Gyan Ganga: प्रभु से शक्ति पाकर सुग्रीव ने जब बालि पर प्रहार किये तो उसके होश उड़ गये थे

Gyan Ganga: प्रभु से शक्ति पाकर सुग्रीव ने जब बालि पर प्रहार किये तो उसके होश उड़ गये थे

प्रभु से शक्ति पाकर सुग्रीव का आत्म विश्वास देखते ही बनता था। मानो कदम तो उसके जमीं पर थे। लेकिन शीश सीधा आसमान को छू रहा था। बालि भी सुग्रीव को देख अचंभित हुए जा रहा था कि अचानक सुग्रीव यूं ऐसा फुर्तीला व बलशाली कैसे हो गया।

जब प्रभु का बल प्राप्त हो जाए तो एक जुगनूं भी समस्त ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। प्रभु का हाथ है ही ऐसा कि जिसके भी सिर पर टिक गया, तो भले ही वह क्षुद्र-सा कोई कीट ही क्यों न हो तो भी वह गरुड़ की गति को मात दे सकता है। सुग्रीव भी कुछ, कुछ ऐसे ही भावों को जी रहा था। तभी तो उसकी गर्जना से हाथियों के झुण्ड भी दहल रहे थे। सुग्रीव के बल की मानो कोई सीमा ही न रही। वह जोर−जोर से धरती पर अपने पैर पटक रहा था। अपने दाँतों को किटकिटाते हुए भयंकर गर्जना कर रहा था। जिससे कि किष्किंधा नगरी के बड़े−बड़े गुंबद भी कंपायमान हो रहे थे। धरती सहम कर मानो अपने स्थान पर फटे जा रही थी। जिसे देख द्वारपाल अपना स्थान छोड़ भागने लगे। सुग्रीव मानो काल नहीं, विकराल महाकाल का रूप धारण कर चुका था। दूसरी तरफ बालि भी कौन-सा कम खूंखार अवस्था में था। वह भी क्रोध की महाअग्नि में झुलसा हुआ, महा गर्जना करते हुए सुग्रीव के समक्ष आ खड़ा हुआ। उसका मुख क्रोध से यूं लाल था मानो कोयले के पर्वत को अग्नि ताप से ढँक दिया हो। होता भी कैसे न? क्योंकि सुग्रीव का यह दुस्साहस उसके लिए कोई छोटा−मोटा फुंसी फोड़ा फूटने जैसा नहीं था अपितु भयंकर ज्वालामुखी फटा था। अब इतना सब्र किसमें था कि दोनों के मध्य कोई वार्ता भी होती। दोनों गरजते हुए काले घने बादलों की तरह आपस में भिड़ गए। और देखते ही देखते चारों ओर घमासान मच गया। दोनों के कदम धरती को रगड़−रगड़ कर मसले जा रहे हैं जिससे माटी उड़कर आसमान को भी ढँके जा रही थी। समस्त पशु पक्षी डर कर या तो अपने−अपने घोंसले अथवा कंदराओं में दुबक गए या फिर किसी वृक्ष अथवा सिला की ओट में इस घमासान को निहारने लगे।

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सुग्रीव का आत्म विश्वास देखते ही बनता था। मानो कदम तो उसके जमीं पर थे। लेकिन शीश सीधा आसमान को छू रहा था। बालि भी सुग्रीव को देख अचंभित हुए जा रहा था कि अचानक सुग्रीव यूं ऐसा फुर्तीला व बलशाली कैसे हो गया। बालि सुग्रीव द्वारा ऐसे−ऐसे दाँव पेंच का सामना कर रहा था जो उसने अपने संपूर्ण जीवन में न ही तो देखे और न ही कभी सुने। सुग्रीव भी बालि से लड़ नहीं अपितु खेल-सा रहा था।  उसको स्वतः ही बालि के प्रत्येक दाँव पेंच की काट समझ आ रही थी। कारण स्पष्ट था कि सुग्रीव में प्रभु का बल प्रत्यक्ष कार्य कर रहा था। जिसका प्रभाव यह हुआ कि समस्त समीकरण बदलते प्रतीत हो रहे थे। क्योंकि सुग्रीव अब बालि के लिए किसी तृण के समान हल्का नहीं था, कि जिसे यूं उठाया और यूं फेंक दिया। अपितु सुग्रीव किसी विशाल एवं घने बरगद के पेड़ की तरह अडिग व अचल था। सुग्रीव ने भी देखा कि बालि उससे अतिअंत अचंभित व हतप्रभ है। उसे मेरे इस असीम बल का कारण ही समझ नहीं आ रहा। कोई बात नहीं अब मैं भी बालि से गिन−गिन कर अपने बदले लूंगा। हर एक घूंसे का सूद सहित हिसाब करुँगा। प्रभु ने माला तो मुझे ही पहनाई है। तो मेरा विजयी होना भी निश्चित है तो क्यों न बालि को बल के साथ−साथ कुछ छल का भी स्वाद चखाया जाए। कारण कि बालि ने स्वयं छल से ही मेरी पत्नी पर अधिकार जमाया था। इसे भी तो पता चले कि छल किसी को कैसे छलनी करता है। किसी ने बहुत खूब कहा है−

