Gyan Ganga: भगवान श्रीराम से अपनी प्रशंसा सुनकर क्यों परेशान हो रहे थे हनुमानजी?

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सुखी भारती । Jul 12, 2022 12:34PM
श्रीहनुमान जी ने जैसे ही यह सुना, कि प्रभु उन्हें पुत्र कह कर संबोधन कर रहे हैं, तो वे अतिअंत प्रसन्न हो उठे। निश्चित ही ऐसा होना स्वाभाविक भी था। कारण कि प्रभु उन्हें पुत्र रूप में स्वीकार कर रहे थे। यहाँ पर श्रीहनुमान जी के स्थान पर, हम होते, तो क्या हमें भी प्रसन्नता न होती?

वाह! प्रभु का कितना सुंदर रंगमंच सजा हुआ है। वे प्रभु, जोकि एकमात्र प्रशंसा के पात्र हैं। वे स्वयं प्रशंसा न पाकर, अपने भक्तों को सम्मान की पुष्पों से लाद रहे हैं। प्रभु के यह वचन, कि हे हनुमान पुत्र! मैंने मन में खूब विचार कर के देख लिया है, कि मैं तुम्हारा ऋण कभी नहीं उतार सकता, निश्चित ही आत्मा को परम सुख देने वाले हैं। पूरी सृष्टि का स्वामी एक वानर को संबोधित करते हुए कह रहे हैं, कि मैं आपका ऋणी हूँ। संसार की ऐसी कौन-सी सभ्यता अथवा संस्कृति है, जो ऐसे उदाहरणों से परिपूर्ण हो? केवल भारतीय वैदिक संस्कृति ही ऐसे उच्च संस्कारों की खान से भरी हुई है। जिसमें एक सूर्य नन्हें से जुगनूं से कहता है, कि मैं तेरे प्रकाश से अतिअंत प्रभावित हूँ। या फिर यह गंगा जी किसी को यह कहे, कि हे मलिन नाले, मैं तेरी गहराई व पावनता के समक्ष कुछ भी नहीं। ऐसा संसार में कहीं भी नहीं होता। लेकिन श्रीराम जी को देखिए। वे श्रीहनुमान जी को प्रेम की चाश्नी से ओत-प्रोते, मीठे-मीठे प्याले पिला रहे हैं। प्रभु से इतना सम्मान, इतनी प्रशंसा व इतने प्रेम की तो, श्रीहनुमान जी ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। किसी शायर ने क्या खूब लिखा है-

‘इतना दिया भगवान ने मुझको,

जितनी मेरी औकात नहीं,

यह तो कृपा है मोरे रघुवर की,

वरना मुझमें तो ऐसी कोई बात नहीं।।’

निश्चित ही यह तो प्रभु की ही कृपा का परिणाम है, कि नाली की ईंट को भी मंदिर के शिखर पर लगाया जाता है। हम सोच रहे होंगे, कि श्रीहनुमान जी कितने सौभग्यशाली हैं, कि वे प्रभु के श्रीमुख से, अपने निमित ऐसे सुंदर वाक्यों को श्रवण कर पा रहे हैं। लेकिन श्रीरामचरित मानस के इस सुंदर प्रसंग में आप अगली पंक्ति पड़ कर देखेंगे, तो पायेंगे कि श्रीहनुमान जी प्रसन्न न होकर, ऐसा व्यवहार करते हैं, कि इसकी तो हमने कल्पना भी नहीं की होगी। जी हाँ! श्रीहनुमान जी अपने मुख से कोई ‘धन्यवाद’ इत्यादि शब्द न बोलकर कुछ अलग ही राग अलापने लगते हैं। क्या कहते हैं श्रीहनुमान जी-

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‘सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।

चरन परेउ प्रेमाकुल त्रहि त्रहि भगवंत।।’

