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संघ मुख्यालय में प्रणब मुखर्जी के दिये गये भाषण के असल मायने

By डॉ. विजय सोनकर शास्त्री | Publish Date: Jun 11 2018 10:51AM

संघ मुख्यालय में प्रणब मुखर्जी के दिये गये भाषण के असल मायने
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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में हिस्सा लेना, देश के तथाकथित सेकुलर नेताओं को रास नहीं आया। हालांकि संघ के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद उसी कांग्रेस ने श्री मुखर्जी की प्रशंसा करना शुरू कर दी, जिनकी आलोचना करने के लिए कांग्रेस के अनेकों ऐसे नेता मैदान में उतर आये थे, जिन्होंने राजनीति की प्राथमिक शिक्षा श्री मुखर्जी से हासिल की थी। कांग्रेस के तमाम नेताओं के विरोध के बाद संघ के कार्यक्रम में पहुंचे श्री मुखर्जी द्वारा दिए गए सम्पूर्ण भाषण पर अगर ध्यान दिया जाए तो कहना गलत नहीं होगा कि स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता ने सार्वजनिक रूप से यह कहने में किसी तरह का संकोच नहीं किया कि भारत की 5000 वर्ष पुरानी सभ्यता पर हमला किया गया और सैंकड़ों सालों तक भारत पर शासन किया गया। इनमें वह अरब के विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी शासक भी शामिल थे, जिन्होंने भारत पर हमला करके 600 वर्षों तक शासन किया।

विदेशी मुस्लिम शासकों की उदार छवि बनाना साजिश थी
 
श्री मुखर्जी के भाषण के इन अंशों पर अगर ध्यान दिया जाए तो यह कांग्रेस और वामपंथियों के उस झूठ और चरित्र को उजागर करने के लिए काफी हैं, जिसके आधार पर कांग्रेस और वामपंथी पिछले कई दशकों से भारत की जनता के समक्ष विदेशी मुस्लिम शासकों की उदार और हिन्दू प्रेमी छवि बनाकर, जहां भारतीय मुसलमानों के वोटों का उपयोग वोट बैंक की तरह करते आ रहे थे, वहीं हिन्दुओं का उपयोग तथाकथित धर्मनिरपेक्षता और गंगा-जमुनी संस्कृति का उदाहरण देकर किया जा रहा था।
 
कांग्रेस पोषित वामपंथी और कथित विदेशी इतिहासकारों के मस्तिष्क से उत्पन्न आक्रांता मुस्लिम शासकों की तथाकथित सहिष्णुता को आइना दिखाने वाले श्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि 12वीं सदी के बाद भारत में 600 वर्ष मुस्लिम शासकों का राज रहा, लेकिन भारत की प्राचीन संस्कृति कायम रही। देखा जाए तो श्री मुखर्जी ने कांग्रेस नेता के रूप में यह सत्य कभी खुलकर स्वीकार नहीं किया था, पर संघ के कार्यक्रम में शामिल होने के बाद, उनकी स्वीकारोक्ति ने भारत की अनेकों वर्तमान समस्या के मूल कारणों को उजागर करके रख दिया है। जाति-पांति एवं संप्रदायवाद पर आधारित राजनीति के कारण यह प्रश्न स्वाभाविक होता है कि 600 वर्षों के मुस्लिम शासनकाल के बाद भी मुसलमानों की दयनीय हालत क्यों है ?
 
