Gyan Ganga: गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- बिना किसी आशा या उम्मीद के दूसरों की सेवा कर अपना ऋण चुकाएँ

  •  आरएन तिवारी
  •  जनवरी 8, 2021   17:45
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Gyan Ganga: गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- बिना किसी आशा या उम्मीद के दूसरों की सेवा कर अपना ऋण चुकाएँ

मनुष्य का ऐसा स्वभाव होता है कि जिसमें उसको अपना स्वार्थ दिखाई देता है, उस काम को वह बड़ी तत्परता से करता है, किन्तु वही कर्म उसके लिए बंधन का कारण बन जाता है। इसलिए इस बंधन से छुटकारा पाने के लिए कर्मयोग की बड़ी जरूरत है।

अच्छे विचार ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है, क्योंकि धन और बल किसी को भी गलत राह पर ले जा सकता है किन्तु अच्छे विचार सदैव ही अच्छे काम के लिए प्रेरित करते हैं। 

आइए ! गीता प्रसंग में चलें- पिछले अंक में भगवान श्री कृष्ण ने अपने परम मित्र अर्जुन को संसार के शोक सागर से उबारने के लिए इंद्रियों को वश में करते हुए बुद्धिमानी पूर्वक निष्काम कर्म करने का उपदेश दिया था।

भगवान की बात सुनकर अर्जुन दुविधा में पड़ गए। अपनी दुविधा दूर करने के लिए उन्होंने भगवान से यह प्रश्न पूछा-

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अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ 

अर्जुन ने कहा– सभी जन की याचना पूरी करने वाले हे जनार्दन! यदि आप निष्काम-कर्म की अपेक्षा ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं तो फिर मुझे इस भयंकर कर्म (युद्ध) में क्यों लगाना चाहते हैं? 

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌ ॥ 

आपके अनेक अर्थ वाले शब्दों से मैं दुविधा में पड़ गया हूँ। मेरी बुद्धि काम नहीं कर पा रही है, अत: इनमें से मेरे लिये जो एकमात्र कल्याणप्रद हो उसे कृपा करके निश्चय-पूर्वक मुझे बतायें, जिससे मैं उस श्रेय को प्राप्त कर सकूँ। 

गीता रहस्य से भरा हुआ धर्म शास्त्र है, इसको बड़े-बड़े ऋषि, महर्षि और मुनि, महात्मा नहीं समझ सके यहाँ तक कि भगवान के सदा निकट रहने वाले परम भक्त अर्जुन की बुद्धि भी लड़खड़ा गई, तो हम साधारण जीव की क्या बात है? ऐसा मान लीजिए कि जो गीता को समझ गया, वह गोविंद को समझ गया। वास्तव में श्रीमद्भगवत गीता मनुष्य को दूसरों की मदद करने (परमार्थ सिद्धि) की कला सिखाती है। भगवान जानते हैं कि अर्जुन के धर्म युद्ध करने से न केवल अर्जुन बल्कि सम्पूर्ण समाज लाभान्वित होगा। 

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।

कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

अर्जुन शब्द का अर्थ होता है स्वच्छ। यहाँ भगवान का यह अभिप्राय है कि अर्जुन तुम्हारा हृदय तो अत्यंत स्वच्छ और निर्मल है, फिर तुम्हारे मन में ऐसी दुविधा और संदेह क्यों? 

हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।

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मनुष्य का ऐसा स्वभाव होता है कि जिसमें उसको अपना स्वार्थ दिखाई देता है, उस काम को वह बड़ी तत्परता से करता है, किन्तु वही कर्म उसके लिए बंधन का कारण बन जाता है। इसलिए इस बंधन से छुटकारा पाने के लिए कर्मयोग की बड़ी जरूरत है। कर्मयोग में सभी कर्म केवल दूसरों के लिए किए जाते हैं, अपने लिए कदापि नहीं। हमें यह नहीं समझना चाहिए कि दूसरा हमारी सेवा करे तो हम उसकी सेवा करें, बल्कि दूसरा हमारी सेवा करे या न करे हमें तो अपने कर्तव्य द्वारा उसकी सेवा करनी ही है। हमारे जितने भी सांसरिक संबंध हैं- माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री-पुत्र यथा योग्य सबकी सेवा करनी चाहिए। अपना सुख लेने के लिए ये संबंध नहीं हैं। उनसे कोई आशा रखना या उन पर अपना अधिकार जमाना बहुत बड़ी भूल है। हम उनके ऋणी हैं और ऋण उतारने के लिए उनके यहाँ हमारा जन्म हुआ है। इसलिए निःस्वार्थ भाव से उनकी सेवा करके हम अपना ऋण चुका दें। सूर्य और चंद्रमा शाश्वत निष्काम कर्मयोगी हैं। 

