मोदी और शाह की जोड़ी सहमति और समन्वय से इतिहास रचते चली जा रही है

By प्रभात झा | Publish Date: May 27 2019 11:59AM
मोदी और शाह की जोड़ी सहमति और समन्वय से इतिहास रचते चली जा रही है
Image Source: Google

अवसर तो भारत में बहुत बड़े बड़े नेताओं और राजनैतिक दलों को मिला, पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते अमित शाह ने सहमति और समन्वय का इतिहास रचा है। यह वर्तमान राजनीति में अद्वितीय घटना है।

सन् 2019 लोकसभा चुनाव के जनादेश का सभी राजनैतिक दलों को गहरा अध्ययन करना चाहिए। मुझे विश्वास है कि वे ऐसा कर भी रहे होंगे। अभी तक जो हमने विश्लेषण किया है, उसमें राजनैतिक दलों के लिए अनेक सन्देश छिपे है, उसे क्रमशः रखने का प्रयास कर रहा हूं। इस जनादेश में इतिहास रचा है। 'इतिहास' घटता है न कि घटाया जाता है। अवसर तो भारत में बहुत बड़े बड़े नेताओं और राजनैतिक दलों को मिला, पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते अमित शाह ने सहमति और समन्वय का इतिहास रचा है। यह वर्तमान राजनीति में अद्वितीय घटना है। इस सन्देश के पीछे इस 'समन्वय' की बहुत बड़ी भूमिका है।

इसे भी पढ़ें: महाविजय के बाद काशी में शिवभक्त मोदी की पूजा-अर्चना

नेता जो सोचता है, संगठन उसे पूरा करने में लग जाए और संगठन जो सोचे उसे नेता पूरा करने में लग जाए यह सामान्य बात नहीं है। भाजपा को छोड़कर देश में अभी ऐसा राजनैतिक दल कोई नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने असंभव को संभव कर दिखाया है। इस जनादेश में जो सबसे बड़ा सन्देश है, वह यह है कि नेता को अपने अध्यक्ष यानी संगठन पर और संगठन को अपने नेता पर अटूट विश्वास होना चाहिए। जबकि आज की राजनीति में होता यह है कि 'नेता' सरकार ही नहीं संगठन को भी चलाने लगता है और संगठन नेता को हटाने में लग जाता है। आज भारतीय राजनीति के शीर्ष नेतृत्व में इस स्तर पर ऐसे ही सात्विक विश्वास की आवश्यकता लगती है। कमोवेश इस धुरी पर विपक्षी दल अपने को देखेंगे तो बहुत ही कमजोर पाएंगे।





 


इस जनादेश में कुछ महत्वपूर्ण सन्देश और भी है जैसे भारत के जनविवेक को जातीय आधार पर देखना। जनतंत्र के 73 वर्ष हो गए। अब जनता परिपक्व हो गई है। उसके जन विवेक को जात से जोड़कर अपना गुलाम या मजबूरी समझना हमारी नादानी हो सकती है, समझदारी नहीं। 'जातीय' मिथक तोड़ने का यह प्रयास निरंतर जारी रहना चाहिए। सब समाज को लिए साथ में बढ़ते जाना सिर्फ गीत नहीं है, इस भावना को संगठन में साकार करना चाहिए।

इसे भी पढ़ें: भारत का खोया हुआ रुतबा वापस पाने का आ गया समय: नरेंद्र मोदी

इस जनादेश में सन्देश है की 'दल से बड़ा देश' है। इस विचार से हटकर अन्य राजनैतिक दलों की स्थिति यह है कि सबसे पहले स्वयं फिर दल और उसके बाद देश। अधिकतर राजनैतिक दल तो सिर्फ परिवार चलाने के लिए पार्टी चलाते हैं। इस जनादेश ने साफतौर पर सन्देश दिया है कि अपवाद स्वरूप परिवारवाद या वंशवाद ठीक है, पर इसी भाव पर आधारित राजनैतिक दलों को जनता ने धराशाही कर दिया। इस चुनाव में ऐसा कई जगह देखने को मिला।
 
जनादेश 2019 में एक और बड़ा सन्देश है की यदि आप जनप्रतिनिधि हैं तो आप पर जनता का हक़ है। आपको न्यूज़ चैनलों की तरह 'चौबीस घंटे' दिखना पड़ेगा। चैनलों को तो दिखना पड़ता है, पर अब राजनैतिक तौर पर निर्वाचित जनप्रतिनिधि को दिखने के साथ-साथ काम भी करते रहना होगा।
 
इस जनादेश में एक और सन्देश कि आप विरोध के लिए विरोध न करें। विरोध सार्थक - समर्थ और तथ्यों के साथ-साथ जनता के विवेक को स्वीकार भी होना चाहिए। अनर्गल आरोपों से नेता और उसके राजनैतिक दल का ही बुरा हश्र होता है। पुलवामा के बाद बालाकोट की घटना को देश ने सराहा, पर विपक्षी दलों ने मजाक उड़ाया। विपक्ष की इसको लेकर बड़ी आलोचना हुई। भारतीय राजनीति में मतभेद सदैव रहेंगे, पर उसकी मर्यादाएं और मानदंड को कभी नहीं भूलना चाहिए।
 
एक और महत्वपूर्ण सन्देश है इस जनादेश में। इसे सभी राजनैतिक दलों को खासकर विरोधी दलों को समझना चाहिए। जैसे देश में होते हुए विकास और दिखते हुए काम की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। विपक्षी दलों ने आंखें होते हुए भी इन मसलों पर अंधे होने का प्रमाण दिया। आप दो आंखों से जनता को देखना चाहते हो, पर आप यह भूल जाते हो कि जनता हजारों आंखों से आपके हर कार्य को देखती है। अतः विरोध विचारों का होना चाहिए न की देश में हो रहे विकास का। विपक्षी दल विकास का विरोध करते रहे अतः उनका स्वयं का विकास रुक गया और साथ ही उनकी सोच भी थम गयी। जनादेश में सन्देश यह भी है कि धर्म निरपेक्षता के नाम पर अब मतदाता को, आम नागरिक को गुमराह नहीं किया जा सकता।
 
इस जनादेश में एक बहुत ही गहरा सन्देश है, जिसे सभी दलों को गौर से समझना चाहिए। आज भारतीय राजनीति में नए लोगों को दल से जोड़ना। पीढ़ियों में परिवर्तन। अनुभव और ऊर्जा का समन्वय। प्रतिभा की रक्षा और अमर्यादितों को पलायन पर मजबूर करना। आज भाजपा को छोड़कर किसी राजनैतिक दल ने इस तरह का साहस नहीं दिखाया। सन् 2019 के जनादेश ने सबसे महत्वपूर्ण सन्देश दिया है कि देश उसे पसंद करता है जो देश हित में साहसिक निर्णय लेते हैं न कि केवल दल हित में। मोदी सरकार के साहस को लोगों ने वोट की नजरों से नहीं देखा। देश ने मोदी सरकार के साहसिक निर्णयों को देश हित में देखा। जबकि सभी विपक्षी दलों ने उन साहसी निर्णयों को वोटों की नजरों से देखा। अब यहां समझ में आता है कि जिस साहसिक निर्णय को जनता ख़ुशी से स्वीकार करती है, उस निर्णय के विरुद्ध विपक्षी दल विरोध जताकर क्या जनता के मन के विरुद्ध नहीं जा रहे ? यह बात तो स्पष्ट हो गयी है कि जनता साहसिक निर्णय वाली सरकार चाहती है। इस जनादेश में सन्देश तो बहुत है पर एक अंतिम और महत्वपूर्ण सन्देश है कि संविधान संसद, सरहद और सुरक्षा के साथ-साथ उपलब्ध लोगों में देश किनके हाथों में सुरक्षित है। इन अहम् मसलों पर लोग जब विचार करते हैं तो उनकी आंखों से सभी नेताओं के चेहरे चलचित्र की तरह सामने आते हैं। ऐसा होने पर लोग उसी की ओर जिन पर उनका अटूट विश्वास होता है, जाते हैं। जन-जन का विश्वास जीतने के लिए विश्वास पूर्ण कार्य भी करना पड़ता है। नरेंद्र मोदी इस मसले पर सबसे अव्वल रहे। उन्हें इसका दोहरा ईनाम मिला। एक यह की उन पर जनता में अटूट विश्वास था और अमित शाह उस अटूट जनविश्वास को जन-जन तक बड़ी ताकत से संगठन के माध्यम से घर घर ले गए।
 

 
इस जनादेश का मेरी नजरों में एक महत्वपूर्ण सन्देश जिसे मैं मानता हूं, वह यह है कि अपने दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं को सम्मान देना। दल का श्रृंगार होता है दल का कार्यकर्ता। जिस दल को उनके कार्यकताओं का विश्वास नहीं वह दल जनता में कैसे विश्वास हांसिल कर सकता है। आज भारतीय राजनीति और राजनैतिक दलों में इसकी महती आवश्यकता होनी चाहिए। कार्यकर्ता राजनैतिक दलों और जनता के बीच सेतु का कार्य करता है। इस जनादेश में सन्देश तो बहुत है क्रमश ! राजनैतिक दल ईमानदारी से समझने का प्रयत्न कर लें।
 
-प्रभात झा
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)
 

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप   



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

Related Story

Related Video