असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी

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सोशल मीडिया को लोकतंत्र के बड़े मंच के रूप में 17 दिसंबर 2010 को ट्यूनिशिया के सिटी बौजिज शहर में फलों का ठेला लगाने वाले मोहम्मद बोआजीजी की आत्महत्या के बाद हुए उबाल के बाद देखा जाने लगा। म्यूनिसिपल कर्मचारियों की सख्ती के चलते क्षुब्ध बोआजीजी ने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा ली।

दिल्ली में बीस जुलाई को काकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा और 23 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी के जेन जी के संबोधन की वीडियो फेसबुक और इंस्टाग्राम से हटाए जाने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बहुत चर्चा में हैं। चर्चा से ज्यादा उनकी भूमिका कहीं ज्यादा विमर्श के केंद्र में है। इसमें दो राय नहीं कि दुनियाभर में जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ज्यादा प्रचलन में हैं, उनमें से ज्यादातर विदेशी हैं। जाहिर है कि वे उन जगहों के कानूनों और सांस्कृतिक परंपराओं से ज्यादा संचालित हैं, जहां उनके मुख्यालय हैं। इसलिए अपने व्यापक हितों के लिए वे अपने प्रचलन वाले देशों की परंपराओं और संस्कृतियों को सवालों के घेरे में लाने, उसका उपहास उड़ाने और उन्हें तार-तार करने वाला अलगोरिदम उन्होंने विकसित कर रखा है। जिसका खामियाजा तीसरी दुनिया के देश और वहां की सांस्कृतिक परंपराएं उठा रही हैं।

सोशल मीडिया को लोकतंत्र के बड़े मंच के रूप में 17 दिसंबर 2010 को ट्यूनिशिया के सिटी बौजिज शहर में फलों का ठेला लगाने वाले मोहम्मद बोआजीजी की आत्महत्या के बाद हुए उबाल के बाद देखा जाने लगा। म्यूनिसिपल कर्मचारियों की सख्ती के चलते क्षुब्ध बोआजीजी ने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा ली। किसी ने इस घटना को सोशल मीडिया पर डाल दिया। सोशल मीडिया के तत्कालीन अलगोरिदम ने इस घटना को इस रूप में प्रस्तुत किया कि समूचे अरब जगत में उबाल आ गया। नागरिक अधिकारों की स्थापना और लोकतंत्र की बहाली की मांग को लेकर अरब देशों की जनता सड़कों पर उतर आई। इसका ही नतीजा मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर दिखा। जहां महीनों तक लोग जमे रहे और वहां के राष्ट्रपति को इस्तीफा देना पड़ा। यह आग सीरिया, यमन और लीबिया तक जा पहुंची। वहां के पारंपरिक शासकों के खिलाफ लोगों का दबा हुआ गुस्सा निकला और कई जगह सत्ताएं बदल गईं। भारत में भी इसके ही कुछ महीनों बाद अन्ना हजारे को आगे रखकर एक आंदोलन छेड़ा गया। जिसकी परिणति आम आदमी पार्टी के रूप में हुई और वह दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई। फिर पंजाब में भी उसने पैठ बना ली। 

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इन घटनाओं को याद करना इसलिए जरूरी है कि इन सबके पीछे सोशल मीडिया के जरिए त्वरित गति से फैलाई गई सूचनाओं का हाथ सबसे ज्यादा रहा। तब सोशल मीडिया को लोकतंत्र के लिए जरूरी बताया गया। सोशल मीडिया के बारे में कहा गया कि लोकतंत्र में सबकी आवाज पहुंचाने और उन्हें मौका देने का यह बड़ा माध्यम है। इसे लोकतंत्र के वाजिब और जरूरी औजार के रूप में भी मान्यता मिली। लेकिन बीतते वक्त के साथ पता चल रहा है कि जिसे हम सोशल मीडिया कहते हैं, वह लोकतंत्र के लिए जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा अनसोशल यानी असामाजिक भी है। यह ठीक है कि सोशल मीडिया के जरिए व्यवस्था की अंधी सुरंग में खो रही आवाजों को मौका मिलता है। लेकिन यह उतना ही सच है कि इस माध्यम ने लोगों की नजर का पानी उतार दिया है। लोग अब लिहाज करना भूल गए हैं। सोशल मीडिया पर अगर किसी की बात पसंद नहीं आती तो उसे खुलेआम  गालियां दी जा सकती हैं। उसके चरित्र पर आक्षेप लगाया जा सकता है। उसका चरित्र हनन किया जा सकता है। चाहे वह व्यक्ति सामाजिक जीवन में कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, उसकी उम्र चाहे जितनी भी बड़ी क्यों ना हो। 

