• Gyan Ganga: प्रभु श्रीराम सुग्रीव पर क्रोधित तो थे लेकिन अपनी लीला के जरिये उसे समझाना चाहते थे

सुखी भारती Jun 17, 2021 15:14

बालि की पशुता का वध ही वास्तव में बालि का वध था। प्रभु श्रीराम जी वैसी ही पशुता का समावेश आज सुग्रीव के चरित्र में भी दृष्टिपात कर रहे थे। जैसे बालि विषयों में आकंठ डूबा था, ठीक सुग्रीव भी ऐसे ही आचरण धारण किए हुए था।

विगत अंक में हमने पढ़ा कि सुग्रीव पर क्रोधित होकर श्रीराम जी सुग्रीव के वध को तत्पर हो जाते हैं। प्रभु श्रीराम जी ने जिन शब्दों का प्रयोग किया, वे शब्द अति गूढ़ व मर्म से परिपूर्ण हैं। श्री राम कहते हैं-

‘जेहिं सायक मारा मैं बालि। 

तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।।’

अर्थात जिस बाण से मैंने बालि का वध किया, उसी बाण से मैं सुग्रीव का वध कर दूंगा। विचारणीय एवं किंचित-सा व्यंग्यात्मक भाव से देखें तो पायेंगे कि क्या श्रीराम जी के पास क्या एक ही बाण था? जो वही बाण बालि पर प्रयोग हो रहा था और वही बाण सुग्रीव पर भी प्रयोग होने वाला है। क्या श्रीराम जी के तरकश में बाणों का अकाल आन पड़ा था, जो श्रीराम एक ही बाण से अपने कार्य संपन्न कर रहे थे। निःसंदेह ऐसा किंचित भी नहीं है। क्योंकि श्रीराम जी की प्रभुता इन बाणों के अस्तित्व पर थोड़ी न टिकी है। उनका बल, शौर्य व पराक्रम किसी बाणों का मोहताज कैसे हो सकता है। क्योंकि श्रीराम जी का स्पर्श ही ऐसा दिव्य है कि अगर वे एक तिनके को भी छू दें, तो वह तीक्षण बाण में परिर्वतित हो जाता है।

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इन्द्र पुत्र जयंत की कथा से तो हम निश्चित परिचित ही होंगे। जिसने कौवे का रूप धारण कर जब माता सीता जी के पावन श्रीचरण पर घाव किया तो भयभीत होकर भागते इन्द्र पुत्र जयंत पर श्रीराम जी ने एक तिनके का ही संधान किया था। परिणाम स्वरूप वह नन्हां तिनका ही श्रीराम जी का बाण बन गया था। और तीनों लोकों में कोई नहीं था, जो उस बाण से जयंत की रक्षा कर पाता। कहने का तात्पर्य कि श्रीराम जी जब यह कहते हैं कि मैं सुग्रीव को उसी बाण से मारूँगा जिस बाण से मैंने बालि को मारा था। और बालि प्रसंग में क्या वाकई श्रीराम जी बालि को दैहिक रूप से मारना ही चाहते थे? क्योंकि श्रीराम जी अगर बालि को सचमुच मारना ही चाहते थे, तो बालि को बाण लगने के बाद श्रीराम क्यो बालि को बार-बार विवश कर रहे हैं कि हे बालि! तुम्हें अभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होना है। मैं अतिअंत प्रबल भाव से कह रहा हुँ कि तुम अपने प्राणों को अभी रोक कर रखो, इन्हें अचल करो-‘अचल करौं तनु राखहु प्राना।।’

