विकास को मुंह चिढ़ाती दूषित जल से होने वाली मौतें

Indore Contamination Water Tragedy
ANI

कम्पोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में दूषित यानी गंदा पानी पीने से हर साल दो लाख लोगों की मौत हो जाती है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2030 तक करीब 600 मिलियन लोगों को पानी की कमी से जूझना पड़ सकता है, जो देश की कुल आबादी का 40% है।

केंद्र सरकार की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत अब 4.18 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद देश में दूषित पेयजल जैसी बुनियादी समस्याएं विकास को मुंह चिढ़ा रही हैं। देश में स्वच्छता में नंबर एक रैंकिंग हासिल करने वाले मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में दूषित पानी से पीने से आठ लोगों की मौत हो गई। इस हादसे में करीब सौ लोग बीमार हो गए। यह तस्वीर बताती है कि देश में पेयजल जैसी मूलभूत समस्याओं का समाधान अभी कोसो दूर है। सरकारें आंकड़ों के जरिए बेशक कितनी ही उपलब्धि का दावा कर लें किन्तु जमीनी हकीकत कुछ अलग है। जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120 वें स्थान पर है और देश के लगभग 70 प्रतिशत जल स्रोत प्रदूषित हैं।

इंदौर में जो हुआ उसने ये शक पैदा कर दिया है कि देश में कहीं भी ऐसी ‘जहरीली मौत’ की सप्लाई हो सकती है। ऐसा तब होता है जब सारे नियम और मानक भुला दिए जाते हैं। भारत में सप्लाई वॉटर की गुणवत्ता और पाइपलाइनों के रखरखाव को लेकर मानक तय हैं। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स सप्लाई वाले पानी के केमिकल, फिजिकल और बायोलॉजिकल पैरामीटर्स तय करता है। गाइडलाइंस कहती हैं कि उपभोक्ता के नल तक पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित करना एजेंसी की जिम्मेदारी है। फिर वो सरकारी हो या प्राइवेट। गाइडलाइंस के मुताबिक पाइपलाइनों को 30 से 50 वर्ष के अंदर बदला जाना जरूरी है। अगर बार-बार लीकेज की शिकायत आती है तो बिना देरी किए पाइप बदला जाना चाहिए। इन गाइडलाइंस का कितना पालन होता है इंदौर की घटना के बाद इस पर सवाल उठ रहे हैं। जिस पर सफाई भी दी जा रही है।

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जुलाई 2022 में गंदे पानी से जुड़े आंकड़े लैंसेट स्टडी में बताया गया कि भारत में करीब 1.95 लाख बस्तियों में लोग दूषित पानी पी रहे हैं। जिसकी वजह से साल 2019 में 23 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। शहर ही नहीं गांवों में भी साफ पानी की दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं। गंदे पानी में बैक्टीरिया, वायरस, टॉक्सिन्स और हेवी मेटल्स जैसे खतरनाक तत्व मौजूद होते हैं, जो शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। अशुद्ध पानी पीने से हैजा, पीलिया, पेचिश, गले की बीमारी, टायफाइड जैसी बीमारियां हो सकती हैं। भारत में हर दिन बड़ी संख्या में लोगों को दूषित पानी पीना पड़ता है। 

कम्पोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में दूषित यानी गंदा पानी पीने से हर साल दो लाख लोगों की मौत हो जाती है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2030 तक करीब 600 मिलियन लोगों को पानी की कमी से जूझना पड़ सकता है, जो देश की कुल आबादी का 40% है। दूषित पानी की समस्या से सबसे ज्यादा दिल्ली और एनसीआर प्रभावित है।  यहां की आबादी बढ़ने के साथ साफ पानी की मांग बढ़ गई है, लेकिन गंदे पानी की आपूर्ति कई लोगों की सेहत को खराब कर रही है। भारत में विश्व की कुल आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है, जबकि देश में  पीने योग्य जल संसाधनों का मात्र 4 प्रतिशत भाग ही उपलब्ध है। देश में अत्यधिक जल दोहन तथा अकुशल प्रबंधन के कारण भू-जल स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। इसके परिणामस्वरूप आने वाले समय में देश को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। 

