4 साल में पहली बार एक सुर में बोले रूस और यूक्रेन, दोनों को पसंद आया मोदी का प्रस्ताव

भारत की पहल की व्यापकता का सबसे बड़ा संकेत यही है कि यह केवल गोलाबारी रोकने तक सीमित नहीं दिखती। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, बंदरगाहों, काला सागर में व्यापार और कृषि आपूर्ति जैसे उन क्षेत्रों को जोड़ने की कोशिश है, जिनका सीधा संबंध युद्ध से बाहर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से है।
चार साल से ज्यादा समय से जंग लड़ रहे रूस और यूक्रेन के मोर्चे भले आज भी आमने-सामने हों, लेकिन शांति के सवाल पर दोनों तरफ से निकली आवाज पहली बार एक ही दिशा में जाती दिखाई दी है। और यह दिशा दी है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने भारत के प्रस्ताव को युद्ध समाप्त करने के लिए सामने आए चार प्रस्तावों में सबसे व्यापक बताया है। दूसरी तरफ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी खुलकर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी लगातार इस संघर्ष को खत्म करने का सवाल उठाते रहे हैं और उनके पास दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान के लिए “बहुत अच्छे विचार” हैं। देखा जाये तो युद्ध के मैदान में एक-दूसरे पर हमला कर रहे मॉस्को और कीव की तरफ से आई इन टिप्पणियों ने भारत की उस कूटनीतिक पहल को अचानक केंद्र में ला दिया है, जो अब तक बंद कमरों की बातचीत से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाई देने लगी है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार यूक्रेन की ओर से भारत की पहल को सार्वजनिक रूप से इतनी स्पष्ट मान्यता मिली है। सिबिहा के अनुसार भारत ने पहली बार इस प्रक्रिया में भूमिका निभाने की इच्छा का संकेत दिया है। यूक्रेन ऊर्जा क्षेत्र और काला सागर में युद्धविराम पर विचार करने को तैयार है, बशर्ते ऊर्जा तथा बंदरगाह ढांचे पर हमले भी रुकें। साथ ही कीव ने संपर्क रेखा पर बिना शर्त युद्धविराम के विकल्प को भी खुला बताया है।
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उधर, भारत की पहल की व्यापकता का सबसे बड़ा संकेत यही है कि यह केवल गोलाबारी रोकने तक सीमित नहीं दिखती। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, बंदरगाहों, काला सागर में व्यापार और कृषि आपूर्ति जैसे उन क्षेत्रों को जोड़ने की कोशिश है, जिनका सीधा संबंध युद्ध से बाहर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से है। वहीं तुर्किये और मिस्र की पहल मुख्यतः काला सागर तथा अनाज निर्यात से जुड़ी बताई गई है, जबकि अमेरिका की पहल ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने पर केंद्रित है।
यहीं पुतिन का बयान बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा कि मोदी रूस के साथ अच्छे और मित्रतापूर्ण संबंध होने के बावजूद लगातार युद्ध समाप्त करने का प्रश्न उठाते हैं और दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य समाधान खोजने में उनकी गहरी रुचि है। पुतिन ने मोदी के शांतिपूर्ण तरीके से और जल्द से जल्द संघर्ष समाप्त करने के प्रयासों के लिए आभार भी जताया।
