Gyan Ganga: ऐसा क्या हुआ कि श्री लक्ष्मण भी सुग्रीव के वध को तत्पर हो उठे

Gyan Ganga: ऐसा क्या हुआ कि श्री लक्ष्मण भी सुग्रीव के वध को तत्पर हो उठे

श्रीसीता जी श्रीराम जी के लिए कोई पत्नी मात्र नहीं हैं, अपितु साक्षात जगत जननी हैं, आदि शक्ति जगदम्बा जी हैं। श्रीसीता जी जहाँ विद्यमान हैं, वहाँ समस्त रिद्धियाँ-सिद्धियाँ व कुबेर के खजाने उनकी सेवा में रत रहते हैं।

श्री लक्ष्मण जी क्रोधित हों और धरा कंपायमान न हो, भला यह कैसे हो सकता है। लेकिन सुग्रीव को इस महान विपदा की आहट ही नहीं थी। यह बिल्कुल वैसे था जैसे नदी किनारे बैठा बगुला चोंच में पकड़ी मछली से खेलने में मस्त होता है। बाबा फ़रीद जी गुरूबाणी में इन भावों को बड़े सुंदर उदाहरण से लिखते हैं-

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‘फरीदा दरीआवै कंन्है बगुला बैठा केल करे।।

केल करेदे हंझ नो अचिंते बाज पए।।

बाज पए तिस रबु दे केलां विसरीआं।।

जो मनि चिति न चेते सनि सो गाली रब कीआं।।’

अर्थात दरिया के किनारे बैठे बगुले को प्रभु जब मछली के रूप में भोजन देता है, तो वह इसे प्रभु का प्रसाद न समझकर और प्रभु का धन्यवाद करने की बजाये उस मछली में ही मस्त हो जाता है। कभी व मछली को ऊपर हवा में उछालता है। तो कभी अन्य क्रीड़ा में व्यस्त रहता है। उसे भान ही नहीं होता, कि उस पर भी किसी शिकारी की पैनी दृष्टि बनी हुई है। वह पैनी दृष्टि वाला शिकारी बाज़ होता है। बगुला तो स्वयं को सब प्रकार से निर्भय व सुरक्षित मान कहीं देख ही नहीं रहा होता है। लेकिन पलक झपकते ही शिकारी बाज़ कब बगुले को झपटकर ले उड़ता है, पता ही नहीं चलता। 

ठीक इसी प्रकार सुग्रीव भी मानो मान ही बैठा था कि अब हम राजा हैं। भला हमें कौन कुछ कहने वाला है। हमारा मन जो कहेगा, हम वही करेंगे। और भगवान श्रीराम जी को तो उसने अपने स्तर पर जाँच ही लिया था। जिसमें उसने अवश्य ही यह निष्कर्ष निकाला होगा कि अरे प्रभु तो बस मस्त हैं अपने प्रभुत्व में। उन्हें भला क्या लेना देना, कि हम उनके साथ लगे कि नहीं। वे तो दानी हैं, अवतार व महापुरूष हैं। भला उन्हें क्या अंतर पड़ता है कि हम उनके साथ खड़े होते हैं अथवा नहीं। राज्य नहीं मिला तो कौन सा उन्होंने शोक मनाया। इसी प्रकार उन्हें श्री सीता जी भी नहीं मिलेंगी तो कौन-सा प्रभु धरती फाड़ डालेंगे। निःसंदेह सुग्रीव ने अगर ऐसा ऊल-जलूल सोचा भी होगा तो अटल सत्य है कि उसने अपने जीवन की बहुत भारी गलती की थी। क्योंकि श्रीराम जी को अयोध्या का राज सिंघासन प्राप्त हो अथवा न हो, प्रभु को रत्ती भर अंतर नहीं पड़ता। लेकिन श्री सीता जी का मूल्याँकन किसी राज तख्त के आधार पर थोड़ी न किया जा सकता है? श्रीसीता जी और ब्रह्माण्ड के समस्त राज पाट भी तुला के एक तोल में हों, तो सब मिलकर भी एक कण मात्र भी नहीं हैं। कारण कि श्रीसीता जी श्रीराम जी के लिए कोई पत्नी मात्र नहीं हैं, अपितु साक्षात जगत जननी हैं, आदि शक्ति जगदम्बा जी हैं। श्रीसीता जी जहाँ विद्यमान हैं, वहाँ समस्त रिद्धियाँ-सिद्धियाँ व कुबेर के खजाने उनकी सेवा में रत रहते हैं। सबसे बड़ा कारण तो हमने बयाँ ही नहीं किया। वह यह कि श्रीसीता जी साक्षात भक्ति हैं और श्रीराम जी के अवतार धारण करने के पीछे तो उद्देश्य ही यह था कि संपूर्ण प्राणियों के भीतर भक्ति की स्थापना हो। भक्ति का संचार ही श्रेष्ठ समाज के निर्माण का मूल सूत्र है। तो भला वह मुख्य आधार ही श्रीराम जी के हाथों से फिसल जाये, तो प्रभु भला चुप बैठे रहेंगे? क्योंकि यह तो कुछ ऐसा था कि गन्ने में से रस निकाल लिया जाये और पीछे गन्ना छोड़ दिया जाये तो हाथ क्या लगता है? शून्य ही न! और प्रभु ऐसी शून्य पाकर सब्र कर लें, इतने बड़े दिल वाले तो प्रभु श्रीराम जी नहीं थे। एक साधारण सा मनुष्य ज़रा से नाखून कटने पर बवाल कर देता है। ऐसे में उसका सिर काटने निकलो, और वह कुछ न बोले, भला यह किसी भी प्रकार से संभव था क्या? 