किन्तु इस कलियुग में कर्मयोगी बनना आसान काम नहीं है। इसके लिए आदत और अभ्यास की जरूरत है। मुझे एक घटना याद आ रही है। एक साधु महात्मा अपने शिष्य के साथ भिक्षा मांगने गए, घर से एक नव वधू निकली वह धर्म-कर्म में विश्वास नहीं रखती थी, उसने चूल्हे में से एक मुट्ठी राख उठाई और बाबा की झोली में डाल दी। झोली में पहले से रखा हुआ सब आटा खराब हो गया। बाबा ने उसको पुत्रवती, सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया। चेले ने आश्चर्य से पूछा- सारा आटा बिगाड़ दिया और आपने इतना अच्छा आशीर्वाद दे दिया। बाबा बोले— इसने कम से कम देना तो सीखा, देने की आदत शुरू तो हुई। जीव जब कर्म करने का प्रयास करता है, तो परमात्मा उसकी सहायता करते हैं।   

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्रीकृष्ण...

-आरएन तिवारी







Gyan Ganga: भगवान की किस बात को सुन कर बालि को ललकारने के लिए तैयार हुए सुग्रीव?

  •  सुखी भारती
  •  मार्च 4, 2021   18:02
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Gyan Ganga: भगवान की किस बात को सुन कर बालि को ललकारने के लिए तैयार हुए सुग्रीव?

सुग्रीव बिखरे मन को संगठित करता है स्वयं को समझाता व उपदेश करता है। प्रभु के सामर्थ्य व बल का बार−बार स्मरण करते हुए अपने आत्म−विश्वास को प्रखर व अडिग बनाने का प्रयास करता है। और परिणाम यह निकलता है कि सुग्रीव बालि को ललकारने हेतु तैयार हो जाता है।

सुग्रीव के चरित्र से हम सब लोग भली−भांति अवगत हैं कि सुग्रीव भले ही बलवान हों। लेकिन वह बालि से इतना ज्यादा भयभीत हैं कि वह कंद्राओं में छुपकर रह रहे हैं। यह केवल सुग्रीव की ही गाथा नहीं है। अपितु संसार में समस्त जीव किसी न किसी भय से व्याप्त है। और भय जीव को भगाता है, दिन−रात उसके पीछे पड़ा रहता है। भय हमें रह रहकार अहसास करवाता है कि तू निर्बल है, असहाय एवं विवश है। ऐसे में जीव मानसिक रोगी बन जाता है। सुग्रीव जैसे ऋर्षयमूक पर्वत तक ही सिमटकर रह गया था। वैसे ही जीव भी अपने ही कपोल कल्पित विचारों की गुफा में सिकुड़ कर रह जाता है।

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श्रीराम जी से बस यही तो नहीं देखा जाता। वे कहते हैं कि हे जीव! तू यह कैसे भूल जाता है कि मैं जब तेरे साथ हूँ, मेरा बल तुझ पर न्योछावर है तो फिर तुझे किस से भय लगता है? हे सुग्रीव! मुझे अगर अपनी पत्नी ढूंढ़ने हेतु किसी समर्थ व बलवान साथी की कोई आवश्यकता होगी तो निश्चित ही मैं तुम्हारी अपेक्षा बालि का ही चयन करता। लेकिन मैंने बालि नहीं अपितु तुम्हारा चयन किया है क्योंकि मुझे किसी के बल की नहीं अपितु मेरे बल की किसी को आवश्यक्ता थी। और मेरे उस बल के अधिकारी तुम हो। और मैं कितने ऊँचे स्वर में कह रहा हूँ कि सुग्रीव तुम आगे बढ़ो। मैं और मेरा बल तुम्हारे पीछे खड़े हैं। आश्चर्य है कि बालि को अपने मिथ्या व अहं युक्त बल पर भी तनिक संदेह नहीं और तुम हो कि मेरा बल साथ पाकर भी भयभीत व विचलित हो। 

