क्या जदयू में निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी एंट्री के राजनीतिक असर दूरगामी होंगे?

कहना न होगा कि पहले 20 साल तक यानी 1985 से 2025 तक नीतीश कुमार ने व्यक्तिगत संघर्ष की राजनीति की और बाद के 20 वर्षों तक यानी 2005 से 2025 उन्होंने सत्ता संघर्ष की राजनीति की। इसी कशमकश में बिहार के पुनर्निर्माण के उनके सपने वैचारिक कुपोषण, प्रशासनिक धूर्तता के शिकार हो गए और पूरी तरह से जवान नहीं हो पाए।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अविवाहित इंजीनियर पुत्र निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी लॉन्चिंग से बिहार की राजनीति में दूरगामी असर पड़ना लाजिमी है। चूंकि वह अपने प्रगतिशील और यशस्वी पिता की प्रगतिशील समाजवादी सियासत को संभालेंगे, इसलिए कुछ बातें स्पष्ट हैं। वह यह कि अब तीन बड़े स्तरों पर इस पूरे घटनाक्रम का असर पड़ेगा– सत्ता संतुलन, जेडीयू की आंतरिक राजनीति और राज्य की व्यापक सियासी प्रतिस्पर्धा। इसके अलावा कुछ मौलिक सवाल भी उभरेंगे, जिनकी चर्चा पहले लाजिमी है। स्वाभाविक सवाल है कि क्या जदयू में निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी एंट्री के राजनीतिक असर दूरगामी होंगे? हालांकि इसका जवाब गुजशते वक्त की कोख में पल रहा है, जो समय के साथ स्पष्ट होता जाएगा।
पहला यह कि उनके पिता नीतीश कुमार अब शारीरिक रूप से अस्वस्थ होकर 'विलासितापूर्ण' सदन राज्यसभा की ओर रुखसत हो चुके हैं, जबकि बिहार के पुनर्निर्माण के उनके सपने अभी भली भांति पूर्वक जवान भी नहीं हो पाए हैं। इसलिए उन्हें उचित नीतिगत पोषण प्रदान करते हुए जवान करने की जिम्मेदारी अब टीम निशांत कुमार की होगी।
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कहना न होगा कि पहले 20 साल तक यानी 1985 से 2025 तक नीतीश कुमार ने व्यक्तिगत संघर्ष की राजनीति की और बाद के 20 वर्षों तक यानी 2005 से 2025 उन्होंने सत्ता संघर्ष की राजनीति की। इसी कशमकश में बिहार के पुनर्निर्माण के उनके सपने वैचारिक कुपोषण, प्रशासनिक धूर्तता के शिकार हो गए और पूरी तरह से जवान नहीं हो पाए।
दूसरा यह कि जनता दल यूनाइटेड की सहयोगी पार्टी भाजपा भले ही राष्ट्रीय समाजवादी राजनीति की तरह ही सूबाई समाजवादी राजनीति के प्रतिबिंब जदयू को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ चुकी है, लेकिन पुनः सियासी धोबिया पाट पर राजनीतिक चोट देते हुए जदयू को देश-प्रदेश में पुनः बड़े भाई का दर्जा दिलवाने के सारे दारोमदार अब निशांत कुमार के कंधे पर होंगे। संदेश स्पष्ट है कि बड़े सपने देखेंगे तो उड़ीसा के नवीन पटनायक की तरह सफलतापूर्वक भविष्य में राज करेंगे, अन्यथा चिराग पासवान की तरह बीजेपी के आगे सियासी दुम हिलाते नजर आएंगे। यदि ऐसा हुआ तो यही समझा जाएगा कि बिहार के चाणक्य नीतीश कुमार ने अपनी पुत्र को समुचित राजनीतिक शिक्षा दिए ही उनकी लॉन्चिंग करवा दी। कुछ ऐसे ही सवाल लोगों के जेहन में उठ भी रहे हैं।
