पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव- रिजल्ट के बाद बदल जाएगी देश की राजनीति

इन राज्यों के ये विधानसभा चुनाव तकनीकी दृष्टि से तो यह तय करेंगे कि यहां की जनता ने अगले 5 वर्षों के लिए किस पार्टी की सरकार को चुना है। लेकिन राजनीतिक वास्तविकता तो यही है कि यह सही मायनों में मिनी इंडिया का चुनाव है जिसे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए एक मिड टर्म जनमत संग्रह के तौर पर भी देखा जा सकता है।
देश के केंद्रीय चुनाव आयोग ने रविवार को चार महत्वपूर्ण राज्यों- केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम के साथ ही एक केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया। केरल, असम और पुडुचेरी में एक ही चरण में 9 अप्रैल को मतदान होगा। वहीं तमिलनाडु में भी एक ही चरण में राज्य की सभी 234 सीटों पर 23 अप्रैल को वोटिंग होगी। पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव आयोग ने सिर्फ दो ही चरण में- 23 और 29 अप्रैल को मतदान करवाने की घोषणा की है। इन सभी राज्यों में मतगणना 4 मई को होगी।
इन राज्यों के ये विधानसभा चुनाव तकनीकी दृष्टि से तो यह तय करेंगे कि यहां की जनता ने अगले 5 वर्षों के लिए किस पार्टी की सरकार को चुना है। लेकिन राजनीतिक वास्तविकता तो यही है कि यह सही मायनों में मिनी इंडिया का चुनाव है जिसे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए एक मिड टर्म जनमत संग्रह के तौर पर भी देखा जा सकता है।
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एनडीए बनाम इंडिया गठबंधन के बीच केंद्रित होती जा रही देश की राजनीति में अभी भी कई क्षेत्रीय दल ऐसे हैं जो केंद्र के स्तर पर तो गठबंधन की राजनीति करना चाहते हैं लेकिन अपने-अपने राज्यों में वो सत्ता को बांटना नहीं चाहते हैं। इस लिहाज से अगर देखा जाए तो पांच राज्यों के ये विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ गठबंधनों के लिए भी अस्तित्व बचाने के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हो गए हैं।
असम में पिछले 10 वर्षों से बीजेपी की सरकार है। कांग्रेस पार्टी की सरकार के दौरान राज्य के सुपर चीफ मिनिस्टर माने जाने वाले हिमंत बिस्वा सरमा वर्तमान में बीजेपी के मुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आने के बाद सरमा ने न केवल वर्ष 2016 और 2021 के लगातार दो विधानसभा चुनावों में असम में कांग्रेस को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई बल्कि पूरे नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में कांग्रेस के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया। इसलिए असम का यह विधानसभा चुनाव कांग्रेस खासकर गांधी परिवार के लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गया है।
इसलिए राहुल गांधी ने दिग्गज नेताओं की फौज के साथ ही प्रियंका गांधी को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर असम में उतार दिया है। अगर हिमंत बिस्वा सरमा असम में लगातार तीसरी बार बीजेपी को जीत दिला पाने में कामयाब हो जाते हैं तो वो भी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री बनने के संभावित दावेदारों की सूची में शामिल हो जाएंगे। लेकिन अगर कांग्रेस उन्हें हरा पाने में कामयाब हो जाती है तो एक तरफ जहां नॉर्थ ईस्ट के अन्य राज्यों में कांग्रेस के अच्छे दिनों की वापसी हो जाएगी वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भी राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ती हुई नज़र आएगी।
असम की तरह केरल में भी कांग्रेस पार्टी पिछले दो विधानसभा चुनाव हार कर 10 वर्षों से राज्य की सत्ता से बाहर है। एक बार लेफ्ट फ्रंट ( LDF) और एक बार कांग्रेस वाले फ्रंट ( UDF ) की सरकार के रिवाज को बदलते हुए 2021 में लगातार दूसरी बार राज्य में सरकार बनाकर लेफ्ट दलों ने नया इतिहास बना दिया था। केरल लेफ्ट दलों का आखिरी दुर्ग है जिसे अगर वो नहीं बचा पाए तो फिर आने वाले दिनों में ये दल सिर्फ इतिहास और एकेडमिक बहसों का हिस्सा मात्र बन कर रह जाएंगे। वहीं अगर कांग्रेस लगातार तीसरी बार केरल में चुनाव हार गई तो फिर वहां आने वाले दिनों में बीजेपी के नेतृत्व में एक नया गठबंधन मजबूती से उभरता हुआ नजर आएगा। केरल की हार कांग्रेस को दिल्ली की सत्ता से और दूर कर देगी।
पश्चिम बंगाल में एक तरफ जहां क्षेत्रीय दल तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भी इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया है। वर्ष 2011 से लगातार बंगाल की सत्ता में बनी हुई ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सरकार बनाने के लिए मैदान में है जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में 3 से बढ़कर सीधे 77 पर पहुंचने वाली बीजेपी को यह बखूबी मालूम है कि इस बार की हार बंगाल में उसके पार्टी संगठन को बुरी तरह से तहस-नहस कर देगी।
तमिलनाडु का विधानसभा चुनाव दोनों क्षेत्रीय दलों- सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके और विपक्षी एआईएडीएमके के लिए महत्वपूर्ण है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों इस राज्य में साइड एक्टर की भूमिका में है। यहां दोनों क्षेत्रीय दलों में से जिसको भी सत्ता मिलेगी, वह पूरी हिस्सेदारी के साथ केंद्र में अपने गठबंधन को मजबूत बनाता हुआ ही नज़र आएगा।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के नतीज़े यह भी बताएंगे कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दलों की देश की राजनीति में क्या भूमिका रहने वाली है। ममता बनर्जी और स्टालिन की जीत अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव को हर तरीके से नई ताकत देते हुए नज़र आएगी और इनकी हार कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी पर हावी होने का मौका दे देगी। पुडुचेरी में बीजेपी एनडीए गठबंधन की सरकार की वापसी की लड़ाई लड़ रही है।
यह स्पष्ट है कि इन विधानसभा चुनावों में जहां एक तरफ कांग्रेस और बीजेपी जैसे राष्ट्रीय दलों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है वहीं तृणमूल कांग्रेस , डीएमके और एआईएडीएमके जैसे मजबूत क्षेत्रीय दलों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। ये चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राहुल गांधी, ममता बनर्जी, एम के स्टालिन और हिमंत बिस्वा सरमा जैसे कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य को भी तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला चुनाव है।
- संतोष कुमार पाठक
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं
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