सुग्रीव अपने बिखरे मन को संगठित करता है स्वयं को समझाता व उपदेश करता है। प्रभु के सामर्थ्य व बल का बार−बार स्मरण करते हुए अपने आत्म−विश्वास को प्रखर व अडिग बनाने का प्रयास करता है। और परिणाम यह निकलता है कि सुग्रीव बालि को ललकारने हेतु तैयार हो जाता है। और श्रीराम जी को लगता है कि लो मैं अपने लक्ष्य भेदन में सफल हो गया। क्योंकि मेरा संग पाकर भी कोई निर्बल बना रहे तो फिर क्या लाभ। अधर्म, अनीति व अज्ञानता के सामने कोई व्यक्ति उठ खड़ा हो, बुराई को उसके द्वार पर जाकर ललकारे तो समझो समाज परिवर्तित होने वाला है। नई क्रांति का बिगुल बज उठा है और यूं मानो कि ऐसे अनाचारी के खिलाफ कदम उठ खड़े हुए तो युद्ध से पहले ही विजय का स्वाद चख लिया है। कदम नहीं उठाना ही गले में हार के हार को टांगे रखना होता है। और सुग्रीव जैसे दबे−कुचले जीवों का साहस लौट आना वास्तव में सुग्रीव की नहीं अपितु मेरी ही जीत है।

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केवल आज ही क्यों सतयुग में भी तो ऐसा ही घटित हुआ था। हिरण्यकश्यपु ने कैसे दहाड़ कर कहा था कि क्या प्रभु उस निर्जीव स्तंभ में भी हैं? उसके प्रहार की छूहन भर से मेरा उस स्तंभ में से नरसिंह अवतार प्रकट हो गया था। वह निर्जीव खंभा तो केवल संकेत मात्र था। क्योंकि निर्जीव तो वास्तव में सजीव प्राणी थे जो मुर्दों की भांति हिरण्यकश्यपु के अधर्म व पाप के मूक साक्षी बने हुए थे। लेकिन जीवन में जरा-सी एक चोट क्या लगी कि उसमें साहस व क्रांति का ऐसा नरसिंह प्रकट होता है कि हिरण्यकश्यपु रूपी अधर्म को नाश कर देता है। 

सुग्रीव का बालि के विरुद्ध उठ खड़ा होना एक नवीन सृजन की नींव है। क्यों मानव को लगता है कि मैं निर्बल हूँ? क्यों वह भूल जाता है कि मेरे पीछे ईश्वर का बल कार्य कर रहा है। जबकि मैं पल−पल जीव को संकेत करता हूँ कि देख तू पग−पग पर असमर्थ था। लेकिन मैंने किसी भी परिस्थिति में तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा। माँ के गर्भ में जब तू नौ मास तक उल्टा लटका होता है, तो यह कोई कम प्रतिकूल स्थिति नहीं थी। तुझमें कहाँ यह बल था कि यह कष्ट सह पाते। शरीर के अंग भी ढंग से खुल नहीं पाते थे। कल्पना करो कि आज यद्यपि तुझमें शारीरिक क्षमता व बल भी अधिक है, अब अगर नौ मास तो क्या नौ क्षण भी ठीक वैसे ही उलटे लटकने को विवश कर दिया जाए तो तेरा क्या हाल हो तू इस कल्पना से ही सिहर उठेगा। वहाँ पर किसने तेरी रक्षा की? कभी सोचा भी है? जन्म हुआ तो शारीरिक क्षमता का असीम अभाव था। लाख स्वादिष्ट व्यंजनों के होने के बावजूद भी तेरे मुख में एक दांत तक नहीं था कि उन व्यंजनों का उपभोग कर सके। उसी समय माँ के आँचल में दूध आ जाना क्या ये मेरी प्रत्यक्ष कृपा का प्रमाण नहीं था? मुझे पता था कि धीरे−धीरे दूध के साथ−साथ तेरा अन्य भोज्य पदार्थों के सेवन का भी मन होता है तो मैंने तुझे नन्हें−नन्हें दांत दे दिए। तूने खूब छक कर सब कुछ खाया लेकिन सात−आठ वर्ष के आते−आते तेरे रूचिकर भोजन पदार्थों की सूची लंबी होती गई। जिसका सेवन करने में तेरे नन्हें दांतों का सामर्थ्य अभी सीमित था। तो मैंने सभी के सभी दांत झाड़ दिए और नए सिरे से पक्के दांत पुनः मोतियों की तरह तेरे मुख में जड़ दिए। 

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तेरी समस्त अक्षमताओं को अपनी क्षमता के बल से ढंकने की गाथा बड़ी लंबी व अनंत है। बस तेरे देखने भर की बात है। फिर देखना पग−पग पर भी बालि जैसे बाधक क्यों न बैठे हों, तू उन्हें चुटकियों में मसल सकता है। इसलिए हे जीव! तू किसी और का अंश नहीं अपितु मेरा ही अंश है। मैं जब किसी से भयभीत नहीं तो मेरा अंशी भला भयभीत क्यों हो? मैं पिता हूँ तो पुत्र पिता से अलग क्यों? तेरे हारने का कोई प्रश्न ही नहीं। उठ खड़ा हो और दूर कर दे अपनी प्रत्येक बाधा। प्रभु श्रीराम जी का आदेश प्राप्त कर सुग्रीव तो उठ खड़ा हुआ लेकिन क्या वह सफल हो पाता है? जानने के लिए अगला अंक जरूर पढ़ियेगा। क्रमशः... जय श्रीराम

