Oil and Gas क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा भारत, Samudra Manthan योजना से घटेगी Import Dependence

केंद्र सरकार ने 84,084 करोड़ रुपये की समुद्र मंथन योजना के माध्यम से घरेलू तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन बढ़ाकर आयात निर्भरता कम करने और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने का रणनीतिक निर्णय लिया है। यह पहल न केवल विदेशी मुद्रा की बचत करेगी बल्कि गहरे समुद्री क्षेत्रों में आधुनिक अन्वेषण और साझा बुनियादी ढांचे के विकास से आत्मनिर्भर भारत अभियान को नई गति प्रदान करेगी। कीवर्ड: समुद्र मंथन योजना, ऊर्जा सुरक्षा, तेल और गैस उत्पादन, आत्मनिर्भर भारत, भारतीय अर्थव्यवस्था।
देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की आपूर्ति से जुड़े जोखिमों के बीच सरकार ने समुद्र में छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार की खोज को तेज करने के लिए एक नई राष्ट्रीय योजना को मंजूरी दी है। सरकार का मानना है कि इससे आने वाले वर्षों में आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी।
मौजूद जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की 'समुद्र मंथन' राष्ट्रीय ऑफशोर अन्वेषण योजना को मंजूरी दे दी है। इस योजना पर कुल 84 हजार 84 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इसका क्रियान्वयन वित्त वर्ष 2030-31 तक किया जाएगा। सरकार ने इसे आधुनिक दौर का 'समुद्र मंथन' बताते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य समुद्र के भीतर मौजूद ऊर्जा संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है।
बता दें कि भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बना हुआ है और होरमुज स्ट्रेट, लाल सागर तथा काला सागर जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों पर आपूर्ति बाधित होने की आशंका बनी रहती है, तब घरेलू स्तर पर तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन बढ़ाना देश की प्राथमिकता बन गया है।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश में तेल और प्राकृतिक गैस के नए भंडार खोजने के साथ-साथ घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करना है। सरकार का अनुमान है कि इस योजना के माध्यम से 60 करोड़ टन से अधिक तेल समतुल्य हाइड्रोकार्बन भंडार जोड़े जा सकेंगे। साथ ही हर वर्ष 10 से 15 मिलियन टन तेल समतुल्य अतिरिक्त उत्पादन होने की संभावना है। भविष्य में इसकी अधिकतम क्षमता 20 मिलियन टन तेल समतुल्य वार्षिक उत्पादन तक पहुंच सकती है।
गौरतलब है कि योजना को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग के तहत समुद्र के भीतर उच्च गुणवत्ता वाले भूकंपीय आंकड़ों का संग्रह, उनका विश्लेषण और वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। दूसरे भाग में गहरे और अत्यंत गहरे समुद्री क्षेत्रों में खोज कार्य को गति देने, साझा समुद्री उत्पादन सुविधाओं का विकास करने, निकासी अवसंरचना तैयार करने और तेल एवं प्राकृतिक गैस निर्माण तथा सेवाओं के लिए एकीकृत औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने पर ध्यान दिया जाएगा।
योजना के अंतर्गत नए संभावित समुद्री क्षेत्रों में वैज्ञानिक ड्रिलिंग भी की जाएगी ताकि भविष्य के ऊर्जा भंडारों का सटीक आकलन किया जा सके। इसके अलावा डिजिटल प्रबंधन प्रणाली, आधुनिक तकनीकों का उपयोग, विशेषज्ञों का प्रशिक्षण, विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।
सरकार का कहना है कि इस योजना से केवल ऊर्जा क्षेत्र ही नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी व्यापक लाभ मिलेगा। घरेलू उत्पादन बढ़ने से कच्चे तेल के आयात पर होने वाला विदेशी मुद्रा खर्च कम होगा। इसके साथ ही 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को भी मजबूती मिलेगी क्योंकि अपतटीय उपकरणों और सेवाओं के निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।
मौजूद जानकारी के अनुसार, योजना से तेल एवं प्राकृतिक गैस खोज, उत्पादन, निर्माण, परिवहन और अन्य सहयोगी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि इससे निजी निवेश आकर्षित होगा, नई तकनीकों का विकास होगा और देश में ऑफशोर ऊर्जा क्षेत्र का एक प्रतिस्पर्धी इकोसिस्टम तैयार होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजना तय समय पर प्रभावी ढंग से लागू होती है तो भारत आने वाले वर्षों में ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हासिल कर सकता है।
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