Partition Horrors Remembrance Day I विभाजन विभीषिका: हिन्दू नरसंहार की मर्मांतक दास्तां

हमें ये जानना ज़रूरी है कि उस समय भारत विभाजन के लिए किस प्रकार से अंग्रेज अपनी चाल चल रहे थे? मुस्लिम लीग किस प्रकार से दंगों के आतंकी क्रूर चेहरे के रूप में उभर रही थी? कैसे पंडित नेहरू मुस्लिम लीग की ज़िद के आगे घुटने टेक रहे थे? दरअसल, भारत विभाजन को लेकर जब अंग्रेजों ने पटकथा रची तो वो हर वो दांव-पेंच आजमा रहे थे।
भारत 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन हुआ लेकिन स्वाधीनता के साथ विभाजन की वीभत्स त्रासदी ने राष्ट्र को कभी न भर पाने वाले असह्य घाव दिए। उस समय हुए हिन्दुओं के नरसं'हार और उसकी पीड़ा से पूरा देश कांप गया। जिसकी मर्मांतक चीखें अब भी सुनाई देती हैं।अतीत को जानना आवश्यक हो जाता है।आइए इतिहास के पन्ने पलटते हैं।
हमें ये जानना ज़रूरी है कि उस समय भारत विभाजन के लिए किस प्रकार से अंग्रेज अपनी चाल चल रहे थे? मुस्लिम लीग किस प्रकार से दंगों के आतंकी क्रूर चेहरे के रूप में उभर रही थी? कैसे पंडित नेहरू मुस्लिम लीग की ज़िद के आगे घुटने टेक रहे थे? दरअसल, भारत विभाजन को लेकर जब अंग्रेजों ने पटकथा रची तो वो हर वो दांव-पेंच आजमा रहे थे। जो कि उनके मंसूबों को पूरा कर सके। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू, भारत विभाजन के लिए आए माउंटबेटन और उसकी पत्नी एडविना के साथ 10 मई 1947 से कई दिनों तक शिमला में पार्टियां कर रहे थे। इतना ही नहीं माउंटबेटन ने एलिजाबेथ द्वारा दी गई महंगी कार 'रोल्स रॉयल्स ' पंडित नेहरू को दी थी। नेहरू इसी में यात्राएं करते थे। फिर शिमला में माउंटबेटन -नेहरू और एडविना की छुट्टियों के दौरान ही माउंटबेटन के भारत विभाजन संबधी मसौदे को पंडित नेहरू ने स्वीकार कर लिया था। इससे संबंधित घटनाक्रमों का सविस्तार वर्णन तत्कालीन ब्रिटिश पत्रकार और इतिहासकार लियोनार्ड मोसली ने अपनी पुस्तक ' द लास्ट डेज ऑफ द ब्रिटिश राज' में किया है। यानी भारत विभाजन के लिए मुस्लिम लीग और जिन्ना तो उतावले थे ही साथ ही पंडित नेहरू की भी भूमिका संदिग्ध और विभाजन के पक्ष में ही स्पष्ट प्रतीत होती है।
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उस समय कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा भारत विभाजन की माउंटबैटन योजना को स्वीकार करने की तैयारियों का महात्मा गांधी ने भी विरोध किया था। लेकिन उनकी आगे नहीं चली और 3 जून 1947 को पंडित नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस ने अंग्रेजों के विभाजन प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उन्होंने इस सन्दर्भ में मनु गांधी से 1 जून 1947 को चर्चा की थी। मनु को अपने दिल की बात कहते हुए महात्मा गांधी ने बताया— “आज मैं अपने को अकेला पाता हूँ। लोगों को लगता है कि मैं जो सोच रहा हूँ वह एक भूल है। भले ही मैं कांग्रेस का चवन्नी का सदस्य नहीं हूँ लेकिन वे सब लोग मुझे पूछते है, मेरी सलाह लेते है। आजादी के कदम उलटे पड़ रहे हैं, ऐसा मुझे लगता है। हो सकता है आज इसके परिणाम तत्काल दिखाई न दे, लेकिन हिन्दुस्तान का भविष्य मुझे अच्छा नहीं दिखाई देता। हिन्दुस्तान की भावी पीढ़ी की आह मुझे न लगे कि हिंदुस्तान के विभाजन में गांधी ने भी साथ दिया था।'' (गांधी सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 88, पृष्ठ 43-44)
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