Gyan Ganga: भगवान ने अर्जुन को पहले विश्वरूप, फिर चतुर्भुज रूप और फिर द्विभुज रूप दिखाया

Gyan Ganga: भगवान ने अर्जुन को पहले विश्वरूप, फिर चतुर्भुज रूप और फिर द्विभुज रूप दिखाया

भगवान ने अपने भक्तों को बहुत छूट दे रखी है, कहते हैं, हे अर्जुन यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो तो केवल मेरे प्रति शास्त्रानुकूल शुभ कर्म करो। तुम कर्मों को करता हुआ भी सिद्धि अर्थात् उद्देश्य को प्राप्त हो जाओगे।

भगवान गीता के उपदेश में अर्जुन को समझाते हैं—

जीवन वो फूल है, जिसमें काँटे तो बहुत हैं, मगर सौन्दर्य की भी कोई कमी नहीं है। आइए ! अपनी जिंदगी में सौन्दर्य की तलाश अभी से ही शुरू कर दें।

आइए ! आगे के गीता प्रसंग में चलते हैं—

पिछले अंक में हमने पढ़ा कि, भगवान अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं- तुम मेरे इस विकराल रूप को देखकर न तो अधिक विचलित हो, और न ही मोहग्रस्त हो, अब तू पुन: सभी चिन्ताओं से मुक्त होकर प्रसन्न-चित्त से मेरे इस चतुर्भुज रूप को देखो। 

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अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।

इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥

भगवान के सौम्य स्वरूप के दर्शन कर अर्जुन ने कहा- हे जनार्दन! आपके इस अत्यन्त सुन्दर मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिर चित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ। देखिए! अर्जुन पर भगवान की कितनी अद्भुत कृपा है, भगवान ने पहले विश्वरूप दिखाया, उसके बाद चतुर्भुज रूप दिखाया और फिर द्विभुज मनुष्य रूप दिखाया। 

श्रीभगवानुवाच

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।

देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्‍क्षिणः ॥

श्री भगवान ने कहा- मेरा जो चतुर्भज रूप तुमने देखा है, उसे देख पाना अत्यन्त दुर्लभ है देवता भी इस शाश्वत रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यद्यपि देवताओं का शरीर दिव्य होता है परंतु भगवान का शरीर उससे भी विलक्षण होता है। भगवान का शरीर सत-चित-आनंदमय, अलौकिक और अत्यंत दिव्य होता है, इसलिए देवता भी भगवान को देखने के लिए तरसते रहते हैं। 

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।

शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा ॥

मेरे इस चतुर्भुज रूप को जिसको तुमने देखा है इस रूप को न वेदों के अध्यन से, न तपस्या से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जाना संभव है।

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥

हे परन्तप अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही मेरा साक्षात दर्शन किया जा सकता है, वास्तविक स्वरूप को जाना जा सकता है और इसी विधि से मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता है। यहाँ भगवान ने भगवत प्राप्ति में भक्ति को ही सर्वोपरि बताया। ज्ञान और भक्ति दोनों ही संसार का दुख दूर करने में समान हैं, परंतु ज्ञान की अपेक्षा भक्ति की महिमा अधिक है। ज्ञान में अखंड रस की प्राप्ति होती है, पर भक्ति में अनंत रस की प्राप्ति होती है। ज्ञान भगवान तक पहुंचे या न पहुंचे, पर भक्ति भगवान तक नि:संदेह पहुँचती है।

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भगवान ज्ञान के भूखे नहीं बल्कि भक्ति और प्रेम के भूखे होते हैं। मोक्ष प्राप्त होने पर ज्ञानी संतुष्ट हो जाता है, पर भक्ति प्राप्त होने पर भक्त संतुष्ट नहीं होता बल्कि उसका भक्ति प्रेम और बढ़ता जाता है। अत: आखिरी तत्व भक्ति है, मुक्ति नहीं।  

