Gyan Ganga: जब भगवान श्रीराम ने हनुमान जी के सभी उलाहनों का दिया जवाब

Gyan Ganga: जब भगवान श्रीराम ने हनुमान जी के सभी उलाहनों का दिया जवाब

हे हनुमंत! तुम तो लक्ष्मण से भी चार कदम आगे निकले। लक्ष्मण ने तो पिता जी की आज्ञा के पश्चात् ही वनवास की डगर पकड़ी। लेकिन तुमने तो पहले से ही वनों में आकर डेरा जमा लिया। यद्यपि पिता दशरथ ने तो तब ऐसे किसी आदेश की कल्पना तक नहीं की थी।

गतांक से आगे...अभी तक तो केवल हनुमान जी ही अपने प्रेम कटोरे भर कर उड़ेले जा रहे थे। लेकिन अब शायद यह जिम्मा श्रीराम जी ने उठाने की ठान ली थी। यूं तो प्रेम को शब्दों में बांधना माने रेशम के महीन व नाजुक धागे से हिमालय पर्वत को बांधकर खींचने जैसा दुष्कर कार्य है लेकिन तब भी प्रेम की अभिव्यक्ति को शब्दों की लाठी का सहारा अकसरां लेना ही पड़ता है। श्री राम जी ने भी वह सहारा लिया तो लेकिन इतने कम शब्दों में इतना अधिक कह दिया कि कल्पना से परे हो। श्री हनुमान जी के समस्त उलाहने उनके इस एक शब्द से धड़ाधड़ धराशायी हो गए। वर्तमान भाग में इसी को 'मास्टर स्ट्रोक' की संज्ञा दी जाती है। श्री राम बोले−

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सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। 

तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।।

अर्थात् हे कपि! अपने मन में तनिक भी ग्लानि नहीं करो। क्योंकि तुम मुझे लक्ष्मण से भी दोगुने प्रिय हो। सज्जनों श्री राम जी के यह शब्द अपने−आप में अथाह रहस्यों से भण्डार समेटे हुए हैं। श्री राम जी ने वीर हनुमान के प्रति अपने प्रेम का प्रगटीकरण करने के लिए लक्ष्मण जी को ही आधार बनाया। लक्ष्मण जी की आप समर्पण, तपस्या व त्याग देखेंगे तो अद्वितीय है। वनवास तो श्री राम जी को मिला लेकिन स्वीकार साथ में श्री लक्ष्मण जी ने भी कर लिया। अपनी माता व पत्नी का त्याग कर वनों में कठिन तप को धारण कर लिया। और उस पर भी यह प्रण लिया कि चौदह वर्षों तक मैं निद्रा देवी से सर्वदा दूर रहूंगा। वनवास के पूर्व श्री लक्ष्मण हम में बड़े भाई के रूप में ही भाव रखते थे। लेकिन वन में अब मैं ही उसका पिता व सीता जी ही उनकी माता हैं। यह भाव माता सुमित्रा जी के कहने पर ही उनमें पादुर्भाव हुआ। तब से मैं ही लक्ष्मण के समस्त रिश्तों का केन्द्र बिंदू हूँ। 