दगा किसी का सगा नहीं, न मानो तो कर देखो।

जिसने किसी से दगा किया, जाकर उसका घर देखो।।

बालि तो सोच रहा था कि उसकी क्रिया की कभी प्रतिक्रिया होगी ही नहीं। लेकिन उत्तर का प्रतिउत्तर न हो ऐसा कैसे हो सकता है। अभी तक तो उसने मुझे छल और बल दिखाया लेकिन अब मेरी बारी है। 

तत्पश्चात सुग्रीव भांति−भांति के छल दिखाने लगा। और सज्जनों यही वह क्षण था जब सुग्रीव गलती कर बैठा। वह प्रभु के बल के साथ अपने छल का मिश्रण कर तो बैठा लेकिन यह मिश्रण कुछ यूं था मानो कामधेनु के दूध में खटाई मिला देना। जिससे खटाई का तो कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन संपूर्ण दूध व्यर्थ हो जाता है। बस ऐसा ही कुछ सुग्रीव के साथ घटित हुआ। जब तक वह प्रभु के बल पर आश्रित था। तब तक बालि की पकड़ से यूं बाहर था जैसे किसी बच्चे के हाथ से उड़ती हुई तितली। लेकिन जैसे ही सुग्रीव ने प्रभु के बल के साथ अपने छल की खटाई मिश्रित की तो प्रभु का बल जाता रहा। सुग्रीव प्रभु के बल के दम पर बालि को बड़ी सहजता से पछाड़ रहा था। लेकिन छल का सहारा क्या लिया, सुग्रीव केवल बल में ही नहीं अपितु छल में भी पिछड़ने लगा। क्योंकि छल के संदर्भ में भी सुग्रीव बालि से भला आगे थोड़ी था। सुग्रीव को दूर−दूर तक यह भान नहीं था कि प्रभु का बल तभी मेरा साथ देगा जब तक मैं छल कपट से हीन रहूँगा। कारण कि प्रभु को संसार में कुछ भी मोहित कर जाता है। जैसे केवट का नाव नहीं देने का अड़ियलपन क्षमा योग्य नहीं था लेकिन प्रभु को वह भी अच्छा लगा। शबरी के जूठे बेर खिलाना अमर्यादित होते हुए भी उसके निष्छल मन के कारण स्वीकार करते हैं। लेकिन अगर कभी कुछ स्वीकार नहीं किया तो वह है छल−कपट से परिपूर्ण विषाक्त हृदय।

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प्रभु का बालि के पक्ष में नहीं खड़े होने के पीछे प्रथम कारण यही था कि बालि ने श्रीराम जी से भी छल ही किया था। छल यह कि जब सभी वानरों के अवतरित होने का लक्ष्य पूर्व निर्धारित था कि उन्होंने पृथ्वी से रावण सहित समस्त राक्षसों के संहार में श्रीराम जी का अनुसरण करना है। तो बालि रावण से ही मित्रता क्यों किए बैठा है। यह प्रभु के साथ छल नहीं तो और क्या है? इसलिए गोस्वामी जी स्पष्ट कहते हैं−

निर्मल म नजन सो मोहि पावा।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

सुग्रीव का मन जब तक निर्मल था तो प्रभु सुग्रीव को अपना बल देकर विजित कर रहे थे। उसकी पीठ नीचे नहीं लगने दे रहे थे। लेकिन जैसे ही सुग्रीव ने छल की ओट ली तो पूरा पासा ही पलट गया। सुग्रीव के फड़फड़ाते डोलों का भारी भरकम बल अचानक रुई जैसा हल्का व थोथा हो गया। बालि के मुक्कों का प्रहार अभी तक तो पीड़ादायक नहीं था लेकिन अचानक उसके वारों से सुग्रीव के शरीर में बिजलियां कौंदने लगी, उसके पैर उखड़ने लगे, मुँह से रक्त की धारा बहने लगी। उसे एक नहीं अपितु चार−चार बालि दिखाई देने लगे। अकस्मात घटे इस घटनाक्रम से सुग्रीव भौंचक्का रह गया। और बालि अपने लात मुक्कों की बरसात से उसे निरंतर फोड़े जा रहा है।

इस महायुद्ध में कौन विजयी होता है और कौन पराजित जानने के लिए अगला अंक अवश्य पढ़िएगा...क्रमशः...जय श्री राम

-सुखी भारती