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः ।

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं- हे पाण्डुपुत्र ! जो मनुष्य केवल मेरी शरण होकर मेरे लिए ही सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करता है, मेरी भक्ति में स्थित रहता है, सभी कामनाओं से मुक्त रहता है और समस्त प्राणियों से मैत्रीभाव रखता है, वह मनुष्य निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करता है। कहने का भाव यह है कि मनुष्य को अपनी चिंतन शक्ति भगवान के सिवाय दूसरी जगह नहीं खर्च करनी चाहिए। चिंतन करे तो केवल भगवान का और दर्शन करे तो केवल भगवत स्वरूप का। 

श्रीभगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन! जो भक्त श्रद्धा पूर्वक मुझमें मन लगाकर निरंतर मेरी (सगुणोपासना) उपासना करता है, उसको मैं सर्व श्रेष्ठ योगी मानता हूँ। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मन लगता है और जहाँ श्रद्धा होती है वहाँ बुद्धि लगती है। एक मात्र भगवान में प्रेम और श्रद्धा होने से भगवान के साथ निरंतर संबंध का अनुभव होता है, इसलिए भगवान ऐसे भक्त को श्रेष्ठ भक्त मानते हैं। 

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।

सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌ ॥

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥

भगवान कहते है— जो अपनी समस्त इंद्रियों को वश में कर, निर्विकार और अचल भाव से मेरे अव्यक्त अर्थात निर्गुण और निराकार रूप की उपासना करते हैं, वह मनुष्य भी सभी परिस्थितियों में समान भाव से और सभी प्राणियों के हित में लगे रहकर मुझे ही प्राप्त होते हैं।

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌ ।

अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥

निर्गुण उपासना का मार्ग कठिन है, यह बताते हुए भगवान कहते हैं, कि आसक्त मन वाले मनुष्यों को निराकार स्वरूप के जरिये परमात्मा की प्राप्ति अत्यधिक कष्ट पूर्ण होती है क्योंकि जब तक शरीर द्वारा कर्तापन का भाव रहता है तब तक अव्यक्त परमात्मा की प्राप्ति दुखप्रद होती है। (५)

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः ।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ ।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥

भगवान श्रीकृष्ण का कथन है- हे पार्थ ! जो मनुष्य अपने सभी कर्मों को मुझमें अर्पण करके और मेरे परायण होकर मेरा ध्यान करते हैं, मैं मृत्यु रूपी संसार सागर से उनका शीघ्र ही उद्धार कर देता हूँ।

मयि, एव, मनः, आधत्स्व, मयि, बुद्धिम् निवेशय,

निवसिष्यसि, मयि, एव, अतः, ऊध्र्वम्, न, संशयः।।

भगवान कहते हैं- इसलिए तुम मुझमें ही अपने मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा इसमें थोड़ा भी संदेह नहीं है।

अथ, चित्तम्, समाधातुम्, न, शक्नोषि, मयि, स्थिरम्,

अभ्यासयोगेन, ततः, माम्, इच्छ, आप्तुम्, धनंजय।।

यदि तू अपने मनको मुझमें अचल स्थापन करने में समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! अभ्यास रूप योग के द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर।

अभ्यासे, अपि, असमर्थः, असि, मत्कर्मपरमः, भव,

मदर्थम्, अपि, कर्माणि, कुर्वन्, सिद्धिम्, अवाप्स्यसि।।

भगवान ने अपने भक्तों को बहुत छूट दे रखी है, कहते हैं, हे अर्जुन यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो तो केवल मेरे प्रति शास्त्रानुकूल शुभ कर्म करो। तुम कर्मों को करता हुआ भी सिद्धि अर्थात् उद्देश्य को प्राप्त हो जाओगे। 

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌ ॥

यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग करो।

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते ।

ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌ ॥

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन ! अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति प्राप्त होती है।

सच्चा साधक भगवान से यही प्रार्थना करेगा- हे भगवान! मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं विश्वास पूर्वक आपकी भक्ति में लग जाऊँ।

इतनी शक्ति हमें देना दाता

मन का विश्वास कमजोर हो ना,

हम चलें नेक रस्ते पे हमसे,

भूलकर भी कोई भूल हो ना,

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्री कृष्ण...

-आरएन तिवारी







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