा ने मुस्कुराते हुए कई पाकिस्तानी सेनिकों पर ताबड़तोड़ फायरिंग की और कहा कि ‘लो माधुरी दीक्षित के प्यार के साथ’ उनकी गोलियों से कई पाकिस्तानी सैनिक ढेर हो गये। कैप्टन विक्रम बत्रा भारत के वीर थे। उनकी बहादुरी और योजना ने कारगिल युद्ध को जीतने में अहम योगदान दिया था। कैप्टन विक्रम बत्रा को लेकर उस समय के इंडियन आर्मी चीफ ने खुद कहा था कि अगर वो जिंदा वापस आता, तो इंडियन आर्मी का हेड बन गया होता।
 


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