विजय पथ तक पहुँचने के लिए पश्चिम बंगाल में धर्म पथ पर खूब चले मोदी और शाह

पश्चिम बंगाल में धार्मिक यात्राओं के माध्यम से भाजपा ने बंगाल की सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक जड़ों से जुड़ने का प्रयास किया, ताकि खुद को बाहरी पार्टी की बजाय एक संवेदनशील और जुड़ी हुई शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत के लिए जी-तोड़ मेहनत करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जमकर चुनाव प्रचार तो किया ही साथ ही पूजा पाठ में भी कोई कमी नहीं छोड़ी। पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण के मतदान वाले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी में बाबा श्री काशी विश्वनाथ का पूजन कर रहे थे। जबकि मतदान से एक दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुजरात में भगवान श्री सोमनाथ का पूजन किया। यही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा में जाकर मिलने वाली हुगली नदी में नौका यात्रा और पूजन किया तो वहीं अमित शाह ने हुगली नदी और बंगाल की खाड़ी के पवित्र संगम पर स्थित गंगासागर का दर्शन और पूजन किया। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतुआ समुदाय के मुख्य मंदिर ठाकुरबाड़ी और राजधानी कोलकाता के ऐतिहासिक ठनठनिया काली मंदिर में पूजा-अर्चना की तो अमित शाह ने कपिल मुनि आश्रम में महर्षि कपिल का पूजन कर देशवासियों के कल्याण की कामना की।
बंगाल में मतदान वाले दिन प्रधानमंत्री का श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन करने का अधिक महत्व इसलिए है क्योंकि काशी (वाराणसी) को बंगालियों का दूसरा घर या सांस्कृतिक रूप से बंगाल के बहुत करीब माना जाता है। सदियों से बंगाली तीर्थयात्री, विद्वान और साधु-संत काशी आते रहे हैं, साथ ही कई बंगाली जमींदारों और राजाओं ने काशी में घाटों और मंदिरों का निर्माण करवाया। यही नहीं, वाराणसी में दशाश्वमेध घाट के पास स्थित 'बंगाली टोला' क्षेत्र में बंगाली समुदाय की घनी आबादी है, जहाँ बंगाली संस्कृति, भाषा और खान-पान का गहरा असर देखने को मिलता है। वहीं गुजरात के श्री सोमनाथ में त्रिवेणी संगम (कपिला, हिरन और सरस्वती) के पास चंद्रभागा शक्तिपीठ स्थित है, जो बंगाली भक्तों के लिए महत्वपूर्ण है।
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प्रधानमंत्री मोदी की ओर से हुगली नदी पर किये गये नौका विहार का भी खास महत्व है। हुगली को 'आदि गंगा' के रूप में पूजा जाता है। बंगाल के लोगों के लिए हुगली का महत्व वैसा ही है जैसा उत्तर भारत में गंगा का है। नरेंद्र मोदी ने 2014 में जब लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए वाराणसी को चुना था तो उन्होंने सबसे पहले यही कहा था कि मुझे तो माँ गंगा ने बुलाया है। इसी तरह खुद को 'गंगापुत्र' कहने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल चुनावों के बीच हुगली को "मां गंगा" कहकर संबोधित किया और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। इससे उन्होंने अपनी छवि को बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के साथ जोड़ा। प्रधानमंत्री ने हुगली के किनारे समय बिताकर और बेलूर मठ जैसे आध्यात्मिक केंद्रों की यात्रा कर यह दिखाने की कोशिश भी की कि उनकी पार्टी बंगाल की जड़ों और विरासत का सम्मान करती है।
वहीं अमित शाह की गंगा सागर यात्रा भी काफी प्रभावशाली रही। सदियों से यह कहा जाता रहा है कि सब तीर्थ बार बार, गंगा सागर एक बार। अमित शाह ने इस यात्रा के जरिए भाजपा को बंगाल की जड़ों से जोड़ा। ऐतिहासिक कपिल मुनि आश्रम में पूजा-अर्चना कर उन्होंने बंगाली धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया। उन्होंने गंगा को गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक भारत को जोड़ने वाली एक आध्यात्मिक कड़ी बताया, जिससे भाजपा ने यह संदेश दिया कि बंगाल की संस्कृति पूरे भारत के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। साथ ही अमित शाह ने गंगा सागर में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देकर धर्म और राष्ट्रवाद को एक साथ जोड़ा, जो भाजपा की चुनावी रणनीति का मुख्य आधार रहा है।
इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्य की राजधानी कोलकाता के ऐतिहासिक ठनठनिया काली मंदिर में पूजा-अर्चना कर भी बड़ा संदेश दिया। उत्तरी कोलकाता की प्रमुख उत्तर-दक्षिण सड़क बिधान सरानी पर स्थित, ठनठनिया काली मंदिर की स्थापना 1703 में उदय नारायण ब्रह्मचारी ने उस भूमि पर की थी, जहां उस समय श्मशान घाट हुआ करता था। इस मंदिर में मां सिद्धेश्वरी की पूजा की जाती है। यहाँ की एक विशिष्ट परंपरा मांसाहारी प्रसाद चढ़ाने की है। इस मंदिर में पूजा कर प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया कि भाजपा बंगाल की विविध खान-पान और धार्मिक परंपराओं को स्वीकार करती है और उनका सम्मान करती है, जिससे विरोधियों के "शाकाहारी थोपने" के आरोपों का जवाब दिया गया। साथ ही यह मंदिर रामकृष्ण परमहंस से भी जुड़ा है, जो यहाँ अक्सर भजन गाने आते थे। इस यात्रा के जरिए भाजपा ने खुद को बंगाल के पुनर्जागरण और आध्यात्मिक महापुरुषों की विरासत से भी जोड़ा।
वहीं उत्तर 24 परगना जिले के ठाकुरनगर में मतुआ महासंघ के मुख्य मंदिर ठाकुरबाड़ी में दर्शन कर प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल के दलित (नामशुद्र) समाज के प्रति सम्मान व्यक्त किया। पीएम मोदी ने 2021 में बांग्लादेश स्थित मतुआ समुदाय के जन्मस्थान ओराकांडी की भी यात्रा की थी। ठाकुरबाड़ी की वर्तमान यात्रा उस निरंतरता को दर्शाती है। मतुआ मतदाता कम से कम 34 विधानसभा सीटों और बांग्लादेश सीमा के करीब स्थित दो दर्जन अन्य सीटों को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं। उल्लेखनीय है कि हरिचंद ठाकुर द्वारा 19वीं शताब्दी में स्थापित मतुआ महासंघ एक सामाजिक-धार्मिक आंदोलन है, जिसने ऐतिहासिक रूप से शिक्षा और सामाजिक सुधार के माध्यम से नामशुद्र समुदाय के उत्थान के लिए काम किया है।
बहरहाल, पश्चिम बंगाल चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की ये धार्मिक यात्राएं केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा थीं। इन यात्राओं के माध्यम से भाजपा ने बंगाल की सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक जड़ों से जुड़ने का प्रयास किया, ताकि खुद को बाहरी पार्टी की बजाय एक संवेदनशील और जुड़ी हुई शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। आस्था, संस्कृति और राजनीति के इस संगम ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक भारतीय चुनावों में प्रतीकवाद और भावनात्मक जुड़ाव उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने विकास और नीतिगत मुद्दे।
-नीरज कुमार दुबे
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