-सुखी भारती







Gyan Ganga: श्रीराम की बात सुन कर क्यों सुग्रीव की आँखें आश्चर्य से फट गयी थीं

  •  सुखी भारती
  •  मार्च 2, 2021   18:00
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Gyan Ganga: श्रीराम की बात सुन कर क्यों सुग्रीव की आँखें आश्चर्य से फट गयी थीं

अचानक प्रभु श्रीराम जी ने कुछ ऐसा कह डाला कि सुग्रीव के तो प्राण ही सूख गए। भय के मारे उसकी रूह ही कांप गई। क्योंकि श्रीराम जी ने सुग्रीव से वह कह डाला जिसकी उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। अब सुग्रीव सोचने लगे कि करें तो क्या करें?

सुग्रीव ने जब देखा कि प्रभु श्रीराम जी तो बालि वध हेतु अडिग हैं और वे बालि को मारकर ही दम लेंगे। तो हो सकता है सुग्रीव ने फिर सोचा हो कि चलो कोई नहीं, अब बालि के मरने का समय आ ही गया होगा, तो कोई क्या कर सकता है? मन में वैराग्य होने के कारण सुग्रीव महान ज्ञानी होने का प्रदर्शन कर ही रहा था और उसे यह भलीभांति आश्वासन भी था कि चलो बालि श्रीराम जी के हाथों से मरेगा तो यह भी शुभ ही है। स्वयं को प्रत्येक क्रिया व परिस्थिति से तटस्थ मान, सुग्रीव को लग रहा था कि बस अभी श्रीराम जी अपना बाण निकालेंगे और बालि का दो क्षण में वध कर निवृत हो जाएंगे। और हमें तो दर्शक की भांति बस देखना ही है। फिर इसके पश्चात् न बालि होगा और न उसका भय। 

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सुग्रीव को यह सब बड़ा सरल व सीधा-सा प्रतीत हो रहा था। मानो हथेली पर लड्डू रखा है और बस उठाकर खा ही लेना है। शायद सुग्रीव के हृदय के किसी कोने में यह भाव भी हों कि चलो अच्छा ही हो रहा है कि बालि का जड़ से ही इलाज होने जा रहा है। और वह भी बड़े तरीके से। अब तो बालि वध का आक्षेप भी मुझ पर नहीं आएगा। क्योंकि मेरी इच्छा नहीं है फिर भी श्रीराम जी बालि का वध कर रहे हैं। तो उत्तरदायित्व भी श्रीराम जी पर ही आएगा। समाज में इसके द्वारा मेरा नाम भी कलंकित होने से बच जाएगा। 

निःसंदेह सुग्रीव स्वयं को अत्यंत ही सुरक्षात्मक घेरे में महसूस कर रहा था। लेकिन अचानक प्रभु श्रीराम जी ने कुछ ऐसा कह डाला कि सुग्रीव के तो प्राण ही सूख गए। भय के मारे उसकी रूह ही कांप गई। क्योंकि श्रीराम जी ने सुग्रीव से वह कह डाला जिसकी उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। जी हाँ! श्रीराम जी सुग्रीव को संबोधित करते बोले कि हे वीर सुग्रीव! तैयार हो जाओ, समय आ चुका है कि तुम अब बालि को उसके द्वार पर जाकर युद्ध के लिए ललकारो। यह सुनकर सुग्रीव का मुख खुला का खुला रह गया, आँखें आश्चर्य से फटने वाली हो गईं। उसे लगा कि अरे यह श्रीराम जी ने क्या कह डाला। अवश्य ही वे मेरे संग उपहास या व्यंग्य ही कर रहे हैं। लेकिन भाई ऐसा भी क्या उपहास कि सामने वाले का कलेजा ही फटकर मुँह को आ जाए। बोले कि बालि से जाकर युद्ध करो। मेमने को कहो कि जाकर सिंह से भिड़े या कद्दू को कहो कि जाकर चाकू पर जोर से कूदो तो अंजाम तो किसी से छुपा नहीं होता न। ठीक वैसे ही जाकर बालि को युद्ध के लिए ललकारो तो परिणाम मेरी मृत्यु ही तो है। पूर्व की तरफ चलते−चलते श्रीराम जी यूं पश्चिम की तरफ क्यों लौट पड़े। प्रण बालि को मारने का किया है या बालि द्वारा मुझे मरवाने का? न बाबा न, मुझे ऐसा उपहास तनिक भी पसंद नहीं। लेकिन यह क्या श्रीराम जी की भाव भंगिमा तो कहीं से भी उपहास के चिन्ह समेटे नहीं है। 