तीसरा यह कि जेडीयू और उसके सत्ता समीकरण पर इसका सीधा असर पड़ेगा। क्योंकि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और संभावित नेतृत्व परिवर्तन के साथ निशांत को डिप्टी सीएम/मुख्य चेहरा बनाने की तैयारी है, जिससे जेडीयू में नेतृत्व का खालीपन भरने की कोशिश होगी। यह कदम बीजेपी–जेडीयू गठबंधन में निरंतरता का संदेश देगा कि नीतीश भले पटना से दिल्ली शिफ्ट हों, पर “उनका आदमी/परिवार” सत्ता में रहेगा, जिससे अचानक अस्थिरता की संभावना घटेगी। लेकिन इसके दूरगामी असर नकारात्मक भी हो सकते हैं।
चौथा यह कि जेडीयू की आंतरिक राजनीति भी इस घटनाक्रम से प्रभावित होगी। ऐसा इसलिए कि जेडीयू के कई एमएलए–एमपी ने खुले तौर पर मांग की कि निशांत ही पार्टी को “एकजुट रख सकते हैं”, जो यह दिखाता है कि नेतृत्व संकट से बचने के लिए संगठन परिवारवाद को स्वीकार कर चुका है। इससे पुराने कद्दावर नेताओं के बीच पद–प्रतिष्ठा को लेकर खींचतान बढ़ सकती है क्योंकि अचानक एक नए, राजनीतिक रूप से अनुभवहीन चेहरे को शीर्ष पर लाना वरिष्ठों की महत्वाकांक्षाओं से टकराएगा।
पांचवां यह कि इस बड़े बदलाव से जदयू के वंशवाद बनाम सुशासन की छवि टकराएगी, क्योंकि नीतीश लंबे समय से वंशवाद के खिलाफ बोलते रहे हैं; और अब बेटे की लॉन्चिंग से उनकी राजनीतिक व वैचारिक साख और “सुशासन बाबू बनाम पारिवारिक राजनीति” वाली नैरेटिव पर विपक्ष को मजबूत हमला करने का मौका मिलेगा। वहीं, आरजेडी–कांग्रेस सहित विपक्ष इसे “डबल स्टैंडर्ड” कहकर भुनाएगा, जिससे सामाजिक न्याय बनाम परिवारवाद की पुरानी बहस फिर तेज होगी और यादव–गैर लवकुश ओबीसी–अल्पसंख्यक वोटों की समीकऱण राजनीति और ज्यादा आक्रामक हो सकती है, जिसकी धार नीतीश कुमार और भाजपा मिलकर कुंद कर चुकी हैं।
छठा यह कि जदयू के इस घटनाक्रम का सूबाई युवा और सामाजिक आधार पर भी संभावित प्रभाव पड़ेगा। अब जदयू पार्टी के भीतर से यह तर्क दिया जा रहा है कि निशांत के आने से युवा वोटर और पढ़ा–लिखा मध्यवर्ग जुड़ सकता है, लेकिन यह तभी होगा जब वे जल्दी ज़मीनी राजनीति सीखकर स्वतंत्र छवि बना पाएं। अभी के लिए उनका पूरा राजनीतिक वैधता पूंजी “नीतीश के बेटे” होने से आती है; अगर प्रशासनिक या संगठनात्मक क्षमता जल्दी साबित न हुई तो वे सिर्फ प्रतीकात्मक वारिस बनकर रह सकते हैं, जिससे जेडीयू की गिरती सामाजिक पकड़ नहीं रुक पाएगी।
सातवां यह कि निशांत कुमार की लॉन्चिंग का बिहार की व्यापक सियासत में लंबी अवधि का असर पड़ेगा। निकट भविष्य में यह कदम बीजेपी–जेडीयू सरकार को स्थायित्व देगा, लेकिन मध्यम अवधि में यह तय करेगा कि नीतीश के बाद जेडीयू स्वतंत्र शक्ति बनी रहती है या भाजपा पर और अधिक निर्भर हो जाती है। ऐसा इसलिए कि यदि निशांत कुमार पार्टी के अंदर स्वीकार्यता बना लेते हैं और संगठन पर पकड़ मजबूत कर लेते हैं, तो वे आने वाले चुनावों में जेडीयू को “पोस्ट-नीतीश” दौर में भी प्रासंगिक रख सकते हैं; वहीं यदि असफल रहे तो बिहार की राजनीति और ज़्यादा द्विध्रुवीय (बीजेपी बनाम आरजेडी–कांग्रेस) हो सकती है और जेडीयू हाशिये पर जा सकता है।
