Gyan Ganga: माता सीता ने तिनके की आड़ लेकर रावण को समीप आने से रोक दिया था

Gyan Ganga: माता सीता ने तिनके की आड़ लेकर रावण को समीप आने से रोक दिया था

गोस्वामी तुलसीदास जी यहाँ रावण द्वारा, श्री जानकी जी को समझाने की, जो बात कह रहे हैं, वह बड़ी व्यंग्यात्मक है। व्यंग्यात्मक इसलिए, क्योंकि यहाँ समझाने अथवा समझने की आवश्यकता माता सीता जी को नहीं, अपितु लंकापति रावण को है।

रावण के आने की आहट से अशोक वाटिका में उपस्थित समस्त राक्षसियों सहित, प्रत्येक जीव सहम-सा गया। छूईमुई की कोमल पत्तियां, जिस प्रकार किसी अप्रिय स्पर्श से, सिकुंड सी जाती हैं, ठीक वैसे ही, माता सीता जी ने भी अपने पावन अंगों को, यूँ किसी अदृश्य-सी लक्षमण रेखा में सिकोड़ने का प्रयास-सा किया। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं, कि दुष्ट रावण माता सीता को बहुत प्रकार से समझाता है-

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‘बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।

साम दान भय भेद देखावा।।

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।

मंदोदरी आदि सब रानी।।

तब अनुचरीं करउँ पन मोरा।

एक बार बिलोकु मम ओरा।।’

गोस्वामी तुलसीदास जी यहाँ रावण द्वारा, श्री जानकी जी को समझाने की, जो बात कह रहे हैं, वह बड़ी व्यंग्यात्मक है। व्यंग्यात्मक इसलिए, क्योंकि यहाँ समझाने अथवा समझने की आवश्यकता माता सीता जी को नहीं, अपितु लंकापति रावण को है। लेकिन रावण की बुद्धि का फेर तो देखिए, कि उसे लग रहा है, कि मैंने श्रीसीता जी का अपहरण कर लिआ, तो अब वह ही भाग्य विधाता है। वह जो कह रहा है, वही ब्रह्म सत्य है। जो वह करे, वही विधि का विधान है, और संपूर्ण सुष्टि उसीका अनुसरण कर रही है। हाँ! एक स्थिति में यह सब संभव हो भी सकता था। क्योंकि जो भी प्राणी, भक्ति को पूर्णतः पा जाता है। निश्चित ही वह ब्रह्म रूप ही हो जाता है। और उसके पश्चात, तीनों लोक उसके चरित्र व आर्दशों का पालन किया जाता है। त्रिदेवों के लिए भी, ऐसी भक्ति संपन्न विभूति से बढ़कर, और कोई न तो पूजनीय होता है और न ही वंदनीय। तीनों देव आठों पहर, बस ऐसे भक्त के ठौर ठिकाने के ही भिखारी रहते हैं। लेकिन निश्चित था, कि रावण ऐसा सौभाग्यशाली कतई नहीं था। कारण कि वह भक्ति स्वरूपा जगत जननी, माँ सीता से कुछ समझने नहीं, अपितु उन्हें ही समझाने चला था। और इस तथ्य पर आप थोड़ी गहराई में जायेंगे, तो पायेंगे, कि रावण तो समझाने जैसा एक भी कार्य नहीं कर रहा था, अपितु उल्टे श्री जानकी जी को धमकाये जा रहा था। वह भी कोई एक तरीके से नहीं, अपितु चारों विधियों से-‘साम दान भय भेद देखावा।।’ अर्थात रावण साम, दाम, दण्ड़ और भेद नीतियों का प्रयोग कर रहा है। कैसा कच्चा खिलाड़ी है रावण भी कि उसे पता ही नहीं कि पगले! श्रीसीता जी रण में उतरी कोई रणबांकुरी थोड़ी न हैं। जो किसी शत्रु की भाँति उन पर साम, दाम, दण्ड व भेद नीति अपनाई जाये। अगर इन चारों नीतियों पर तनिक विचार किया जाये। तो आप पायेंगे, कि रावण वाकई में मूर्ख शिरोमणि है। साम नीति का अर्थ होता है, सौम्य भाव से की जाने वाली क्रिया अथवा नीति। रावण सोचता है, कि मैं श्रीसीता जी को प्रेम पूर्वक समझाता हूँ। उनसे प्रेम से व्यवहार करूँगा, तो श्रीसीता जी मेरा कहा मान कर, मुझे वर लेंगी। और उस वनवासी राम की रट भूल जायेंगी। पर रावण का यह ज्ञान तो धरा का धरा ही रह जाता है। क्योंकि माता सीता एक तिनके की आड़ लेकर, रावण को उसी समय, अपने समीप आने से रोक देती हैं।