तो इसका तात्पर्य श्रीराम जी सत्य कह रहे हैं क्या? लेकिन यह क्या धोखा है? कहा तो था कि वे ही बालि को अपने एक तीर में मार डालेंगे और अब अवसर आया तो मुझे ही युद्ध के लिए धकेल रहे हैं। भला यह कैसा प्रण और क्षत्रिय धर्म? श्रीराम जी का क्या है, वे तो वापिस अयोध्या लौट जाएंगे, बखेड़ा तो मुझसे खड़ा हो गया था। बालि से मुझे ही भिड़ना था तो पहले ही बता देते न। मैं व्यर्थ ही क्यों इस झमेले में पड़ता। न, न, न यह तो कदापि उचित नहीं है। 

सुग्रीव अंदर तक डगमगा गया। वैराग्य क्षण भर में छू मंतर हो गया। चंद पल पहले जो सुग्रीव ने कहा था कि प्रभु मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि सब त्यागकर केवल आपकी सेवा भक्ति करूं तो श्रीराम जी हँस पड़े थे। क्योंकि श्रीराम जी जानते थे कि सुग्रीव जब मैं किसी के समक्ष हूँ तो कोई भी भक्त होने का दंभ भर सकता है। लेकिन बात तो तब है न कि सामने साक्षात् यमराज हो और तब भी भक्ति भाव बना रहे। और देखो तुम्हारा भक्ति भाव ढेरी होता जा रहा था। प्रण किया था सेवा का, लेकिन प्राणों का मोह हावी हो रहा हो। सुग्रीव तो मानो सर्प के मुख में छिपकली जैसा प्रतीत कर रहा था। न मौत की रागनी से बच पा रहा है और न जीवन की स्वर लहरियों को अनसुना कर पा रहा है। न श्रीराम जी को छोड़े बन पा रहा है, न बालि को पकड़े चल पा रहा है। हो सकता है कि सुग्रीव को श्री हनुमान जी पर क्रोध आ रहा हो कि पवन पुत्र ने अच्छा फंसाया मुझे। अच्छा होता, श्री हनुमान जी को मैंने परीक्षा के लिए भेजा ही नहीं होता और पहाड़ी छोड़कर चुपचाप भाग जाता। लेकिन अब तो बीच मंझधार में फंस गया हूँ।

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सुग्रीव को यूं दुविधा में फंसा देख श्रीराम जी को दया आ गई। श्रीराम जी सुग्रीव को स्नेह व आश्वासन देते हुए कहते हैं कि सुग्रीव तुम क्यों व्यर्थ चिंता करते हो। बालि को तो निश्चित ही मैं अपने बाण से ही मारूंगा। लेकिन लड़ना तो बालि के समक्ष तुम्हें ही पड़ेगा। श्रीराम जी ने मानो अध्यात्म का पूरा सूत्र ही खोलकर रख दिया। कर्म सिद्धांत समझने के लिए प्रभु ऐसे ही जीवंत घटनाक्रमों का ही तो चयन करते हैं। जीव चाहता है कि बालि वध रूपी फल अथवा लक्ष्य मुझे यूं ही बैठे−बैठे प्राप्त हो जाए। मैं कुछ न करूं बस चुपचाप बैठा रहुँ और स्वयं प्रभु ही जाकर मेरा कार्य सिद्ध कर दें। परंतु प्रभु कहते हैं कि हे सुग्रीव! निश्चित ही बालि वध तो हम ही करेंगे लेकिन करेंगे छुपकर। हम सामने प्रकट होने की बजाए पेड़, लताओं के पीछे रहकर ही कार्य करेंगे। लेकिन हमारी यह कृपा तब ही होगी, जब तुम भी कर्म करने की अनिवार्यता व रीति का दामन नहीं छोडेंगे। यह तो मुझे भी पता है कि बालि को मारना तुम्हारे वश की बात नहीं। लेकिन मुझ पर विश्वास करके तुम बालि से भिड़ो तो सही। घबराना क्यों, मैं हूँ न तुम्हारे साथ। बालि मुझे नहीं देख पा रहा हो तो मुझे आश्चर्य नहीं। मैं उसके लिए छुपा हूँ लेकिन अपने भक्त के लिए नहीं, तुम तो मुझे देख ही पा रहे हो न कि मैं तुम्हारी खातिर छुपकर खड़ा हूँ। फिर भय क्यों, अविश्वास क्यों? 