यहाँ तक कि श्रीराम जी तो रो कर आग्रह कर कह रहे हैं कि बालि तुम्हें अपने प्राण बचाने ही होंगे। आश्चर्य होता है कि श्रीराम जी यह कैसी विचित्र लीला कर रहे हैं। मारने के लिए बाण भी दे मारा और अब अथक प्रयास कर रहे हैं, कि बालि किसी भी परिस्थिति में मरने न पाये। आखिर यह चल क्या रहा है? कभी मर जाओ कभी जीवित हो जाओ। क्या यह गुड्डे-गुड्डियों का खेल है कि बस झूठ-मूठ का मरना है। खेल समाप्त और फिर सब पहले की तरह सामान्य मिलेगा। सज्जनों यह कोई रंगमंच पर नाटक नहीं हो रहा था कि मात्र अभिनय चल रहा हो। कोई मर भी रहा है तो शोक करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि मंच से नीचे आकर तो सब जीवित ही मिलेंगे। भाई साहब यहाँ तो जो मरा, फिर मरा ही होता है। वह वापिस जीवित थोड़ी न होता है। निश्चित ही यह संसार का रंगमंच नहीं था, लेकिन प्रभु का रंगमंच तो था ही। जिसमें प्रभु का यह दिव्य नाटक अथवा दिव्य लीला कोई मनोरंजन के लिए नहीं, अपितु जीवन का मर्म समझाने के लिए था। जिसमें श्रीराम जी यह स्पष्ट दिखा रहे थे, कि हमें बालि को दैहिक स्तर पर मारने में सचमुच कोई व्यक्तिगत रूचि नहीं थी। हम मारना चाह रहे थे, तो वह थी केवल बालि की असुरता, अमानवीयता और पशुता। जो कि हमारे बाण के संधान व हमारे दिव्य दर्शनों से संभव हो गया था। बालि की पशुता का वध ही वास्तव में बालि का वध था। प्रभु श्रीराम जी वैसी ही पशुता का समावेश आज सुग्रीव के चरित्र में भी दृष्टिपात कर रहे थे। जैसे बालि विषयों में आकंठ डूबा था, ठीक सुग्रीव भी ऐसे ही आचरण धारण किए हुए था। श्रीराम ऐसा कहते भी हैं-

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‘सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। 

पावा राज कोस पुर नारी।।’

सुग्रीव को मारने का अर्थ यह कतई नहीं था कि सुग्रीव को भी दैहिक रूप में मार दिया जाता। लेकिन समस्या यह थी, कि बालि के विषयों के विनाश के दौरान, बालि के प्राणों की आहुति भेंट चढ़ी थी। और श्रीराम जी ऐसा बिल्कुल नहीं चाहते थे कि सुग्रीव के विषयों के दहन के फेर में कहीं सुग्रीव के प्राणों की बलि भी हो जाए। तो प्रभु ने अपने संकल्प में एक शब्द और जोड़ दिया-

‘तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।।’

अर्थात आज नहीं, कल मारूँगा। 

मानो प्रभु बालि के साथ-साथ सुग्रीव को भी खोना नहीं चाहते थे। प्रभु ने सुग्रीव को मारने की योजना कल पर इसलिए भी टाल दी, क्योंकि आने वाले ‘कल’ तक पहुँचने के लिए प्रभु को भी ‘आज’ की सीढ़ी से गुजरना पड़ना था। और मानो प्रभु ने सुग्रीव को यह अवसर दिया था, कि हे सुग्रीव! लो मैं तुम्हारे हाथों में ‘आज’ अर्थात वर्तमान दे रहा हुं। तुम अपना आज सुधार लो, कल तो तुम्हारा स्वयं ही सुधर जायेगा। अन्यथा कल तो फिर ‘काल’ का दूसरा रूप है ही। अपने कल को सुनहरा बनाना है, तो वर्तमान को सम्मान देना तो सीखना ही होगा। सुग्रीव को लेकिन कुछ पता नहीं था कि उसके सिर पे कौन-सा कोप बरसने वाला था। यद्यपि इस कोप में सुग्रीव को प्रभु कल्याण पथ पर ही ले जाना चाह रहे थे, लेकिन कल्याण की मूर्ति प्रभु के क्रोध के आवरण के नीचे छुपी थी। प्रभु ने सुग्रीव को कल मारने के पीछे, एक स्नेह लीला और छुपा रखी थी। वह यह कि प्रभु जीव को यह संदेश देना चाह रहे थे, कि किसी के प्राण हरने का अथवा किसी भी प्रकार का अहित करने का योग बने, तो उसे सदैव कल पर टाल दो। लेकिन अगर किसी को प्राण देने का अवसर मिले तो उसी क्षण तत्काल करने का प्रयत्न करना चाहिए। जैसे बालि के प्राण बचाने के लिए, मैं रो भी पड़ा और जीवन पनपने की घड़ी को मैंने कल पर नहीं टालने का पूरा प्रयत्न किया। कल पर टालने की प्रवृति तो तुम्हारी भी है, लेकिन दुर्भाग्य कि तुम सेवा कार्य को कल पर टालने लगे। जिसका परिणाम यह हुआ कि तुमने जाना तो था महाकाल के सान्निध्य में, लेकिन जा पहुँचे काल के रक्त रंजित पंजों में। कुछ भी है, तुम्हें नहीं भी मारना है, लेकिन हमें कुछ तो लीला करनी ही पड़नी है।

प्रभु क्या लीला करते हैं, सुग्रीव का वध करते हैं अथवा नहीं। जानेंगे अगले अंक में...(क्रमशः)... जय श्रीराम!

-सुखी भारती