देखा जाये तो मोदी की यह भूमिका अचानक पैदा नहीं हुई। वर्ष 2022 में ही उन्होंने कहा था कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” जुलाई 2024 में रूस की यात्रा के दौरान उन्होंने साफ कहा था कि बम, बंदूक और गोलियों के बीच शांति वार्ता सफल नहीं हो सकती और समाधान युद्धभूमि पर नहीं निकलेगा। 31 अगस्त 2026 को बिश्केक में पुतिन से मुलाकात के दौरान भी उन्होंने “अनंत युद्ध” से “युद्ध की समाप्ति” की दिशा में बढ़ने की बात कही थी।
यहीं इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सामरिक संदेश छिपा है। रूस से भारत के गहरे संबंध हैं, जबकि यूक्रेन के साथ भी भारत ने संवाद के रास्ते खुले रखे हैं। ऐसे समय में यदि भारत रूस तक अपनी बात पहुंचा सकता है और यूक्रेन भी उसकी पहल को व्यापक प्रस्ताव मानता है, तो नई दिल्ली के पास संवाद के लिए एक ऐसा कूटनीतिक स्थान बनता है जो कई पश्चिमी शक्तियों के लिए उपलब्ध नहीं है।
दूसरी ओर, इसी कूटनीतिक हलचल के बीच रूस ने अपनी सैन्य शक्ति का भी जबरदस्त प्रदर्शन किया है। दो अक्टूबर को पुतिन ने यूराल क्षेत्र में चल रहे सेंटर-2026 सैन्य अभ्यास के अंतिम चरण का निरीक्षण किया। रूस के अनुसार इस अभ्यास में लगभग 47 हजार सैनिक, 11 प्रशिक्षण क्षेत्र और कैस्पियन सागर शामिल रहे। अंतिम चरण में करीब छह हजार सैनिक उतरे। चीन, बेलारूस, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, मंगोलिया और पाकिस्तान सहित कई देशों की सेनाएं इसमें शामिल रहीं तथा 55 देशों के प्रतिनिधियों ने अभ्यास देखा।
इस अभ्यास में रूस ने करीब 700 सैन्य उपकरणों, 600 से अधिक मानवरहित विमानों और 60 से अधिक रोबोटिक प्रणालियों का इस्तेमाल दिखाया। पुतिन ने नए जेट-चालित जेरान मानवरहित विमानों का भी निरीक्षण किया, जिनका इस्तेमाल रूस यूक्रेन युद्ध में कर चुका है। इसका अर्थ साफ है कि मास्को युद्ध से मिले अनुभव को अगली पीढ़ी की युद्धक क्षमता में बदल रहा है। इसलिए तस्वीर बेहद दिलचस्प है। एक तरफ रूस युद्ध के मैदान में अपनी सैन्य क्षमता, मानवरहित युद्ध प्रणाली और दूर तक मार करने वाली तकनीक का प्रदर्शन कर रहा है; दूसरी तरफ उसी रूस के राष्ट्रपति भारत के प्रधानमंत्री के युद्ध समाप्त करने वाले विचारों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा कर रहे हैं। यही भारत की कूटनीति की असली परीक्षा और संभावित ताकत दोनों है।
लेकिन रास्ता आसान नहीं है। यूक्रेन में रूसी हमले जारी हैं, ऊर्जा ढांचा लगातार निशाने पर है और काला सागर में सुरक्षा तथा अनाज आपूर्ति का संकट बना हुआ है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार रूस और यूक्रेन दोनों एक-दूसरे के ऊर्जा तथा ईंधन ढांचे पर हमले कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत की चुनौती केवल प्रस्ताव देने की नहीं, बल्कि प्रस्ताव को युद्धभूमि से वार्ताकक्ष तक पहुंचाने की है। यदि नई दिल्ली रूस और यूक्रेन दोनों से संवाद कायम रखते हुए ऊर्जा, कृषि, काला सागर और अंततः व्यापक युद्धविराम को एक ही ढांचे में जोड़ पाती है, तो यह केवल एक युद्ध को रोकने की कोशिश नहीं होगी, यह बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका का बड़ा प्रमाण बन सकता है। फिलहाल इतना जरूर स्पष्ट है कि मोदी की शांति पहल को अब केवल भारतीय दावा नहीं कहा जा सकता; यूक्रेन ने उसे व्यापक प्रस्ताव बताया है और पुतिन ने स्वयं उसके पीछे मोदी की लगातार कोशिशों को स्वीकार किया है।
-नीरज कुमार दुबे
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