वैदिक काल की सामाजिक संरचना को समझें
 
किसी भी देश के वास्तविक इतिहास पर ध्यान दिया जाए तो यह कहना अनुचित नहीं लगता कि ऐतिहासिक घटनाएं तत्कालीन समाज को तो प्रभावित करती ही हैं, साथ ही इतिहास का असर किसी भी समाज में सदियों तक देखा जा सकता है। कुछ ऐसा ही भारत में भी हुआ है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता के स्वर्णिम काल के रूप में वैदिक काल को देखा जा सकता है। वैदिक काल की सामाजिक संरचना का आधार जनमूलक सिद्धांत था। सामाजिक रूप से मजबूत हिन्दू समाज का ताना-बाना काफी मजबूत था और तत्कालीन समाज चार वर्णों, 117 गोत्र और महज 36 जातियों में सीमित था और समाज में किसी भी तरह का तनाव या जटिल वाद-विवाद की कोई स्थिति नहीं थी।
 
उत्तरवैदिक व्यवस्था में लोकजीवन अथवा समाज थोड़ा-सा जटिल हो गया और वर्ण को गुण धर्म के अनुसार कर्म के लिए स्वीकृति मिली। वर्णों की श्रेणियों का विकास हुआ जो कालांतर में वर्ण व्यवस्था के रूप में प्रभावी हुई। उत्तर वैदिक काल के बाद जिस तरह से भारत की समृद्धि पर विदेशी आक्रांताओं की नजर पड़ी, उसके बाद सबसे पहले तो वे भारत की समृद्धि को लूटने के लिए आतुर हो गए और तदोपरांत उसके बाद उन्होंने भारत के शासन एवं सत्ता पर ही कब्जा करके भारतीय हिन्दू समाज और संस्कृति को इस तरह से खंडित किया कि उसका परिणाम वर्तमान भारत में भारत सरकार के गजट के अनुसार केवल हिन्दू समाज में 6500 से अधिक जातियों एवं पचास हजार से अधिक उपजातियों के रूप में देखा जा सकता है। वर्तमान हिन्दू समाज में व्याप्त जाति-भेद, कुरीतियों, भेदभाव, उच्च-निम्न का भाव तथा धनी-निर्धन जैसी अतार्किक एवं अर्थहीन स्थितियां, 12वीं सदी के बाद लम्बी विदेशी आक्रांताओं की दासता एवं उनके द्वारा हुए प्रचंड उत्पीड़न एवं नरसंहार का कुत्सित परिणाम हैं। विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों से भारत की बदली हुई तस्वीर, भारत में स्थापित पांच नए चेहरों क्रमश: दलित, वनवासी, मुस्लिम, सिख और ईसाई के रूप में देखी जा सकती है।
 
उत्तरवैदिक काल के बाद से लेकर मौर्य काल और गुप्त काल तक भारत एक सूत्र में बंधा हुआ था। पांचवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्तर-पश्चिम भागों पर हूणों के आक्रमण के बाद गुप्त साम्राज्य का ह्रास होना प्रारंभ हुआ। शकों, हूणों और कुषाणों के आक्रमणों के दौरान एकजुट भारत की राजनीतिक तस्वीर बदलने लगी और देश छोटे छोटे राज्यों में विभक्त होने लगा और आपसी लड़ाई के कारण तत्कालीन राजाओं की स्वयं की शक्ति कमजोर होती चली गयी। भारत के इन हालातों का पूरा लाभ अरब के विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने उठाया और 636 ईसवीं से लेकर 11वीं सदी तक कई अरब के विदेशी मुस्लिम आक्रांता भारत में आक्रमण करके घुसे और धन-सम्पदा लूटने के साथ ही यहां के लाखों स्त्री-पुरुषों को गुलाम बनाकर ले गए। मोहम्मद गजनी और मोहम्मद गौरी से लेकर अंग्रेजी शासन काल तक भारत की मूल सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक संस्कृति को नोचने-खसोटने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी।
 
हिन्दुओं को जबरन इस्लाम स्वीकार कराया गया
 
भारत में अरब के विदेशी इस्लामिक शासन स्थापित होने के बाद हिन्दुओं पर जमकर अत्याचार किये गए, परिणामस्वरूप लाखों हिन्दुओं ने सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए परिवार सहित इस्लाम स्वीकार कर लिया और भारत में एक नए पंथ को जड़ें जमाने के लिए भरपूर मौका दिया। भारत में रहने वाले 99 प्रतिशत मुस्लिम लोग, वही हिन्दू समाज के लोग हैं, जिन्होंने अपनी जान बचाने के लिए दमन और दलन के उपरांत इस्लाम स्वीकार कर लिया था।
 
विदेशी मुस्लिम शासकों और अंग्रेजों ने इस तरह बनाए 'दलित'
 
विदेशी मुस्लिम शासकों ने भारत पर कब्जा करके मुस्लिम आबादी को बढ़ाने के लिए हर तरह के जायज-नाजायज प्रयास किये और तलवार की नोंक पर धर्मान्तरण का प्रचंड अभियान चलाया। इसके कारण जहां कमजोर हिन्दुओं ने भय, अत्याचार, व्यभिचार एवं अपने सामने मां-बहन की लुटती अस्मत एवं इज्जत को न सह कर इस्लाम स्वीकार कर लिया, वहीं स्वाभिमानी, राष्ट्राभिमानी और धर्माभिमानी हिन्दुओं ने धर्मपरिवर्तन तो नहीं किया, सब कुछ लूट जाने के बाद जीवन यापन के दबाव और आक्रांताओं के अत्याचार के कारण पेट पालने के लिए अस्वच्छ एवं गंदे कार्यों जैसे चर्म कर्म तथा सफाई कार्यों को करने के लिए मजबूर हो गए। मुस्लिम शासकों द्वारा अत्याचार को झेलने और अस्वच्छ एवं अस्पृश्य कार्यों को करने के लिए मजबूर किये गए हिन्दुओं को सामाजिक व्यवस्था में आए परिवर्तन से धीरे-धीरे अस्वच्छ कार्यों के उपरांत अस्पृश्यता के कारण अछूत बनाकर उन्हें उनके अपने समाज की पिछली पक्ति में खड़ा कर दिया और अंग्रेजों ने उन्हें दलित का नाम देकर, भारतीय सामाजिक व्यवस्था में एक नया वर्ग के रूप में स्थापित कर दिया। बारहवीं शताब्दी के पूर्व में इस देश में एक भी अस्वच्छ कार्य या अस्पृश्यता का उदाहरण नहीं मिलता हैं। डॉ. अम्बेडकर ने भी अपनी पुस्तक ‘अछूत कौन और कैसे?’ के पृष्ठ 100 पर उल्लेख किया है कि भारत में शूद्र कभी अस्पृश्य नहीं था एवं मनुकाल में भी अश्पृश्यता नहीं थी।
 
इसी तरह वर्तमान में हिन्दुओं के जिस समूह को वनवासी कहा जाता है, अगर उन वनवासियों की उत्पत्ति पर ध्यान दिया जाए तो यह खुलासा होता है कि वनवासी और कोई नहीं, बल्कि हिन्दू समाज के वह लोग हैं, जो विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचार से बचने के लिए परिवार सहित जंगलों, पहाड़ों एवं दुर्गम स्थानों में जाकर बस गए और विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं का भरपूर मुकाबला किया तथा मुगलों एवं अंग्रेजों को जंगल में घुसने नहीं दिया। भारत का जंगल सर्वदा स्वतन्त्र ही रहा था। वनवासी समाज को उस समाज के रूप में भी देखा जा सकता है, जिस समाज ने न तो धर्मपरिवर्तन किया और न ही अस्पृश्य, अस्वच्छ एवं गंदे कार्यों को करने के लिए तैयार हुए।
 
