Prabhasakshi NewsRoom: Netanyahu को PM बनने से रोकने के लिए अरब दलों ने बिना शर्त दे दिया विपक्ष को समर्थन, सत्ता का पूरा गणित गड़बड़ाया

साथ ही इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेतन्याहू को राजनीतिक मुकाबले से बाहर करने की कोशिश करने वाला विपक्ष भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सका। दूसरी ओर, नेतन्याहू का गठबंधन पिछली बार की 64 सीटों वाली स्थिति से नीचे आ गया है।
इजराइल के चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, लेकिन यह चुनाव उन्हें स्पष्ट संसदीय बहुमत दिलाने में सफल नहीं हुआ है। 27 अक्टूबर को हुए मतदान के बाद 29 अक्टूबर की सुबह तक सामने आए नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि नेतन्याहू के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों का गठबंधन 53 सीटों पर पहुंचता दिखाई दे रहा है, जबकि उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब दलों की संयुक्त ताकत 19 सीटों तक पहुंचने से सरकार गठन का पूरा गणित बदल गया है। हम आपको बता दें कि इजराइल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं।
साथ ही इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेतन्याहू को राजनीतिक मुकाबले से बाहर करने की कोशिश करने वाला विपक्ष भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सका। दूसरी ओर, नेतन्याहू का गठबंधन पिछली बार की 64 सीटों वाली स्थिति से नीचे आ गया है। इस बार के चुनाव परिणामों की 2022 के चुनाव से तुलना करें तो अंतर साफ दिखाई देता है। उस चुनाव में लिकुड को 32 सीटें और नेतन्याहू के गठबंधन को 64 सीटें मिली थीं। इस बार लिकुड छह सीटें नीचे और उनका गठबंधन 11 सीटें नीचे दिखाई दे रहा है। दूसरी तरफ, इस बार मतदान लगभग 77.7 प्रतिशत रहा, जबकि 2022 में यह 70.6 प्रतिशत था। यानी मतदान में लगभग 7.1 प्रतिशत अंक की वृद्धि दर्ज हुई।
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साथ ही नेतन्याहू के चुनावी प्रदर्शन का आकलन करते समय दो पहलुओं को अलग रखना जरूरी है। लिकुड का सबसे बड़ी पार्टी बनना उनके लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि है। लेकिन सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत हासिल नहीं होना उनके सामने वास्तविक चुनौती है। देखा जाये तो यही इस चुनाव का विरोधाभास है। नेतन्याहू के विरोधियों को उन्हें सत्ता से हटाने का स्पष्ट जनादेश नहीं मिला, लेकिन नेतन्याहू को भी पिछली बार जैसा बहुमत नहीं मिला। इसलिए उनकी राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह मजबूत या कमजोर बताने के बजाय यह कहना अधिक सटीक होगा कि वह सत्ता की दौड़ में बने हुए हैं, लेकिन उन्हें नई सरकार बनाने के लिए राजनीतिक समीकरण साधने होंगे।
दूसरी ओर, चुनाव के बाद अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए नेतन्याहू ने एक मजबूत दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सरकार बनाने का आह्वान किया। उन्होंने इजराइल की सैन्य उपलब्धियों और ईरान से जुड़े खतरे को अपने राजनीतिक संदेश का केंद्र बनाया। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मिलकर ईरान के अस्तित्वगत खतरे को समाप्त करने की आवश्यकता भी जताई। हम आपको यह भी बता दें कि 28 अक्टूबर की रात नेतन्याहू ने अपने दक्षिणपंथी सहयोगियों इतामार बेन-ग्विर और बेजालेल स्मोट्रिच से भी बातचीत की। द टाइम्स ऑफ इजराइल ने इजराइली मीडिया के हवाले से बताया कि उन्होंने अपने सहयोगियों को आश्वस्त किया कि गठबंधन एकजुट रहेगा। चैनल 14 के हवाले से जारी बयान में कहा गया, “हम साथ हैं और साथ ही रहेंगे।”
देखा जाये तो यह संकेत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकार गठन के लिए एक विकल्प व्यापक राष्ट्रीय एकता सरकार का भी है। यदि नेतन्याहू अपने मौजूदा दक्षिणपंथी और धार्मिक सहयोगियों को नहीं छोड़ते, तो उन्हें बहुमत तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा। दूसरी तरफ, यदि वे विपक्षी दलों के साथ समझौते की दिशा में बढ़ते हैं, तो अपने पारंपरिक सहयोगियों के साथ टकराव का जोखिम रहेगा।