क्या सुग्रीव बालि से युद्ध के लिए तत्पर होता है या नहीं जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः...जय श्रीराम

-सुखी भारती







संत रविदास ने लोगों को कर्म की प्रमुखता और आंतरिक पवित्रता का संदेश दिया

  •  सुखी भारती
  •  फरवरी 27, 2021   11:17
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संत रविदास ने लोगों को कर्म की प्रमुखता और आंतरिक पवित्रता का संदेश दिया

निःसंदेह संत रविदास जी दैवीय अवतार तो थे ही। लेकिन तब भी वे गुरू धारण करने की सनातन परंपरा व सिद्धांत की अवहेलना नहीं करते। और स्वामी रामानंद जी की शरणागत हो गुरू शिष्य−परंपरा के महान आदर्श का निर्वहन करते हुए इसे संसार में स्थापित करते हैं।

समाज को जब चारों ओर से अज्ञान की अंधकारमय चादर ने अपनी मजबूत जकड़न में जकड़ा हो। यूं लगता हो कि धरती रसातल में धंस गई है और दैहिक, दैविक व भौतिक तीनों तापों के तांडव से समस्त मानव जाति त्रस्त हो चुकी है। तो यह कैसे हो सकता है कि ईश्वर यह सब कुछ एक मूक दर्शक बनकर देखता रह जाए। कष्टों की अमावस्या को मिटाने हेतु प्रभु अवश्य ही पूर्णिमा के चाँद को आसमां के मस्तक पर सुशोभित करते हैं। ऐसे ही दैवीय पूर्णिमा के चाँद का इस धरा धाम पर उदय हुआ था। जिन्हें संसार संत रविदास जी के नाम से जानता है। काशी का वह गाँव संवत 1433 को ऐसा धन्य महसूस कर रहा था मानो उस जैसा कोई और हो ही न। माघ मास की पूर्णिमा भी खूब अंगड़ाइयां लेकर अपना आशीर्वाद लुटा रही थी। पवन तो मानों हज़ारों−हज़ारों इत्र के पात्रों में नहा कर सुगंधित होकर बह रही थी। कारण कि श्री रविदास जी ही वह महान दैवीय शक्ति थे जो मानव रूप में इस धरा को पुनीत करने हेतु अवतरित हुए थे। उनके जन्म के साक्ष्य निम्नलिखित वाणियों में भी मिलते हैं−

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चौदह से तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास।

दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास।।

माता करमा और पिता राहु को तो भान भी नहीं था कि उनकी कुटिया में साक्षात भानू का प्रकटीकरण हुआ है। भानू तो छोडि़ए उन्हें तो वे एक अदना सा जुगनूं भी प्रतीत नहीं हो रहे थे। पिता चाहते तो थे कि बेटा संसार के समस्त दाँव−पेंच सीखे। घर परिवार चलाने में हमारा हाथ बंटाए। लेकिन वे क्या जाने कि रविदास जी तो प्रभु के पावन, पुनीत व दिव्य कार्य को प्रपन्न करने हेतु अपना हाथ बंटाने आए हैं। संसार के दाँव−पेंच सीखने नहीं अपितु स्वयं को ही प्रभु के दाँव पर लगाने आए हैं। क्योंकि मानव जीवन का यही तो एकमात्र लक्ष्य है कि श्रीराम से मिलन किया जाए। वरना संसार के रिश्ते−नाते, धन संपदा तो सब व्यर्थ ही हैं, जिन्हें एक दिन छोड़कर हमें अनंत की यात्रा पर निकल जाना है। पत्नी जो जीवित पति को तो खूब प्यार करती है लेकिन प्रभु शरीर से क्या निकले कि वही पत्नी पति की लाश को देख कर भूत−भूत कहकर भाग खड़ी होती है−

ऊचे मंदर सुंदर नारी।। एक घरी पुफनि रहनु न होई।।

इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी।। जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी।।

भाई बंध् कुटुम्ब सहेरा।। ओइ भी लागे काढु सवेरा।।

घर की नारि उरहि तन लागी।। उह तउ भूतु−भूतु कर भागी।।

कहै रविदास सभै जगु लूटिआ।। हम तउ एक रामु कहि छूटिआ।। 

निःसंदेह संत रविदास जी दैवीय अवतार तो थे ही। लेकिन तब भी वे गुरू धारण करने की सनातन परंपरा व सिद्धांत की अवहेलना नहीं करते। और स्वामी रामानंद जी की शरणागत हो गुरू शिष्य−परंपरा के महान आदर्श का निर्वहन करते हुए इसे संसार में स्थापित करते हैं। 

यह वह समय था जब समाज में जाति पाति प्रथा का विष जन मानस की रग−रग में फैला हुआ था। जिसे निकालना अति अनिवार्य था। काशी नरेश ने जब एक बार सामूहिक भंडारे का आयोजन करवाया तो उसमें असंख्य साधु−संत, गरीब−अमीर व उच्च कोटि के ब्राह्मण सम्मिलति हुए। परंतु काशी नरेश उच्च जाति के प्रभाव में थे तो सर्वप्रथम जाति विशेष को भोजन करवाना था। श्री रविदास जी भी उनकी पंक्ति में बैठ गए। उच्च जाति वर्ग ने इसका विरोध किया। श्री रविदास जी तो मान−सम्मान से सर्वदा विलग थे। इसलिए वे सहज ही उक्त पंक्ति से उठ गए। विशेष वर्ग भले ही संतुष्ट हुआ और पुनः भोजन करने बैठ गया। लेकिन तभी एक महान आश्चर्य घटित हुआ। पंक्ति में बैठे प्रत्येक विप्र के बीच श्री रविदास जी बिराजे दर्शन दे रहे थे। और भोजन ग्रहण कर रहे थे। सभी यह कौतुक देख कर हैरान थे। और रविदास जी मुस्कुराते हुए मानो कह रहे थे कि हे प्रतिष्ठित वर्ग के लोगों, माना कि मेरी जाति−पाति सब नीच है। मैं कोई विद्वान भी नहीं लेकिन तब भी उसने आप सब के मध्य लाकर मुझे सुशोभित कर दिया क्योंकि मैं अहंकार की नहीं निरंकार की शरणागत हूँ−

मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी ओछा जन्मु हमारा।।

तुम सरनागति राजा राम चंद कहि रविदास चमारा।।

श्री रविदास जी की यह लीला देख समाज का एक बड़ा वर्ग उनका अनुसरण करने लगा। चितौड़ की महारानी मीरा बाई भी उन्हीं में से एक थी। जिन्होंने गुरू रविदास जी से योग−विद्या हासिल कर श्री कृष्ण के वास्तविक स्वरूप को समझा। वे कहती भी हैं−

गुरू रैदास मिले मोहि पूरन, धूरि से कलम भिड़ी।

सतगुरू सैन दई जब आके, जोति से जोति मिली।।

श्री रविदास जी की ख्याति दिन−प्रतिदिन भास्कर की किरणों की भांति निरंतर सब और फैलती जा रही थी। एक दिवस जब श्री रविदास जी बैठे जूते गांठ रहे थे। तो वहाँ से गुजर रहे एक पुजारी जी की दृष्टि उन पर पड़ी। उन्होंने वैसे ही श्री रविदास जी को बोल दिया कि रविदास तुम क्या यहाँ जूते गांठने में लगे हो। जीवन में कभी गंगा स्नान नहीं करोगे क्या? हालांकि श्री रविदास जी का जूते गांठना तो सिर्फ एक बहाना था। असल में गांठा तो आत्मा को प्रमात्मा से जा रहा था। ऐसा भी नहीं कि श्री रविदास जी गंगा स्नान के विरोधी थे। अपितु यह कहो कि वे इसके पक्षधर थे। क्योंकि यूं धर्मिक स्थलों पर किया जाने वाला सामूहिक स्नान समाज को एक साथ जोड़े रखता है। गंगा मईया जिन पर्वत शिखरों से निकलती हैं, वहाँ की असंख्य दुर्लभ व गुणकारी जड़ी−बूटियों के रस भी गंगा के पावन जल में घुले हुए होते हैं। जिस कारण गंगा स्नान अनेकों शरीरिक बीमारियों का इलाज का साधन हैं।