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ठीक इसी प्रकार श्रीसीता जी भी श्रीराम जी का पावन शीश थी। तो इसमें भला प्रभु कैसे समझौता कर सकते थे। सुग्रीव क्योंकि श्रीसीता जी की खोज का मुख्य स्तंभ था, तो उसका अपनी भूमिका से यूँ च्युत हो जाना प्रभु को कैसे स्वीकार हो सकता था? सो प्रभु ने सुग्रीव वध की घोषणा कर दी। और जैसा कि विगत अंक में हमने पाया था कि श्रीराम जी हृदय से तो सुग्रीव को मृत्यु प्रदान नहीं करना चाहते थे, किंतु बाहरी आचरण से प्रभु अतिअंत कठोर प्रतीत हो रहे थे। और प्रभु ने जब देखा कि श्रीलक्ष्मण जी ने तो सुग्रीव को मारने हेतु अपना धनुष बाण भी उठा लिया है, तो प्रभु ने सोचा कि यह तो ठीक नहीं हुआ। हम तो चलो विष्णु अवतार हैं। एक बार के लिए अपना स्वभाव बदल भी सकते हैं। पर श्रीलक्ष्मण जी तो साक्षात शेषनाग जी का अवतार हैं। उन्होंने अगर संकल्प कर लिया कि सुग्रीव का वध करना ही करना है, तो फिर सुग्रीव का बचना असंभव है। प्रभु ने सोचा कि श्रीलक्ष्मण जी को ही समझाना पड़ेगा। श्रीराम जी श्रीलक्ष्मण जी को बोले कि हे प्रिय अनुज! निःसंदेह सुग्रीव ने जो किया है, वह निश्चित ही दण्ड योग्य है। और उसके लिए हम तत्पर भी हैं। लेकिन हम सोच रहे हैं कि सुग्रीव कैसा भी है, कितने भी विषयों में रत क्यों न हो। किंतु तब भी उसमें पुनः हमारी सेवा में लौटने का अवसर दिखाई प्रतीत हो रहा है। देखो प्रिय लक्ष्मण शरीर का कोई अंग अगर किसी व्याधि से खराब भी हो जाये तो उसे ठीक करने के समस्त उपलब्ध प्रयास करने चाहिए। जब लगे कि अब उस अंग का रोग असाध्य हो गया है, और उसके ठीक होने की संभावना तो शून्य है ही, साथ में यह अंग अन्य अंगों पर भी घातक व हानिकारक प्रभाव डाल रहा है, तो ऐसे हालात में उसे काटकर शरीर से विलग करना ही श्रेष्कर होता है। सुग्रीव को समझाने को अंतिम प्रयास करने में आपत्ति ही क्या है। वरना दण्ड तो अंतिम विकल्प है ही। इसलिए हे प्रिय अनुज लक्ष्मण! आवश्यक नहीं कि धनुष पे चलने वाला बाण ही किसी का हृदय भेदन करता है। बाण का कार्य कभी जुबाँ से भी लेना चाहिए। प्रिय अनुज सुग्रीव के चरित्र पर आपने कभी तनिक भी गंभीरता से चिंतन किया होगा तो आपने उसका एक अवगुन अवश्य दृष्टिपात किया होगा। उस अवगुण में बला का सदप्रभाव है। निश्चित ही उस अवगुण के बल पर हम सुग्रीव को पुनः पथ पर ला सकते हैं। श्रीलक्ष्मण जी प्रश्न वाचक दृष्टि से श्रीराम जी को निहार रहे हैं कि अब श्रीराम जी सुग्रीव के कौन से अवगुण का चुनाव किया है, जिससे मैं अवगत नहीं हूँ। यही समाधान हेतू श्रीलक्ष्मण जी श्रीराम जी की और निहार रहे हैं।

क्या था सुग्रीव का वह अवगुण, जानने के लिए प्रभु महिमा स्तंभ अवश्य पढ़ते रहें...(क्रमशः)...जय श्रीराम...

-सुखी भारती