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रावण का सीता जी के समक्ष सौम्य भाव दिखाना, अनुचित इसलिए भी था, क्योंकि रावण की सौम्यता से, माता सीता को कोई सरोकार ही नहीं था। क्योंकि रावण जब उन्हें बलपूर्वक हरण करके ले ही आया, तो अब तो उसकी ओर से, वैर भाव ही फलेगा फूलेगा। माता सीता को रावण के सौम्य भाव की आवश्यकता तो उस समय थी, जब वह उन्हें खींच कर राम कुटिया से दूर ले जा रहा था। तब श्रीसीता जी के आग्रह पर वह बल प्रयोग छोड़, उन्हें ससम्मान छोड़ देता, और उन्हें प्रणाम कर, अपने पापों का पश्चाताप करता हुआ, सौम्य भाव धारण करता, तब तो सब उचित भी था। अब जब दानों की ढेरी पर पैर मार कर, सारे दाने बिखेर ही दिये। तो अब कुछ भी कहने के क्या मायने? और सही अर्थों में देखें, तो सौम्य भाव धारण करने की वास्तविक आवश्यकता व अधिकारी तो माता सीता जी हैं। जो कि उन्हेंने स्वभावगत, धारण किया ही हुआ है। सोचिए, अगर माता सीता जी, रावण के प्रति अभी तक भी सौम्य भाव में न होती, तो रावण की क्या हिम्मत थी, कि वह माता सीता जी का हरण कर पाता। कारण कि श्रीसीता जी भक्ति और शक्ति की साक्षात मूर्ति हैं। संसार की समस्त शक्तियां, उन्हीं के प्रताप से हैं। यहाँ श्रीजानकी जी तनिक भी संकल्प ले लेतीं, कि रावण का नाश हो जाये, तो कोई एक भी कारण नहीं था, कि रावण का समूल नाश न होता। लेकिन माता सीता कोई राग द्वेष के आधीन थोड़ी न हैं। वे तो जगत जननी हैं। 

संपूर्ण जीवों की माता हैं। और माता का ममत्व, उनकी सौम्यता को कहीं खोने थोड़ी न देता है। तो स्वाभाविक रूप से ही माता जानकी जी, रावण के प्रति भी अभी तक सौम्य भाव से ही अभिभूत हैं। कारण कि समस्त जीवों की माता होने के कारण ही, तात्विक दृष्टि से माता सीता जी, रावण की भी माता ही हुई। इसलिए, सही मायनों में रावण को, माता सीता के समक्ष सौम्यता का कोई प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, अपितु उनके श्रीचरणों में गिर कर, यह क्षमा याचना करनी चाहिए, कि हे माता! मुझसे बहुत भारी भूल हो गई है। जिसकी क्षमा तीनों लोकों में नहीं है। लेकिन यह तो आपका सौम्य भाव है, कि मैं अभी तक जीवित हूँ। बस एक कृपा कर दीजिए, कि अपनी ममता व सौम्यता का साया, मेरे सिर पर सदा टिका कर रखियेगा। यह आपकी सौम्यता ही है, कि मैं अभी भी आपके समक्ष कुछ कह पाने का साहस कर पा रहा हूँ। अन्यथा, मेरा सिर मेरे धड़ से अलग हो, कहीं और पड़ा होता, और मैं कहीं और होता।

सज्जनों केवल साम नीति ही नहीं, रावण अन्य नीतियों का भी दुरुपयोग करता है। लेकिन कैसे? जानेंगे अगले अंकों में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती