आखिर भारत की एआई लोकतंत्रीकरण नीतियां अमेरिका-चीन की तुलना में ज्यादा समावेशी हैं?

भारत की एआई लोकतंत्रीकरण नीतियां अन्य देशों से मुख्य रूप से समावेशी, ओपन-सोर्स और ग्लोबल साउथ-केंद्रित दृष्टिकोण से भिन्न हैं। जहां अमेरिका और चीन AI को प्रमुख कंपनियों के एकाधिकार के माध्यम से आगे बढ़ाते हैं, वहीं भारत सार्वजनिक संसाधनों (जैसे ऐरावत पर LLaMA मॉडल्स) को API के जरिए सस्ता उपलब्ध कराता है।
भारत की एआई लोकतंत्रीकरण नीतियां दुनिया के अन्य देशों यानी अमेरिका-चीन-यूरोप की तुलना में ज्यादा समावेशी, ओपन-सोर्स और ग्लोबल साउथ-केंद्रित हैं।भारत का दृष्टिकोण सर्वथा भिन्न और लोककल्याणकारी है। जहां अमेरिका और चीन AI को प्रमुख कंपनियों के एकाधिकार के माध्यम से आगे बढ़ाते हैं, वहीं भारत सार्वजनिक संसाधनों (जैसे ऐरावत पर LLaMA मॉडल्स) को API के जरिए सस्ता उपलब्ध कराता है।
यही वजह है कि भारत बनाम अन्य देश की विशेषताओं के दृष्टिगत पारस्परिक होड़ जारी है, खासकर भारत, अमेरिका, चीन व यूरोप के बीच। क्योंकि भारत का फोकस किसान, छात्र, स्टार्टअप्स के लिए भाषिणी, किसान ई-मित्र जैसे क्षेत्रीय अनुप्रयोग हैं, जबकि अमेरिका, चीन व यूरोप में बड़े टेक दिग्गजों (Google, OpenAI) का वर्चस्व है जो सख्त जोखिम नियमन (EU AI Act) से परेशान दिखाई देते हैं।
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यही वजह है कि नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में प्रस्तावित एआई लोकतंत्रीकरण के लिए नीतिगत सिफारिशें मुख्य स्थान रखती हैं, क्योंकि ये सिफारिशें प्रमुख रूप से सार्वजनिक AI संसाधनों को किफायती और सुलभ बनाने पर केंद्रित होंगी। ऐसा इसलिए कि ये सिफारिशें ग्लोबल साउथ के देशों के लिए ओपन-सोर्स मॉडल्स, कम लागत वाली कंप्यूटिंग और कौशल विकास को बढ़ावा देंगी।
एआई लोकतंत्रीकरण के लिए नीतिगत प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित हैं-
पहला, एआई संसाधनों का लोकतंत्रीकरण: डेमोक्रेटाइजिंग AI रिसोर्सेज वर्किंग ग्रुप (भारत, मिस्र, केन्या सह-अध्यक्ष) द्वारा API-आधारित सस्ते AI मॉडल्स (जैसे LLaMA) को उपलब्ध कराना, ताकि स्टार्टअप्स, किसान और छात्र लाभान्वित हों।
दूसरा, जोखिम-आधारित शासन: इंडिया AI गवर्नेंस दिशानिर्देशों के अनुरूप उच्च-जोखिम AI के लिए सुरक्षा उपाय, मौजूदा कानूनों (IT अधिनियम, DPDP) पर आधारित बिना नए नियामक निकाय।
तीसरा, समावेशी इकोसिस्टम: भाषिणी जैसे प्लेटफॉर्म्स से क्षेत्रीय भाषाओं में AI कंटेंट, टियर-2/3 शहरों में नवाचार को प्रोत्साहन।
जहां तक इनके अपेक्षित प्रभाव की बात है तो ये सिफारिशें AI एकाधिकार को तोड़कर भारत को ह्यूमन-सेंट्रिक AI मॉडल के रूप में स्थापित करते हुए रोजगार सृजन और सतत विकास सुनिश्चित करेंगी। समिट के चक्रों से निकलने वाली ये प्रतिबद्धताएं वैश्विक मानक बनेंगी।
# एआई लोकतंत्रीकरण नीतियां अन्य देशों से कैसे भिन्न हैं? समझिए
भारत की एआई लोकतंत्रीकरण नीतियां अन्य देशों से मुख्य रूप से समावेशी, ओपन-सोर्स और ग्लोबल साउथ-केंद्रित दृष्टिकोण से भिन्न हैं। जहां अमेरिका और चीन AI को प्रमुख कंपनियों के एकाधिकार के माध्यम से आगे बढ़ाते हैं, वहीं भारत सार्वजनिक संसाधनों (जैसे ऐरावत पर LLaMA मॉडल्स) को API के जरिए सस्ता उपलब्ध कराता है।
यही वजह है कि भारत बनाम अन्य देश की विशेषताओं के दृष्टिगत पारस्परिक होड़ जारी है, खासकर भारत, अमेरिका, चीन व यूरोप के बीच। क्योंकि भारत का फोकस किसान, छात्र, स्टार्टअप्स के लिए भाषिणी, किसान ई-मित्र जैसे क्षेत्रीय अनुप्रयोग हैं, जबकि अमेरिका, चीन व यूरोप में बड़े टेक दिग्गजों (Google, OpenAI) का वर्चस्व है जो सख्त जोखिम नियमन (EU AI Act) से परेशान दिखाई देते हैं।