सोशल मीडिया मंचों ने अपना अलगोरिदम भी ऐसा विकसित किया है, जो अच्छी बातों, सामाजिक चिंतन और बेहतर कल की बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं देखा। एक तरह से कहें तो वह इसकी अनदेखी ही करता है। लेकिन जैसे ही किसी को कोई गाली देता है, किसी के चरित्र का बेवजह ही हनन करता है, किसी का घटिया कार्टून बनाता है, सोशल मीडिया का अलगोरिदम उसे फैलाने में द्रुत गति से जुट जाता है। सोशल मीडिया ने अब तक पर्दे के पीछे रही नंगई को भी उजागर कर दिया है। आज रील्स के चक्कर में अधनंगे और कई बार करीब-करीब नग्न फोटोग्राफ और वीडियो तक जारी किए जा रहे हैं। भले ही अपने परिवारों में महिलाएँ और युवतियां सलीके से रहती हों, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने और उसके जरिए कुछ कमाने के चक्कर में अपने शील और अपनी लज्जा को भी बेपर्दा कर रही हैं। सोशल मीडिया कितना असमाजिक हो चुका है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसका अलगोरिदम अश्लीलता को बढ़ावा देता है, लेकिन शील और लज्जा की बात को अपने मंच के किसी कोने में डाल देता है। कह सकते हैं कि वर्चुअल स्पेस के किसी अंधेरे कोने में उसे गुम कर देता है।

तीन साल पहले प्यू रिसर्च सेंटर ने 19 विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में सोशल मीडिया को लेकर एक शोध किया था। उसके मुताबिक, आम नागरिकों की नजर में सोशल मीडिया राजनीतिक जीवन के लिए रचनात्मक और विनाशकारी दोनों है। इस अध्ययन में शामिल देशों में, औसतन 57 प्रतिशत लोगों ने माना कि सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए अच्छा है, लेकिन इसे बिनाशकारी मानने वालों की संख्या भी कम नहीं रही। करीब 35 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का का कहना था कि सोशल मीडिया विनाशकारी साबित हो रहा है। सिर्फ 34 प्रतिशत अमेरिकियों ने ही सोशल मीडिया को लोकतंत्र के लिए लाभकारी माना, जबकि 64 फीसद का कहना था कि इसने नकारात्मक प्रभाव ज्यादा डाला है। हाल ही में जेन जी से चर्चा के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी सोशल मीडिया को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उसमें उन्होंने कहा है कि यदि सोशल मीडिया पर उनके कारण दस लाख लोग कोई गलत निर्णय लेते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी मेरी भी है। सोशल मीडिया पर सकारात्मक, उपयोगी और समाजहित की सामग्री साझा करनी चाहिए। सोशल मीडिया पर केवल प्रामाणिक स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर ही विश्वास करना चाहिए। जेन-ज़ी में भी यह विवेक विकसित होना चाहिए कि क्या सही है और क्या नहीं। वरिष्ठ पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है कि वह नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करे तथा उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाए।

सोशल मीडिया का अनसोशल चेहरा और मंच आर्थिक कमाई का जरिया भी है। नंगई, हिंसा और व्यभिचार-अतिचार की कहानियां, दृश्य, वीडियो और फोटो को वायरल करने में उसका कोई सानी नहीं है। इस बहाने इसे प्रसारित करने वाले को सोशल मीडिया मंच आर्थिक कमाई भी कराते हैं। और तो और, वे खुद भी ऐसी घटनाओं, दृश्यों को प्रसारित-प्रचारित और वायरल करने के लिए बड़ी रकम लेते हैं। संसदीय समिति के सामने फेसबुक और इंस्टाग्राम की संचालक कंपनी मेटा के अधिकारियों ने माना है कि काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान गाली, हिंसा आदि को बढ़ावा देने के लिए पैसे भी लिए थे। इन कोशिशों का मकसद भारत में व्यापक पैमाने पर लोगों को उत्तेजित करके अराजकता फैलाना था। इस लिहाज से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म राष्ट्रों के अंदरूनी मामलों में लोकतंत्र की रक्षा के मुखौटे के पीछे से दखल भी दे रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती भी दे रहे हैं। वक्त आ गया है कि इनके नियमन के लिए कठोर कानून बनाए जाएं। जिसके तहत उन्हें अभिव्यक्ति के अधिकार को बढ़ावा देने की व्यवस्था तो हो, लेकिन इसकी आड़ में अराजकता फैलाने की छूट नहीं।

- उमेश चतुर्वेदी

वरिष्ठ पत्रकार

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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