लेकिन हे हनुमंत! तुम तो लक्ष्मण से भी चार कदम आगे निकले। लक्ष्मण ने तो पिता जी की आज्ञा के पश्चात् ही वनवास की डगर पकड़ी। लेकिन तुमने तो पहले से ही वनों में आकर डेरा जमा लिया। यद्यपि पिता दशरथ ने तो तब ऐसे किसी आदेश की कल्पना तक नहीं की थी। मिलन की ऐसी तड़प भला कौन रखता है। निःसंदेह लक्ष्मण जी ने निद्रा देवी का परित्याग कर अतिअंत कठिन निर्णय लिया। लेकिन हे वीर हनुमंत! तुम्हारे नयन भी तो मुद्दतों से निद्रा सुख से रूठे हुए हैं। बस चोटी पर बैठे−बैठे हमारे आने की बाट जोह रहे हो। सुग्रीव सोचता है कि चौकीदार बहुत अच्छा है, सोता ही नहीं, दिन−रात हमारी सुरक्षा में चाक−चौबंद है। लेकिन सुग्रीव को क्या पता कि जिन नयनों को अपने प्रिय स्वामी के दर्शन की तड़प लगी हो उन्हें नींद भला कहो कहाँ आती है। दिन−रात केवल विरह की धौंकनी श्वास फुला कर रखती है। नींद पलकों पर बस तैयार बैठी हो लेकिन पुतलियां एकटक जब कहीं अटकी सपाट खुली रहें तो यहाँ तो बिना प्रण के ही निद्रा देवी असहाय व व्यर्थ सिद्ध हो गई। इस पक्ष में तुमने पछाड़ दिया न लक्ष्मण को। 

फिर तुम दोनों ने ही देह धारण की तो पूर्व में दोनों ही अपने−आप में धुरंधर हो। लक्ष्मण जी शेषनाग के अवतार हैं तो आप भगवान् शंकर जी के अवतार हैं। आपको लक्ष्मण से दूना प्रिय कहने का एक अधार यह भी है कि लक्ष्मण जी शेष अवतार होने के नाते केवल काल के ही अवतार हैं। लेकिन आप तो भगवान शंकर अर्थात् साक्षात 'महाकाल' के अवतार हैं। 'काल' से महान 'महाकाल' हैं। तो कहो हुए न आप लक्ष्मण जी से भी दोगुने प्रिय−

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आगे कहुं हो हमारे लक्ष्मण जी ने तो सभी रिश्तों का निर्वाह किया। मात−पिता, भाई व गृहस्थ धर्म भी अपनाया। लेकिन आपकी धुन के क्या कहने। गृहस्थ धर्म अपनाकर नए रिश्तों की गाँठ बांधने से तो आप टले ही, साथ में जो माता−पिता का जन्मजात बंधन है उससे भी नाता तोड़े बैठे हैं। और समस्त रिश्तों की डोर एक ही डोर में गूंथकर केवल मुझमें जोड़ डाली है। तो भला मैं कैसे न कहूँ कि तुम मुझे लक्ष्मण से भी दोगुने प्रिय हो। गोस्वामी तुलसीदास जी अपनी वाणी में लिखते हैं−

जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।

सब के ममता त्याग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।

और हे हनुमंत लाल! निःसंदेह लक्ष्मण जी की प्रीति का पार नहीं पाया जा सकता। लेकिन तब भी तुम्हें मैं लक्ष्मण से दोगुना प्रिय ही कहूँगा। क्योंकि प्रेम व्यवहार तो चाहता ही यह है कि प्रीतम मेरी नज़रों के समक्ष ही रहे। तभी तो प्रेम का यह पौधा फलता−फूलता रहता है। नित नई ऊँचाइयों को छूता है। मेरा मानना है कि यह थोड़ा सुलभ हो। लेकिन प्रीतम के दर्शन अनंत काल से सूखे की मार झेल रहे हों। रोज उम्मीद की प्रत्येक सुबह थक हार कर निराशा की ढलती शाम बनती हो। दूर−दूर तक कहीं आने की कोई पदचाप सुनाई न देती हो। सन्नाटा भी हमारे हृदय आँगन के कहने से सन्नाटे से सहमता हो। ऐसे में भी अगर कोई 'प्रीति की रीति' को यौवन की चाशनी में डुबो कर रखे तो फिर लीक से हट कर ही हुआ न। और तुम इसी श्रेणी में आते हो। हे हनुमंत लाल! इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम मुझे लक्ष्मण से भी दोगुने प्रिय हो। 

आगे की वार्ता किस ओर करवट लेती है? हम विस्तार सहित अगले अंक में जानेंगे।...क्रमशः...

-सुखी भारती