India-UK Offshore Wind | हरित ऊर्जा की ओर भारत के बढ़ते कदम! 272 GW की ऐतिहासिक उपलब्धि और 'भारत-ब्रिटेन' रणनीतिक साझेदारी

मंत्री ने भारत-ब्रिटेन अपतटीय पवन ऊर्जा कार्यबल की शुरुआत के मौके पर यह जानकारी दी। यह उपलब्धि वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा तथा 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के भारत के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारत ने ऊर्जा स्वतंत्रता और स्वच्छ भविष्य की दिशा में एक और बड़ा मील का पत्थर पार कर लिया है। केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने हाल ही में घोषणा की है कि भारत की गैर-जीवाश्म आधारित विद्युत उत्पादन क्षमता अब 272 गीगावाट (GW) से अधिक हो गई है। यह घोषणा 'भारत-ब्रिटेन अपतटीय पवन ऊर्जा कार्यबल' (India-UK Offshore Wind Working Group) की शुरुआत के दौरान की गई, जिसमें ब्रिटेन के उप प्रधानमंत्री डेविड लैमी और ब्रिटिश उच्चायुक्त लिंडी कैमरून भी उपस्थित थे।
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इस अवसर पर ब्रिटेन के उप प्रधानमंत्री डेविड लैमी और भारत में ब्रिटिश उच्चायुक्त लिंडी कैमरून भी मौजूद थीं। कार्यबल की औपचारिक शुरुआत के मौके पर जोशी ने कहा कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 35 गीगावाट से अधिक सौर तथा 4.61 गीगावाट पवन क्षमता जोड़ी है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष भारत ने अपनी कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल किया।
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यह उपलब्धिक निर्धारित लक्ष्य से पांच वर्ष पहले हासिल की गई। मंत्री ने कहा, ‘‘ आज भारत की स्थापित गैर-जीवाश्म क्षमता 272 गीगावाट से अधिक है जिसमें सौर से 141 गीगावाट और पवन से 55 गीगावाट है…। हमारी व्यापकता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत दो साल से कम समय में करीब 30 लाख परिवारों को ‘रूफटॉप सोलर’ की सुविधा मिली।
इसके अलावा प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान योजना के तहत 21 लाख पंपों का सौरकरण किया गया है।’’ उन्होंने कहा कि ये आंकड़े स्पष्ट नीति, संस्थागत समन्वय तथा निवेशकों और उद्योग के भरोसे को दर्शाते हैं। मंत्री ने कहा कि हालांकि अगले चरण में विश्वसनीयता, ग्रिड स्थिरता, औद्योगिक गहराई तथा ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करना होगा। जोशी ने कहा कि अपतटीय पवन ऊर्जा की, अगली अवस्था में रणनीतिक भूमिका होगी और इसके लिए गुजरात तथा तमिलनाडु के तटों के पास कुछ क्षेत्रों की पहचान की गई है।
उन्होंने बताया कि शुरुआती 10 गीगावाट अपतटीय निकासी क्षमता (गुजरात और तमिलनाडु में पांच-पांच गीगावाट) के लिए पारेषण योजना पूरी कर ली गई है। प्रारंभिक परियोजनाओं को सहयोग देने के लिए 7,453 करोड़ रुपये की व्यवहार्यता अंतर निधि योजना भी शुरू की गई है जो लगभग 71 करोड़ पाउंड के बराबर है। मंत्री ने कहा, ‘‘ जैसा कि हम सभी जानते हैं, अपतटीय पवन वैश्विक ऊर्जा बदलाव के सबसे जटिल क्षेत्रों में से एक है। इसके लिए विशेष बंदरगाह ढांचा, समुद्री लॉजिस्टिक, समुद्र तल पट्टे की मजबूत व्यवस्था, व्यवहार्य व्यावसायिक ढांचे आदि की जरूरत होती है।’’
उन्होंने कहा कि इसी वजह से यह कार्यबल महत्वपूर्ण है। भारत-ब्रिटेन दृष्टिपत्र 2035 और चौथे ऊर्जा संवाद के तहत इस कार्यबल का गठन भारत के अपतटीय पवन ऊर्जा परिवेश को रणनीतिक दिशा एवं समन्वय देने के लिए किया गया है। जोशी ने कहा कि ब्रिटेन ने शुरुआती तैनाती से लेकर परिपक्व आपूर्ति श्रृंखलाओं वाले बड़े व्यावसायिक बाजारों तक अपतटीय पवन के विस्तार में वैश्विक नेतृत्व दिखाया है। उन्होंने कहा, ‘‘ भारत व्यापकता, दीर्घकालिक मांग और तेजी से बढ़ता स्वच्छ ऊर्जा तंत्र लेकर आता है।
हम मिलकर तीन व्यावहारिक स्तंभों पर काम कर सकते हैं। पहला स्तंभ पारिस्थितिकी योजना एवं बाजार संरचना है जिसमें समुद्र तल ढांचे को बेहतर बनाना, ग्रिड तैयारी के अनुरूप निविदा समयरेखा तय करना और पारदर्शी राजस्व सुनिश्चितता तंत्र बनाना शामिल है।’’ मंत्री ने कहा कि दूसरा स्तंभ ढांचा और आपूर्ति श्रृंखला है। इसमें बंदरगाह आधुनिकीकरण, आधार संरचनाओं, टावरों, पंखों और केबलों का स्थानीय निर्माण, विशेष पोत तथा समुद्री परिचालन के लिए कौशल विकास शामिल है।
वहीं तीसरा स्तंभ वित्तपोषण एवं जोखिम न्यूनीकरण है जिसमें मिश्रित वित्त ढांचे, शुरुआती जोखिम घटाने वाले उपकरण तथा दीर्घकालिक संस्थागत पूंजी का उपयोग करना शामिल है। उन्होंने कहा कि अपतटीय पवन की पारेषण योजना, भंडारण समाधान और उभरते तटीय हरित हाइड्रोजन समूहों से भी जोड़ना होगा। जोशी ने कहा, ‘‘ राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत हरित हाइड्रोजन की कीमत घटकर सबसे कम 279 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई है।’’ उन्होंने कहा कि यह कार्यबल वास्तव में ‘‘विश्वास बल’’ है जो दर्शाता है कि भारत और ब्रिटेन मिलकर जमीनी स्तर पर पेश होने वाली वास्तविक चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं।
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