Iran को पहले US से पिटवाया, फिर दिखावे के लिए Pakistan बीच बचाव के लिए आया, वाह रे दोहरा चरित्र!

इस पूरे खेल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। एक तरफ वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति और सहयोग की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी सरकार की नीतियां और फैसले पाकिस्तान की दोहरी रणनीति को मजबूत करते हैं।
पाकिस्तान की विदेश नीति को अगर सीधे शब्दों में समझना हो तो यह साफ दिखता है कि वह एक साथ दो खेल खेलता है। सामने दोस्ती, पीछे साजिश यही उसकी पहचान बन चुकी है। हाल के घटनाक्रम ने इसे और उजागर कर दिया है। पिछले साल जून में जब पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष असीम मुनीर ने व्हाइट हाउस में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की थी तो इसके पीछे गहरी रणनीति छिपी थी। इस एक बैठक ने दिखा दिया था कि पाकिस्तान कैसे एक तरफ खुद को सहयोगी बताता है और दूसरी तरफ पर्दे के पीछे अपने मतलब का खेल खेलता रहता है।
बताया जाता है कि इस मुलाकात में ईरान के मुद्दे पर लंबी बातचीत हुई थी। यह भी चर्चा में रहा कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए पाकिस्तान के ठिकानों के इस्तेमाल की संभावना टटोली। इससे भी गंभीर आरोप यह है कि पाकिस्तान ने ईरान के परमाणु ठिकानों से जुड़ी जानकारी अमेरिका को उपलब्ध कराई, जिसके आधार पर पिछले साल ही ईरान में अमेरिकी हमला हुआ था। यह न केवल विश्वासघात है बल्कि मुस्लिम दुनिया में भी एक गहरी दरार का संकेत देता है।
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देखा जाये तो पाकिस्तान और ईरान के संबंध कभी भी सहज नहीं रहे। एक ओर धार्मिक मतभेद हैं जहां सुन्नी और शिया का सवाल हमेशा तनाव का कारण बना रहा, वहीं दूसरी ओर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी है। पाकिस्तान खुद को इस्लामी दुनिया की एकमात्र परमाणु शक्ति के रूप में देखता रहा है और वह नहीं चाहता कि कोई और मुस्लिम देश इस श्रेणी में आए। ऐसे में ईरान का परमाणु कार्यक्रम पाकिस्तान के लिए असहजता का कारण बनता है। यही वजह है कि पाकिस्तान खुले मंच पर भले ही तटस्थता की बात करे, लेकिन पर्दे के पीछे वह अलग खेल खेलता दिखता है।
यह दोहरापन सिर्फ ईरान के मामले तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान एक ओर अमेरिका के साथ खुफिया सूचनाएं साझा करता है, वहीं दूसरी ओर खुद को शांति दूत के रूप में प्रस्तुत करता है। ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध में पाकिस्तान ने शांति वार्ता कराने की पहल का दिखावा किया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में शांति की कोशिश थी या अपनी छवि सुधारने का प्रयास था?
इस पूरे खेल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। एक तरफ वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति और सहयोग की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी सरकार की नीतियां और फैसले पाकिस्तान की दोहरी रणनीति को मजबूत करते हैं। यह एक तरह का सुनियोजित भ्रम है जिसमें दुनिया को एक चेहरा दिखाया जाता है और दूसरा चेहरा छिपा रहता है।
साथ ही अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध भी इस संदर्भ में दिलचस्प हैं। डोनाल्ड ट्रंप भले ही अपने पिछले कार्यकाल में पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर कठघरे में खड़ा कर चुके हों, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उनका रुख बदला हुआ नजर आता है। इसकी एक वजह यह भी है कि ट्रंप परिवार का पाकिस्तान में आर्थिक निवेश है। ऐसे में रणनीतिक हित और निजी हित एक दूसरे में घुलते नजर आते हैं।
यही सबसे खतरनाक पहलू है कि अमेरिका पाकिस्तान के इस खुले दोहरे चरित्र को भलीभांति समझता है, फिर भी जानबूझकर उसे नजरअंदाज करता है। यह कोई मजबूरी नहीं बल्कि सोची समझी चाल है। हालिया संघर्षविराम का श्रेय पाकिस्तान को देना इसी खेल का हिस्सा है। अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान एक तरफ आग को हवा देता है और दूसरी तरफ खुद को बुझाने वाला बताता है, फिर भी वह इस्लामाबाद को आगे करता है ताकि अपने रणनीतिक हित साध सके। दूसरी ओर पाकिस्तान इस मौके को ऐसे भुनाता है मानो वह दुनिया का सबसे बड़ा शांति दूत हो, जबकि हकीकत यह है कि वही पर्दे के पीछे हालात बिगाड़ने में भी शामिल रहता है। यह पूरी कहानी एक सुनियोजित नाटक की तरह है, जिसमें अमेरिका और पाकिस्तान दोनों अपने अपने किरदार निभा रहे हैं और दुनिया को गुमराह किया जा रहा है।
यहां असल सवाल यह है कि क्या दुनिया इस दोहरे खेल को समझ रही है? पाकिस्तान लंबे समय से इसी रणनीति पर काम करता आया है। अफगानिस्तान के मामले में भी उसने एक तरफ अमेरिका का साथ दिया और दूसरी तरफ तालिबान को समर्थन दिया। अब वही नीति ईरान के संदर्भ में दिखाई दे रही है।
असीम मुनीर और शहबाज शरीफ की जोड़ी इस रणनीति को नए स्तर पर ले जाती दिख रही है। सेना और सरकार के बीच तालमेल के जरिए एक ऐसा तंत्र तैयार किया गया है जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर भ्रम पैदा करने में सक्षम है। यह सिर्फ कूटनीति नहीं बल्कि एक सुनियोजित छवि प्रबंधन है।
दुनिया के लिए यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान की नीति सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके पीछे गहरी रणनीतिक सोच काम करती है। जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस दोहरे चरित्र को पहचान कर उसके अनुसार प्रतिक्रिया नहीं देगा, तब तक पाकिस्तान इसी तरह दो नावों पर सवार होकर अपने हित साधता रहेगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान आज भी विश्वास और संदेह के बीच खड़ा देश है। उसके कदमों में स्थिरता नहीं बल्कि अवसरवादिता झलकती है।
बहरहाल, ईरान के खिलाफ युद्ध में संघर्षविराम के ऐलान के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को दुनिया का सबसे बड़ा शांति दूत साबित करने में जुटे हैं। हालांकि नोबेल शांति पुरस्कार की चाहत रखने वाले ट्रंप का अपने दूसरे कार्यकाल में युद्ध भड़काना और फिर सभ्यता खत्म कर देने जैसी धमकियां देना उनके असली चरित्र को उजागर करता है। इसी कड़ी में पाकिस्तान भी पीछे नहीं है, जो इस संघर्ष में मध्यस्थता का श्रेय लेने की कोशिश कर रहा है। असीम मुनीर और शहबाज शरीफ के नेतृत्व में पाकिस्तान एक तरफ शांति की बात करता है, जबकि दूसरी ओर उसी पर दुनिया भर में अशांति और आतंकवाद फैलाने के आरोप लगते रहे हैं। सच यह है कि यह पूरा घटनाक्रम शांति का नहीं बल्कि दोहरे चरित्र और अवसरवादी राजनीति का एक और उदाहरण बनकर सामने आया है, जिसे अब दुनिया साफ साफ समझने लगी है।
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