वहीं शासन के अनुरूप भारत जोखिम-आधारित, मौजूदा कानूनों (IT Act, DPDP) पर निर्भर है, वो भी बिना नए नियामक के, अमेरिका, यूरोप, चीन में बाजार-प्रेरित, न्यूनतम हस्तक्षेप होते रहने से कठोर अनुपालन और स्वतंत्र ऑडिट की राह में मुश्किल आती हैं।
वहीं पहुंच के मद्देनजर भारत सरकारी क्लाउड (मेघराज), 10,000 करोड़ मिशन से किफायती कंप्यूटिंग लगेगी। जबकि अमेरिका, चीन, यूरोप में निजी क्लाउड, उच्च लागत होने से नियामक अनुपालन पर जोर दिया जाता है।
जहां तक प्रमुख भिन्नताएं की बात हैं तो भारत का मॉडल विविध भाषाओं (भाषिणी) और टियर-2/3 शहरों पर केंद्रित है, जो विकासशील देशों की जरूरतों को प्राथमिकता देता है, जबकि पश्चिमी नीतियां गोपनीयता और सुरक्षा पर अधिक सख्त हैं। यह दृष्टिकोण AI को 'सभी के लिए' बनाता है, न कि चुनिंदा elites के लिए।
# एआई लोकतंत्रीकरण नीतियों के कार्यान्वयन में कई महत्वपूर्ण चुनौतियां
हालांकि एआई लोकतंत्रीकरण नीतियों के कार्यान्वयन में कई महत्वपूर्ण चुनौतियां भी हैं, जो मुख्य रूप से बुनियादी ढांचे, नैतिकता और संसाधनों से जुड़ी हैं। ये चुनौतियां भारत जैसे विकासशील देशों में अधिक गंभीर हैं, जहां ग्रामीण-शहरी विभाजन और डिजिटल असमानता बाधक हैं। कतिपय प्रमुख चुनौतियां निम्नवत हैं:-
पहला, डेटा गोपनीयता और सुरक्षा: बड़े पैमाने पर AI तैनाती में नागरिक डेटा की रक्षा करना कठिन है, खासकर DPDP अधिनियम के बावजूद सख्त प्रवर्तन की कमी से।
दूसरा, पक्षपात और निष्पक्षता: AI मॉडल यदि विविध डेटा पर प्रशिक्षित न हों, तो सामाजिक पूर्वाग्रहों को बढ़ावा दे सकते हैं, जो समावेशिता के लक्ष्य को कमजोर करता है।
तीसरा, अवसंरचना अंतराल: उच्च गुणवत्ता वाले डेटासेट, GPU-आधारित कंप्यूटिंग और ग्रामीण क्षेत्रों में कुशल कार्यबल की कमी; मेघराज जैसे प्रयास पर्याप्त नहीं।
चतुर्थ, अन्य बाधाएं: वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उन्नत देशों (US/China) के मॉडलों से पिछड़ना, साथ ही नीतिगत समन्वय की कमी। पारदर्शिता का अभाव और जन जागरूकता की कमी कार्यान्वयन को धीमा करती है। कुल मिलाकर, ये चुनौतियां समावेशी AI को सीमित कर सकती हैं यदि बहुआयामी समाधान न अपनाए जाएं।
# कार्यान्वयन चुनौतियों को दूर करने के लिए भारत बहुआयामी रणनीतियां अपना रहा
एआई लोकतंत्रीकरण नीतियों के कार्यान्वयन चुनौतियों को दूर करने के लिए भारत बहुआयामी रणनीतियां अपना रहा है, जो बुनियादी ढांचे, कौशल विकास और नीतिगत समन्वय पर केंद्रित हैं।
पहला, एआई रणनीतियां: हमारी रणनीतियां इंडियाAI मिशन और समिट के चक्रों से प्रेरित हैं, जो समावेशी विकास सुनिश्चित करती हैं।
दूसरा, बुनियादी ढांचा मजबूती मिशन: इसके तहत भारत
मेघराज क्लाउड और ऐरावत जैसे सरकारी क्लाउड पर GPU-आधारित कंप्यूटिंग का विस्तार कर रहा है, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ती AI पहुंच हो।
तीसरा, डेटा सेंटर विस्तार: 10,000 करोड़ के मिशन से उच्च-गुणवत्ता डेटासेट और स्टोरेज क्षमता बढ़ाना।
चतुर्थ, नैतिकता और पक्षपात समाधान: जोखिम-आधारित गवर्नेंस: IT अधिनियम और DPDP के तहत ऑडिट तंत्र, विविध डेटा पर AI प्रशिक्षण अनिवार्य।
पंचम, भाषिणी प्लेटफॉर्म: 22 भारतीय भाषाओं में AI कंटेंट जनरेशन से सांस्कृतिक पक्षपात कम करना।
षष्टम, कौशल और जागरूकता विकासAI कौशल कार्यक्रम: टियर-2/3 शहरों में प्रशिक्षण केंद्र, स्टार्टअप्स के लिए सब्सिडी।
सार्वजनिक-निजी साझेदारी: DAREPP और iDEX जैसे कार्यक्रमों से नवाचार को प्रोत्साहन।
समन्वय रणनीतियां: नीति आयोग के नेतृत्व में अंतर-मंत्रालयी समन्वय और वैश्विक साझेदारियों (समिट के वर्किंग ग्रुप्स) से कार्यान्वयन तेज होगा। ये कदम AI को सशक्त बनाते हुए असमानताओं को पाटेंगे।
यही वजह है कि एआई के क्षेत्र में भारत की वैश्विक छाप स्पष्ट है जो ग्लोबल साउथ की तकदीर संवार सकता है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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