आठवां यह कि निशांत की एंट्री ने नीतीश कुमार के सालों पुराने एंटी वंशवाद नैरेटिव को सीधे काट दिया और बिहार में लगभग सभी बड़े नेताओं के परिवारवाद को एक साथ एक्सपोज़ कर दिया। इससे यह साफ दिखने लगा कि ‘वंशवाद विरोध’ ज्यादातर नैतिकता नहीं, बल्कि अवसरवादी राजनीति की भाषा थी। इस मुद्दे पर नीतीश का यू टर्न और नैतिकता का संकट खड़ा हो गया है। नीतीश खुद को कर्पूरी ठाकुर की परंपरा का मानते रहे, जो बेटे को राजनीति से दूर रख कर वंशवाद के खिलाफ उदाहरण बताए जाते हैं।
नौवां यह कि, कई दशक तक वे लालू प्रसाद, कांग्रेस और अन्य दलों पर परिवारवाद का हमला बोलते रहे; और अब उसी मॉडल पर अपने बेटे निशांत को सीधे उत्तराधिकारी की तरह आगे कर रहे हैं। जिस तरह से राज्यसभा जाने और बेटे के लिए स्पेस बनाने के लिए उन्होंने राजनीतिक पटकथा लिखी है, उससे उनकी समाजवादी राजनीति पर भी सवाल उठना लाजिमी है। बताया जाता है कि विपक्ष (जैसे RJD) ने इसे तुरंत पकड़ लिया कि जिसने हमेशा नेपोटिज़्म को कोसा, वही अब “अपने उत्तराधिकारी को सेट” कर रहा है, यानी नैतिक ऊँचाई ढह गई।
दसवां यह कि बिहार की ओबीसी/दलित ‘राजवंशी’ राजनीति अब खुलकर सामने आ चुकी है। पहले से ही तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी के बेटे संतोष सुमन, उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक आदि खुले तौर पर पिता की विरासत संभाल रहे थे। इसी कड़ी में नीतीश पुत्र निशांत की एंट्री के बाद तस्वीर और साफ हो गई कि लगभग हर प्रमुख सामाजिक राजनीतिक धड़े का नेतृत्व अब “पॉलिटिकल वंशजों” के हाथ में जा रहा है, यानी पूरा सत्ता-संतुलन परिवारों के इर्द गिर्द घूम रहा है।
ग्यारहवां यह कि प्रशांत किशोर व अन्य आलोचकों ने राजनीतिक पाखंड उजागर किया। प्रशांत किशोर ने सीधे सवाल उठाया कि जो नेता जीवन भर वंशवाद के विरोध का दावा करते रहे, वे आज अपने ही बेटे के लिए जगह बना रहे हैं; यानी ‘सिद्धांत’ दरअसल सत्ता और परिवार के हिसाब से बदलने वाली चीज़ है। वहीं, राजद नेताओं ने भी कहा कि नीतीश अब उसी रास्ते पर चल पड़े हैं, जिसको वे लालू परिवार की राजनीति में दोष बताते थे; इससे “हम अलग हैं” वाला दावा कमजोर हो गया।
बारहवां यह कि युवाओं के मुद्दों बनाम राजनीतिक वंश की कशमकश अब तेज होगी। क्योंकि निशांत की लॉन्चिंग बहस के साथ ही बेरोजगारी, पलायन और सुशासन बनाम परिवारवाद जैसे सवाल फिर उभरे हैं: क्या नई पीढ़ी के लिए नेतृत्व का मतलब सिर्फ नेताओं के बच्चे होंगे या आम कार्यकर्ता/युवा भी ऊपर आएंगे? वहीं जदयू और सहयोगी इसे “नई पीढ़ी का नेतृत्व” कह कर बचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह तर्क भी उसी समय कमजोर पड़ जाता है जब टिकट, पद और कुर्सी लगभग पूरी तरह परिवारों में सिमटते दिखते हैं।
स्वाभाविक सवाल है कि क्या जदयू में निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी एंट्री के राजनीतिक असर दूरगामी होंगे? हालांकि इसका जवाब गुजशते वक्त की कोख में पल रहा है, जो समय के साथ स्पष्ट होता जाएगा।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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