देश के कई राज्य इस समय पानी की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और तमिलनाडु देश के ऐसे टॉप तीन राज्य हैं, जहां के अधिकतर जिलों में पानी का संकट छाया हुआ है। मौजूद आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के 38 जिलों के लोग पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं। इनमें से कई जिले ऐसे हैं, जिन्हें अति-दोहित, गंभीर और 'अर्ध-गंभीर श्रेणी में रखा गया। इसके बाद राजस्थान में 29 और तमिलनाडु में 22 जिले हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा मूल्यांकित भारत के गतिशील भूजल संसाधनों का राष्ट्रीय संकलन 2024 की रिपोर्ट के अनुसार देश भर के 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 102 जिलों को 'अति-दोहित', 22 जिलों को 'गंभीर' और 69 जिलों को 'अर्ध-गंभीर' श्रेणी में रखा गया है। हरियाणा जैसे अन्य राज्यों में 16 अति-दोहित जिले हैं। पंजाब में 19 अति-दोहित और 1 गंभीर जिला है।

नीति आयोग के अनुसार, वर्तमान में स्वच्छ जल की अपर्याप्त पहुँच के कारण लगभग 60 करोड़ भारतीय गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं तथा इसके कारण प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु होती है। वर्ष 2030 तक देश में जल की मांग, आपूर्ति की दोगुनी होने की संभावना है। इससे देश में करोड़ों लोगों को जल के गंभीर संकट का सामना करना पड़ेगा तथा देश के सकल घरेलु उत्पाद में 6 प्रतिशत की हानि होने की संभावना है। जल संसाधन मंत्रालय के एकीकृत जल संसाधन विकास के लिये राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च उपयोग परिदृश्य में वर्ष 2050 तक जल की आवश्यकता 1,180 अरब घन मीटर होने की संभावना है। देश में जल की उपलब्धता वर्तमान में 1,137 अरब घन मीटर है। वर्ष 2030 तक देश की 40 प्रतिशत आबादी को पीने योग्य स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होगा। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, एक व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं के लिये प्रतिदिन 135 लीटर जल की आवश्यकता होती है जबकि सिर्फ भारत के कुछ बड़े शहरों जैसे- मुंबई, दिल्ली इत्यादि में शहरी विकास मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के बावजूद प्रति दिन प्रति व्यक्ति को 150 लीटर से अधिक जल दिया जाता है। भारत प्रति व्यक्ति जल की खपत के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है। यहाँ प्रति व्यक्ति प्रति दिन जल की खपत लगभग 250 लीटर है। इसका प्रमुख कारण जल की बर्बादी तथा औद्योगिक खपत है। बढ़ती जनसंख्या एवं नगरीकरण देश में बढ़ते जल संकट का एक प्रमुख कारण है। वर्ष 2001 में प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 1816 घन मीटर थी जो कि वर्ष 2011 में घटकर 1545 घन मीटर हो गई और वर्ष 2031 तक इसके घटकर 1367 घन मीटर होने की संभावना है। जल-गहन फसलों की कृषि- देश की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 54 प्रतिशत भाग पर जल-गहन फसलों जैसे- चावल, गेहूँ, गन्ना, कपास इत्यादि की कृषि की जाती है।

भारत में सिंचाई के लिए भूजल का 65% और पीने के पानी के लिए 85% हिस्सा है। इस पर अत्यधिक निर्भरता के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट आई है, खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में। सीमित जल संसाधनों के आवंटन को लेकर संघर्षों को भी जन्म देता है। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को पार्क की जल आवश्यकताओं और स्थानीय किसानों की सिंचाई मांगों के बीच बार-बार होने वाले संघर्षों का सामना करना पड़ता है। इसी तरह महाराष्ट्र की ऊपरी गोदावरी परियोजना में पानी के असमान वितरण को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं। जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन और सरकार की अपर्याप्त भागीदारी इन तनावों को और बढ़ा देती है। जनसंख्या वृद्धि से पानी के लिए प्रतिस्पर्धा तेज हो जाती है। सवाल यही है कि देश की तमाम उपलब्ध्यिों के सरकारी आंकड़ों के बावजूद आम लोगों को जब तक बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं होंगी तब तक ये उपलब्धियां बेमानी साबित होंगी। 

- योगेन्द्र योगी

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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