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गंगा स्नान और गंगा पूजन एक सुंदर संस्कार जनक है कि हमें अपनी नदियों व अन्य जल−ड्डोतों का संरक्षण एवं संर्वधन करना चाहिए। लेकिन इसी गंगा स्नान से जब मिथ्या धारणाएं जुड़ जाती हैं और गंगा स्नान अहंकार की उत्पत्ति का साधन हो जाए तो हम वास्तविक लाभ से वंचित हो जाते हैं। और वे पुजारी अहंकार रूपी इसी वृत्ति के धारक थे। उन्हें दिशा दिखाने हेतु श्री रविदास जी एक लीला करते हैं। पुजारी जी को एक दमड़ी देकर कहते हैं कि मैं तो नहीं जा पाऊँगा। लेकिन कृपया मेरा यह सिक्का गंगा मईया को अर्पित कर दीजिएगा। हाँ यह बात याद रखना कि मेरी दमड़ी गंगा मईया को तभी अर्पित करना जब वे स्वयं अपना पावन कर कमल बाहर निकाल कर इसे स्वीकार करें। और उन्हें कहना कि वे मेरे लिए अपना कंगन भी दें। उनकी यह बात सुनकर भले ही पुजारी ने श्री रविदास जी को बावले की श्रेणी में रखा हो। लेकिन उसके आश्चर्य की तब कोई सीमा न रही जब सचमुच गंगा मईया स्वयं श्री रविदास जी की दमड़ी को अपने पावन हस्त कमल से स्वीकार किया। और बदले में एक कंगन भी दिया।

अच्छा होता अगर पुजारी यह सब देख श्री रविदास जी की दिव्यता व श्रेष्ठता को समझ पाता। लेकिन वह तो कंगन देखकर बेईमान ही हो गया। और श्री रविदास जी को देने की बजाय अपनी पत्नि को वह कंगन दे देता है। उसकी पत्नि रानी की दासी थी। और नित्य प्रति रानी की सेवा हेतु महल में जाया करती थी। जब वो उस कंगन पहन कर रानी के समक्ष गई तो वह कंगन पर इतनी मोहित हुई कि पुजारी की पत्नि से मुँह मांगी कीमत पर उससे कंगन ले लिया। और उसे कहा कि हमें शाम तक इस कंगन के साथ वाला दूसरा जोड़ा भी चाहिए। ताकि मैं अपनी दोनों कलाइयों में कंगन पहन सकूं। अगर तूने मुझे दूसरा कंगन लाकर नहीं दिया तो तुम्हारे लिए मृत्यु दंड निश्चित है। पुजारी की पत्नि ने जब यह वृतांत घर आकर अपने पति को बताया तो उसके तो हाथ पैर ही फूल गए। क्योंकि ऐसा सुंदर दिव्य कंगन तो केवल गंगा मईया के ही पास था। और मईया भला मुझे अपना कंगन क्यों देंगी? यह तो सिर्फ रविदास जी के ही बस की बात है। बहुत सोचने के बाद पुजारी ने रविदास जी के समक्ष पूरा घटनाक्रम रखने में ही समझदारी समझी। और कहा कि कृपया मुझे एक दमड़ी और देने का कष्ट करें। ताकि मैं गंगा मईया से दूसरा कंगन लाकर मृत्यु दंड से मुक्ति पा सकूं।

श्री रविदास जी पुजारी की बात सुनकर मुस्कुरा पड़े। और बोले विप्रवर कहाँ आप इतनी मशक्कत करते फिरेंगे। देखिए मेरे इस कठौते में भी तो जल है। और गंगा जी में जल है। अगर गंगा जल से मईया प्रकट हो सकती है तो मेरे इस कठौते के जल में क्या कमी है? आप डालिए कठौते में हाथ, विश्वास कीजिए गंगा मईया भीतर ही आपके लिए कंगन लिए बैठी होंगी। हाथ डालकर स्वयं ही निकाल लीजिए। पुजारी को यह सुनकर रविदास जी पर क्रोध तो बहुत आया लेकिन उनकी बात मानने के अलावा उसके पास कोई चारा भी तो नहीं था। पुजारी ने कठौते में हाथ डाला तो एक बार फिर महान आश्चर्य घटित हुआ। पुजारी की उंगली में सचमुच कंगन अटका। जब उसने अपना हाथ बाहर खींचा तो उसकी हैरानी की कोई हद न रही। क्योंकि उसके हाथ में एक कंगन नहीं अपितु कंगन में अटके अनेकों कंगनों की एक लंबी श्रृंखला थी। श्री रविदास जी बोले कि अरे विप्रवर आपको तो सिर्फ एक की कंगन चाहिए था न। बाकी मईया के पास ही रहने दें। श्री रविदास जी के भक्ति भाव के आगे पुजारी का मिथ्या अहंकार टूटकर चूर−चूर हो गया। वह श्री रविदास जी के चरणों में गिर कर सदा के लिए उनकी शरणागत हो गया। और तभी से यह कहावत जगत विख्यात हो गई−'मन होवे चंगा तो कठौती में गंगा।' 

- सुखी भारती







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