Gyan Ganga: ऐसा क्या हुआ कि राक्षसी लंकिनी हनुमानजी को प्रेम से पुकारने लगी थी?

Gyan Ganga: ऐसा क्या हुआ कि राक्षसी लंकिनी हनुमानजी को प्रेम से पुकारने लगी थी?

क्षण भर में ही लंकिनी को श्रीहनुमान से इतना क्या प्रेम हुआ कि वह श्रीहनुमान जी को तात कह-कहकर पुकार रही है। और उनके द्वारा कराया गया सतसंग, समस्त देवलोक व स्वर्ग लोकों से भी अधिक श्रेष्ठ मान रही है। इस विषय पर हमें गहन चिंतन करने की आवश्यकता है।

जैसा कि हमने विगत अंक में कहा था कि लंकिनी को श्रीहनुमान जी का घूँसा पड़ा तो वह बेहोश होकर गिर गई। श्रीहनुमान जी को अब अपना मार्ग निष्कंटक जान लंका नगरी में प्रवेश कर जाना चाहिए था। लेकिन वे लंका नगरी में प्रवेश नहीं करते। अपितु वहीं, लंकिनी के समीप ही, लंकिनी के पुनः होश में आने का इन्तज़ार करने लगते हैं। यह लगभग तय था कि लंकिनी होश में आने के पश्चात और अधिक खूंखार होकर उठेगी और निश्चित ही श्रीहनुमान जी पर जानलेवा आक्रमण करेगी। लेकिन गोस्वामी जी कहते हैं, कि लंकिनी होश में तो आई, लेकिन होश में आने के पश्चात वह कोई आक्रामक तेवर लेकर व्यवहार नहीं करती, अपितु उसके शब्द सुनकर तो हमारे आश्चर्य का पारावार ही नहीं रहता-

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‘तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।’

लंकिनी कहती है, कि हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए और तराजू के दूसरे पलड़े में उस सतसंग के क्षण भर के सुख को रखा जाए, तो भी वे सब सुख मिलकर उसके बराबर नहीं हो सकते, जो सुख सतसंग के क्षण भर में आपने अभी-अभी मुझे करवाया है। यहाँ यही तो आश्चर्य की बात है, कि श्रीहनुमान जी ने भला कौन से सतसंग का यहाँ आयोजन कराया था, जिस सतसंग में लंकिनी को इतना सुख प्राप्त हुआ। सतसंग तो कहीं हुआ नहीं दिखता, लेकिन हाँ, लठसंग वहाँ अवश्य हुआ प्रतीत होता है। कारण कि श्रीहनुमान जी ने लंकिनी को भजन संकीर्तण सुनाया, अथवा कोई प्रवचन सुनाये, ऐसा तो वहाँ कोई वर्णन ही नहीं है। हाँ, लेकिन लंकिनी को घूँसा मारा, यह वर्णन अवश्य है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि लंकिनी तो एक बार भी नहीं कहती, कि मुझे श्रीहनुमान जी ने घूँसा मारा। अपितु कहती है कि श्रीहनुमान जी ने मेरा सतसंग करवाया। क्या वाकई में श्रीहनुमान जी ने सतसंग ही करवाया था, अथवा लठसंग ही करवाया था। या फिर लंकिनी श्रीहनुमान जी से भय के मारे यह कह रही थी। जी नहीं! लंकिनी सचमुच में भयमुक्त होकर ही, यह सब कह रही थी। इसके पीछे वह कारण भी बताती है, कि मुझे ब्रह्मा जी की वाणी सत्य सिद्ध होती दिख पड़ी है। ब्रह्मा जी ने मुझे एक बार यह वरदान दिया था, कि जब मैं एक वानर के प्रहार से व्याकुल हो जाऊँ, तो जानना कि अब राक्षसों का संहार निश्चित है-

‘बिकल होसि तैं कपि कें मारे।

तब जानेसु निसिचर संघारे।।

तात मोर अति पुन्य बहूता।

देखेउँ नयन राम कर दूता।।’

