UNSC में India की स्थायी सदस्यता का रास्ता साफ ! US, UK, France, Russia के बाद China भी आ गया साथ

हम आपको यह भी बता दें कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा में चीन और रूस ने स्पष्ट रूप से भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। चीन का यह रुख खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को अब वह बड़ा रणनीतिक समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है, जिस पर लंबे समय से पूरी दुनिया की नजर थी। नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान, संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतारेस की मौजूदगी में चीन और रूस ने भारत को संयुक्त राष्ट्र, विशेषकर सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराकर भारत के दावे को नई ताकत दे दी है। इससे पहले ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका भी सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं, लेकिन हर बार यह मामला चीन की असहमति पर आकर अटक जाता था। अब पहली बार ऐसा संकेत मिल रहा है कि चीन का रुख भी बदल रहा है। रूस के साथ चीन का समर्थन मिलना केवल भारत की कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि सुरक्षा परिषद की दशकों पुरानी शक्ति-संरचना के सामने एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक संदेश भी है।
इस घटनाक्रम को तमाम अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भारत के लिए बड़ी जीत बता रहे हैं। अमेरिकी अर्थशास्त्री और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेफ्री सैक्स ने तो यहां तक कहा है कि भारत के अलावा कोई दूसरा देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के छठे स्थायी सदस्य बनने का इतना मजबूत दावा नहीं रखता। सैक्स ने भारत की करीब डेढ़ अरब की आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रभाव और कूटनीतिक क्षमता को इसकी सबसे बड़ी ताकत बताया। उनका कहना है कि भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, क्रय शक्ति के आधार पर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में लगातार अपनी प्रभावशाली भूमिका साबित कर रहा है।
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हम आपको यह भी बता दें कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा में चीन और रूस ने स्पष्ट रूप से भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। चीन का यह रुख खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह लंबे समय से भारत की स्थायी सदस्यता की मांग का खुलकर समर्थन करने से बचता रहा है। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता रखने वाला चीन यदि भारत के दावे के समर्थन में खड़ा होता है, तो यह भारत के लिए बड़ी राहत की बात है।
उल्लेखनीय है कि सुरक्षा परिषद में फिलहाल पांच स्थायी सदस्य हैं। चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका। इनके पास वीटो पावर है, जिसके जरिये इनमें से कोई भी देश किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोक सकता है। इसके अलावा दस अस्थायी सदस्य होते हैं, जिनका कार्यकाल दो वर्ष का होता है। इसके अलावा, विडंबना देखिए कि 1945 में जिस वैश्विक शक्ति-संतुलन को ध्यान में रखकर यह व्यवस्था बनाई गई थी, वही ढांचा आज भी लगभग उसी रूप में कायम है। जबकि दुनिया की आबादी, अर्थव्यवस्था, शक्ति-संतुलन और राजनीतिक वास्तविकताएं बदल गईं, लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा नहीं बदला।
यही वह बिंदु है जहां संयुक्त राष्ट्र सुधार की जरूरत सबसे ज्यादा दिखाई देती है। जिस संस्था का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम करना है, वही संस्था जब दुनिया के बड़े हिस्से को निर्णय प्रक्रिया से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दे पाती, तो उसकी वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की विशाल आबादी और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा बेहद असंतुलित है। देखा जाये तो दुनिया के संकटों का असर जिन देशों और समाजों पर सबसे ज्यादा पड़ता है, निर्णय लेने की मेज पर उनकी आवाज उतनी ही कमजोर है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी असमानता को रेखांकित करते हुए वैश्विक निर्णय व्यवस्था को विशेषाधिकारों की पिरामिड जैसी संरचना बताया है। उन्होंने कहा कि ऊपर बैठे शक्तिशाली देश निर्णय लेते हैं और नीचे मौजूद देशों को उन निर्णयों के परिणाम भुगतने पड़ते हैं। उन्होंने इस विशेषाधिकार की पिरामिड को साझेदारी के मंच में बदलने का आह्वान किया है। उनका यह संदेश केवल ब्रिक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के सामने एक सीधी चुनौती है।
प्रधानमंत्री मोदी और संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतारेस की मुलाकात में भी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और बहुपक्षीय संस्थाओं, विशेषकर सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया। दोनों नेताओं ने संघर्षों, समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, सतत विकास, मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवीकरणीय ऊर्जा और वैश्विक खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की। यह अपने आप में संकेत है कि आज की वैश्विक समस्याएं इतनी व्यापक हो चुकी हैं कि उन्हें पुराने शक्ति-संतुलन और सीमित प्रतिनिधित्व वाली संस्थाओं के सहारे नहीं संभाला जा सकता।
देखा जाये तो भारत की स्थायी सदस्यता का सामरिक महत्व यहीं से सामने आता है। भारत केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश नहीं है; वह एशिया की एक निर्णायक शक्ति, परमाणु शक्ति, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और ग्लोबल साउथ की प्रमुख आवाज है। भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी स्थान मिलने का अर्थ होगा एशिया और विकासशील दुनिया की निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक हिस्सेदारी बढ़ना।
रणनीतिक स्तर पर चीन और रूस का समर्थन भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक पूंजी है। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि भारत की स्थायी सदस्यता केवल पश्चिमी देशों की इच्छा पर निर्भर है। अब रूस और चीन जैसे स्थायी सदस्य भी इसके समर्थन में खुलकर खड़े दिखाई दे रहे हैं। यह भारत की उस कूटनीति की सफलता है जो एक साथ पश्चिम, रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ा रही है।
बहरहाल, मुद्दा सिर्फ भारत को स्थायी सदस्य बनाने का नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने का है। अगर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और प्रमुख उभरती शक्तियों को निर्णय की मेज पर पर्याप्त जगह नहीं मिलती, तो संयुक्त राष्ट्र वैश्विक समस्याओं का समाधान करने वाली संस्था कम और पुराने शक्ति-संतुलन की संरचना ज्यादा दिखाई देगा। दुनिया बदल चुकी है; अब संयुक्त राष्ट्र को भी बदलना ही होगा। और इस बदलाव की सबसे मजबूत दावेदारी आज भारत के पास है।
-नीरज कुमार दुबे
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