इसके अलावा, इजराइली अखबारों में छपे विश्लेषणों को देखतें तो The Times of Israel, The Jerusalem Post और Ynet News की ताजा रिपोर्टों में तीन प्रमुख मुद्दे सामने आए हैं। पहला, नेतन्याहू के गठबंधन की बढ़त के बावजूद 61 सीटों का बहुमत न मिलना। दूसरा, अरब दलों का संयुक्त रूप से 19 सीटों तक पहुंचना। तीसरा, विपक्ष के भीतर इस बात पर मतभेद कि अरब दलों के समर्थन से सरकार बनाई जाए या किसी व्यापक राष्ट्रीय एकता समझौते की संभावना तलाश की जाए।
Le Monde ने इजराइली मीडिया की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि विपक्ष को चुनाव के बाद कठिन राजनीतिक वास्तविकता का सामना करना पड़ रहा है। शुरुआती एग्जिट पोल में आइजेनकोट का खेमा बेहतर स्थिति में दिखाई दिया था, लेकिन बाद की मतगणना ने तस्वीर बदल दी। अखबार ने यह भी रेखांकित किया कि इजराइल में मतदान का दिन चुनाव अभियान का अंत भर नहीं होता; उसके बाद गठबंधन वार्ता, संभावित समझौते और राजनीतिक पुनर्संयोजन की प्रक्रिया शुरू होती है।
इसका अर्थ यह है कि मतगणना में आगे रहने वाला खेमा जरूरी नहीं कि सरकार भी बना ले। इजराइल की संसदीय प्रणाली में राष्ट्रपति दलों से परामर्श के बाद उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके पास आवश्यक समर्थन जुटाने की संभावना हो। साथ ही इस चुनाव में अरब दलों का प्रदर्शन सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक है। जॉइंट लिस्ट और रा'म की संयुक्त 19 सीटें उन्हें सरकार गठन की बातचीत में प्रभावशाली स्थिति में ला सकती हैं। यदि 48 सीटों वाला विपक्षी खेमा इन दलों का समर्थन प्राप्त कर ले, तो दोनों की कुल संख्या 67 हो जाती है जो बहुमत के आंकड़े से अधिक है।
लेकिन यह गणित अपने आप में सरकार बनने की गारंटी नहीं है। विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने अरब दलों के समर्थन पर निर्भर सरकार बनाने को लेकर आपत्ति जताई है। दूसरी ओर, जॉइंट लिस्ट के नेता यूसुफ जबारीन और सांसद अहमद तिबी ने नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए सहयोग की इच्छा जताई है। तिबी ने संकेत दिया कि उनकी पार्टी सरकार में औपचारिक रूप से शामिल हुए बिना भी समर्थन देने पर विचार कर सकती है।
इसलिए विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीटों की कमी से अधिक राजनीतिक सहमति की कमी है। सवाल यह है कि क्या आइजेनकोट अपने सहयोगियों को अरब दलों के समर्थन के लिए तैयार कर पाएंगे? क्या विपक्षी दल किसी वैकल्पिक व्यवस्था पर सहमत होंगे? इन्हीं सवालों के उत्तर से तय होगा कि नेतन्याहू को चुनौती देने वाला खेमा वास्तविक सत्ता विकल्प बन पाता है या नहीं।
इस बीच, इजराइल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे एक और चुनाव से बचने के लिए खुले मन से बातचीत करें। उनका संदेश इस बात का संकेत है कि मौजूदा राजनीतिक गतिरोध को खत्म करना संस्थागत प्राथमिकता बन गया है।
हम आपको एक बार फिर बता दें कि इजराइल में दोहरे लिफाफे वाले मतों की गिनती जारी है और आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक अंतिम परिणाम 4 नवंबर तक प्रकाशित किए जाने हैं। अंतिम नतीजों के बाद राष्ट्रपति हर्जोग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से परामर्श करेंगे और सरकार बनाने के लिए उम्मीदवार तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। तब तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। यदि कोई खेमा बहुमत जुटाने में सफल नहीं होता, तो राष्ट्रीय एकता सरकार, अल्पमत सरकार या फिर नए चुनाव की संभावना बनी रह सकती है। वैसे अब तक नियमित मतदान केंद्रों के अधिकांश मतों की गिनती पूरी हो चुकी है। हालांकि, सैनिकों, अस्पतालों में भर्ती लोगों, कैदियों और अन्य पात्र मतदाताओं के दोहरे लिफाफे वाले मतों की गिनती जारी है।
बहरहाल, फिलहाल यह कहा जा सकता है कि इस चुनाव ने नेतन्याहू को सत्ता की दौड़ से बाहर नहीं किया, लेकिन उन्हें 2022 जैसा स्पष्ट संसदीय जनादेश भी नहीं दिया। लिकुड सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, विपक्ष के पास अरब दलों के साथ संभावित बहुमत का गणित है और अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर है कि इजराइल अगली सरकार कैसे बनाता है। फिलहाल निर्णायक लड़ाई मतगणना से आगे बढ़कर गठबंधन की राजनीति में प्रवेश कर चुकी है।
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