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लंकिनी श्रीहनुमान जी पर इतना स्नेह कर रही है, कि वह उन्हें ‘तात’ कह कर संबोधित कर रही है। तात उसे कहा जाता है, जिसे कोई इतना स्नेह करे, जितना एक गाय बछड़े को जन्म देते समय करती है। सोचिए क्षण भर में ही लंकिनी को श्रीहनुमान से इतना क्या प्रेम हुआ कि वह श्रीहनुमान जी को तात कह-कहकर पुकार रही है। और उनके द्वारा कराया गया सतसंग, समस्त देवलोक व स्वर्ग लोकों से भी अधिक श्रेष्ठ मान रही है। इस विषय पर हमें गहन चिंतन करने की आवश्यकता है। लंकिनी और श्रीहनुमान जी के मध्य घटा यह दिव्य प्रसंग, हमें सोचने पर विवश करता है कि आखिर श्रीहनुमान जी ने जो सतसंग लंकिनी को सुनाया, उसका प्रभाव महान व अद्वितीय है। क्षण भर में एक राक्षसी, अपनी राक्षसी व आसुरी वृति त्याग साधुता अपना लेती है। जबकि उसी स्थान पर संसार में अनेकों स्थानों पर अनेकों विद्वत जनों द्वारा भजन संकीर्तनों व सुंदर प्रवचनों द्वारा धर्म उपदेश दिए जा रहे थे। जो कि आज के समय में भी अनवरत् जारी है। लेकिन आश्चर्य की बात है, कि जैसा परिवर्तन श्रीहनुमान जी द्वारा अपनाये गए लठसंग रूपी सतसंग से आया, वैसा परिर्वतन प्रेम प्यार से किए गये सतसंग से नहीं आ पा रहा। निश्चित ही इसके पीछे एक गहन, दिव्य व महान रहस्य है। वह महान रहस्य यह है, कि जिसे हम सतसंग मान बैठे हैं, वह वास्तव में सतसंग नहीं है। उसे शास्त्रों में ‘हरिकथा’ कहा गया है। सतसंग शब्द का तो अर्थ ही है, कि जिसे ‘सत्य’ का संग हो गया हो। सत्य का अर्थ है परमात्मा। अर्थात जिसे परमात्मा का संग हो जाये। उस अवस्था को ही ‘सतसंग’ कहा गया है। कहने का तात्पर्य कि परमात्मा मात्र बातों का विषय नहीं है। परमात्मा का हम अपने अंर्तघट में साक्षात दर्शन कर सकते हैं। जिस समय हमें कोई संत महापुरुष मिलते हैं, तो वे केवल मात्र बाहरी उपदेश ही नहीं देते। अपितु साथ में हमारी दिव्य दृष्टि खोलकर, हमें भीतर ही प्रकाश रूप परमात्मा का दर्शन करवाते हैं। जब हम परमात्मा का दर्शन करते हैं, उसी अवस्था को कहा गया है कि हमारा सत्य के साथ संग हो गया है। और लंकिनी के साथ श्रीहनुमान जी ने यही सतसंग किया था। कारण कि साधु जब हमें अपना स्पर्श प्रदान कर देते हैं, तो उनकी दिव्य आध्यात्मिक तरंगें, हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती हैं। जिससे हमारे मस्तक पर स्थित दसवाँ द्वार खुल जाता है। और हमें परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार यही वास्तविक सतसंग है। और यही सतसंग श्रीहनुमान जी ने लंकिनी का करवाया था। और इसी सतसंग की आवश्यक्ता जन-जन को है। तभी संसार में शाँति आयेगी। क्योंकि श्रीराम जी के अवतरण का यही वास्तविक लक्ष्य है। आगे श्रीहनुमान जी लंका में कैसे प्रवेश करते हैं, जानेंगे अगले अंक में...(क्रमशः...)...जय श्रीराम।

-सुखी भारती