सिख धर्म की उत्पत्ति
 
विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं के शासन काल में ही देश के अंदर सिख धर्म की भी उत्पत्ति भी हुई। सिख पंथ की उत्पत्ति मुस्लिम आक्रांता शासकों की कलई को खोलने वाली घटना के रूप में भी देखा जा सकता है। गुरु नानक देव जी के कथनों पर चलते हुए सिख पंथ एक व्यवस्था के रूप में प्रारम्भ हुआ। हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए प्रत्येक हिन्दू परिवार के सबसे बड़े पुत्र को शिष्य बनाया जाता था, जो आजीवन अविवाहित रह कर अपने धर्म एवं संस्कृति के रक्षक के रूप में पंद्रहवीं शताब्दी में आक्रांताओं से लड़ता रहता था। कालांतर में उसी शिष्य परंपरा को ही सिख पंथ के रूप में सामाजिक मान्यता प्राप्त होती चली गयी। सिखों का इतिहास बताता है कि अरब के विदेशी मुस्लिम शासकों ने सिख पंथ व्यवस्था को समाप्त करने के लिए भरपूर प्रयास किये पर सिखों की बहादुरी के आगे मुस्लिम शासकों के सारे प्रयास असफल ही सिद्ध हुए।  
इसी तरह भारत में स्थित ईसाई पंथ के सन्दर्भ में एक अप्रमाणित किन्तु विश्वसनीय चर्चा होती है।
 
अंग्रेजों के साथ ईसाई मिशनरियां भारत में आयीं
 
ऐसा कहा जाता है कि ईसाई पंथ के प्रवर्तक जीजस क्राइस्ट यानी ईसा मसीह ने तत्कालीन अखंड भारत का भूभाग यानी वर्तमान अफगानिस्तान एवं कश्मीर के बौद्ध मठों में शिक्षा और दीक्षा ग्रहण की। ईसा मसीह के 12 शिष्यों में से एक शिष्य थे जिनका नाम था सेंट थॉमस। सेंट थॉमस ने ही सर्वप्रथम केरल के एक स्थान से ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार शुरू किया। अंग्रेजों के आगमन के साथ देश में व्यापक रूप से ईसाई पंथ का प्रवेश हुआ। लगभग 600 वर्षों के विदेशी मुस्लिम शासकों एवं लगभग 200 वर्षों के अंग्रेजों के दासता काल में भारत का जंगल सर्वदा स्वतन्त्र रहा। अंग्रेजों के साथ ही ईसाई मिशनरियां भारत में आयीं, जिन्होंने भारत में धर्मान्तरण को तीव्र गति एवं आगे बढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। वनवासी इलाकों से लेकर देश के उन विभिन्न हिस्सों में, जहां निर्धन एवं दयनीय स्थिति में अव्यवस्थित जीवन यापन कर रहे वनवासी लोगों के धर्मान्तरण के लिए ईसाई मिशनरियों ने उनकी दयनीय हालत को अपना हथियार बनाया और दलित एवं वनवासी हिन्दुओं को ईसाई बनाकर अपने हितों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस तरह देखा जाए तो भारत के इतिहास को परिवर्तित करने वाले मुस्लिम आक्रांताओं और ईसाई मिशनरियों एवं अंग्रेजों ने इस देश के अंदर वर्तमान समस्याओं को जन्म दिया और उन समस्याओं के निराकरण के नाम पर देश में अपनी सत्ता का संचालन करते रहे।
 
इतिहास के प्रचुर मात्रा में प्राप्त मध्यकालीन प्रमाणों के आधार पर कह सकते हैं कि इस देश की सभी प्रमुख समस्याओं की जड़ में वे ही विदेशी मुस्लिम आक्रांता हैं। स्वतंत्र भारत में मुस्लिम देश का निर्माण और देश में व्याप्त जाति और धार्मिक समस्याओं की मूल जड़ के रूप में इन्हीं विदेशी आक्रांताओं की नीतियों को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
 
प्रणब मुखर्जी ने दिखाया आइना
 
इस प्रकार हम देखें तो पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस और वामपंथी नेताओं को आइना दिखाने में कोई कसर नहीं बाकी रखी। अब यह अलग बात है कि कांग्रेस और वामपंथी श्री मुखर्जी के भाषण में मौजूद भारतीय समाज और संस्कृति के सच को समझ पाने में असफल साबित हो गये और अब वह सभी श्री मुखर्जी की प्रशंसा करते हुए संघ के विरोध में कुतर्क गढ़ने में लगे हुए हैं।
 
-डॉ. विजय सोनकर शास्त्री
(लेखक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

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