श्रीहनुमान जी कहने लगे, कि हे प्रभु रक्षा करो! कक्षा करो! मैं अब निश्चित ही असुरक्षित हूँ। मुझे लगता है, कि मेरा पतन शीघ्र ही संभव है। आप के अलावा कोई नहीं है, जो मेरी रक्षा कर सके। क्यों है न आश्चर्य! जिन श्रीहनुमान जी को हमने देखा, कि वे लंका यात्रा के दौरान, बड़े-बड़े राक्षसों से यूँ ही सहजता से भिड़ गए। कहीं कोई बाधा अथवा कष्ट महसूस नहीं किया। वही श्रीहनुमान जी, श्रीराम जी के पावन श्रीचरणों में उपस्थित हैं, और यही भी निश्चित है, कि वे तीनों तापों से कोसों दूर हैं। क्या ऐसे सुंदर वातावरण में, श्रीहनुमान जी को यह वाक्य बोलने चाहिए, कि हे प्रभु मेरी रक्षा करो। अन्यथा मेरा पतन हो जायेगा। निश्चित ही यह असहज-सा प्रतीत होता है। लेकिन यह भी सत्य है, कि श्रीहनुमान जी ऐसे ही वाक्य बोलते हैं। तो विचार करने योग्य बात है, कि श्रीहनुमान जी को, प्रभु श्रीराम जी के पावन युगल चरणों में बैठ कर भी, ऐसा कौन-सा भय सता रहा था, वे त्रहिमाम्-त्रहिमाम् करने लगे। सज्जनों! वास्तव में श्रीहनुमान जी के त्रहिमाम् करने का अर्थ कोई संसारिक व भौतिक नहीं था। कारण कि संसार में शारीरिक स्तर पर तो कोई भी उन्हें हानि पहुँचाने वाला नहीं था। क्योंकि श्रीहनुमान जी तो ठहरे उच्च कोटि के साधक। तो निश्चित ही अपने वाक्यों से वे कुछ ऐसा आदर्श प्रस्तुत करना चाह रहे थे, जिसके माध्यम से वे भक्ति के महान सूत्र प्रस्तुत कर सकें।

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श्रीहनुमान जी ने जैसे ही यह सुना, कि प्रभु उन्हें पुत्र कह कर संबोधन कर रहे हैं, तो वे अतिअंत प्रसन्न हो उठे। निश्चित ही ऐसा होना स्वाभाविक भी था। कारण कि प्रभु उन्हें पुत्र रूप में स्वीकार कर रहे थे। यहाँ पर श्रीहनुमान जी के स्थान पर, हम होते, तो क्या हमें भी प्रसन्नता न होती? बिल्कुल होती। लिहाजा श्रीहनुमान जी को भी हुई। लेकिन श्रीराम जी के श्रीचरणों में यह कहते हुए गिर जाना, कि हे प्रभु रक्षा करो! मेरी रक्षा करो। तो वे यही भाव कहना चाह रहे हैं, कि हे प्रभु जो शब्द आपने यह कहे, कि आप मेरे ऋणी हैं। तो यह प्रशंसा को मैं नहीं पचा पाऊँगा। मैं बड़े से बड़े शत्रु को परास्त कर सकता हूँ। किंतु अगर आप कहें, कि मैं प्रशंसा के प्रभाव से उत्पन्न, अहंकार रूपी शत्रु को परास्त कर पाऊँगा, तो यह मेरे बस में नहीं है। प्रभु आप तो यह भलीभाँति जानते हैं, कि यह प्रशंसा तो बड़े-बड़े ऋर्षि-मुनियों के त्याग व तपस्या को खा गई। फिर हम तो ठहरे चंचल वानर। हम तो स्वभाव से ही लोभी व प्रशंसा के भूखे होते हैं। ऐसे में हमारा कल्याण कैसे संभव हो सकता है। यह श्रवण कर प्रभु श्रीराम जी ने कहा, कि हे पुत्र! तुम्हें कैसे पता कि प्रशंसा से साधक्ता का नाश होता है। तो श्रीहनुमान जी को नारद मुनि जी की कथा स्मरण हो आई। जिसमें श्रीनारद जी जैसे वरिष्ठ व महान तपस्वी साधक को भी कष्ट का सामना करना पड़ा।

क्या थी श्रीनारद जी की वही कथा, जिसे स्मरण कर, श्रीहनुमान जी त्रहिमाम्-त्रहिमाम् करने लगे थे। जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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