‘तत्वमसि’ में है प्रचारकों की जिंदगी का बयान

हम जानते हैं कि श्रीधर पराड़कर, संघ प्रेरित अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे हैं और लंबे समय से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हैं। एक लेखक,चिंतक,विचारक और संगठनकर्ता के नाते वे राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध हैं। ऐसे सरोकारी व्यक्ति का लेखन निश्चित ही बहुत सारे सवालों के जवाब लेकर आता है।
देश में हुए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति सामान्यजन की जिज्ञासा बढ़ा दी है। इस बीच अपनी यात्रा के 100 साल संघ ने पूरे कर लिए हैं। इसलिए संघ की संपर्क गतिविधियां भी सामान्य दिनों से ज्यादा हैं। ऐसे समय में संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्रीधर पराड़कर का उपन्यास ‘तत्वमसि’ बड़ी सरलता से आरएसएस के बारे में बताता है। यह उपन्यास एक आत्मकथात्मक उपन्यास भी कहा जा रहा है, जिसके केंद्र में खुद लेखक और उसके अनुभव हैं। बावजूद इसके एक प्रचारक की जिंदगी के बहाने संघ को समझाने में यह उपन्यास पूरी तरह सफल है।
कहानियों से चीजों को बताना आसान होता है, विचार कई बार भ्रमित भी करते हैं और उन्हें समझना सबके बस की बात नहीं। उसे वही ग्रहण कर सकता है जिसकी उस विचार विशेष में रुचि हो। शायद इसीलिए पूज्य सरसंघचालक डा. मोहन भागवत इस बात को रेखांकित करते रहे हैं कि “संघ को संघ के भीतर आकर ही समझा जा सकता है।” अपनी स्थापना के समय से ही संघ कुछ शक्तियों के निशाने पर रहा है। खासकर आजाद भारत में उसे इसके दंश कई बार भोगने पड़े। श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास उनके अर्जित अनुभवों का बयान भी है। इसलिए इस कृति की विश्वसनीयता बढ़ जाती है। सही मायनों में यह भोगा हुआ सत्य है, जिसकी अनुभूति इसे पढ़ते समय सहज ही होती है।
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हम जानते हैं कि श्रीधर पराड़कर, संघ प्रेरित अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे हैं और लंबे समय से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हैं। एक लेखक,चिंतक,विचारक और संगठनकर्ता के नाते वे राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध हैं। ऐसे सरोकारी व्यक्ति का लेखन निश्चित ही बहुत सारे सवालों के जवाब लेकर आता है। किसी भी उपन्यास या कहानी की सबसे बड़ी सफलता है उसकी रोचकता। कहानी को सुनने-पढ़ने का मन होना। कथारस में बहते चले जाना। विचार और संगठन जैसी बोझिल समझी जाने वाली कथा को भी पराड़करजी ने जिस अंदाज में व्यक्त किया है उसने पुस्तक की पठनीयता बनाए रखी है। यह किताब न सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार तत्व, प्रचारकों की जीवन शैली, संघ के समावेशी चरित्र का बयान करती है बल्कि किस तरह वह समाज परिवर्तन को व्यक्ति परिर्वतन के माध्यम से संभव कर रहा है इसे भी बताती है।
उपन्यास के मुख्य पात्र परितोष बाबू संघ के प्रचारक हैं। प्रचारक परंपरा के बारे में समाज में न्यूनतम जानकारियां हैं। इस किताब में ‘प्रचारक परंपरा’ जो सामान्य वस्त्रों में रहकर भी ‘साधु परंपरा’ का पालन करती है का विषद वर्णन है। समाज जीवन में काम करते हुए आने वाली कठिनाइयों से लेकर,समाज के प्रश्नों का उत्तर भी प्रचारक खोजते हैं। भाषा की रवानी और कथा शैली ऐसी कि संगठन शास्त्र जैसे विषयों को किस्सागोई के साथ कहने में लेखक सफल रहे हैं। पत्रकार अनंत विजय ने किताब के फ्लैप पर ठीक ही लिखा है कि-“मेरे जानते हिंदी के किसी लेखक ने किसी संगठन को केंद्र में रखकर इस तरह का उपन्यास नहीं लिखा है। यह अभिनव प्रयोग है, जिसके मोहजाल में पाठक का पड़ना तय है।”
पुस्तक के आरंभ में ही अपनी रेलयात्रा के माध्यम से परितोष बाबू न सिर्फ अपना स्वभाव,विचार रख देते हैं बल्कि समाज को लेकर अपनी सोच को भी प्रकट करते हैं। पहले दृश्य से बांध लेना इसे ही कहते हैं। यह उपन्यास एक कर्मनिष्ठ प्रचारक की जिंदगी से गुजरते हुए समाज के अनेक प्रश्नों के उत्तर भी देता चलता है। इसमें जो पात्र हैं वे बहुत सुनियोजित तरीके से कथा के उद्देश्य को पूरा करने में सहयोग करते हैं। विभिन्न पंथों और विचारों से जुड़े पात्रों का संवाद भी परितोष बाबू से होता है। यहां यह भी प्रकट होता है कि वे व्यक्ति से व्यक्ति का संवाद पसंद करते हैं। मुस्लिम युवा अफरोज से संवाद का अवसर आता है तो वे अपने सहयोगी से कहते हैं,-“ उन्हें बुलाना नहीं हम उनसे मिलने उनके घर जाएंगें।” इससे पता चलता है कि संघ की कार्यपद्धति क्या है। जहां वह व्यक्ति से नहीं बल्कि परिवार से जुड़ता है ताकि उनसे सच्चा जुड़ाव हो सके। उनके सुख-दुख अपने हो जाएं।
यह उपन्यास इस अर्थ में विशिष्ठ है कि यह अपने समय और उसके सवालों से जूझता है। उसके ठोस और वाजिब हल खोजने की कोशिशें भी करता है। संवाद के माध्यम से यह उपन्यास जो कहता है उसे बहुत बड़े वक्तव्यों से नहीं समझाया जा सकता। प्रो. संजय कपूर, विदेशी मूल की युवती नोरा, महेश बाबू, अफरोज,सदानंद, अनिता और स्नेहल जैसे पात्रों के बहाने जो ताना-बाना बुना गया है वह अप्रतिम है। सदानंद,अमित और स्नेहल से हुए संवाद में परितोष बाबू जिस तरह संघ से जुड़े सवालों के उत्तर देते हैं,वैसे ही वे समाज और परिवार के मुद्दों पर राय रखते हैं। वे एक ऐसे बुजुर्ग की तरह पेश आते हैं जिस पर सबकी आस्था है। भारतीय परिवारों में बुजुर्गों की भूमिका क्या होनी चाहिए, क्या है इसे भी परितोष बाबू की छवि में देखा जा सकता है। परितोष बाबू जैसे लोग जिन्होंने अपना परिवार नहीं बनाया, उसकी मनोभूमि कैसे तैयार होती है। कैसे वे सब कुछ त्यागकर अपने समाज और देश की बेहतरी के स्वयं को आत्मार्पित कर देते हैं। यह सीखने वाली बात है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में बहुत से बने हुए भ्रमों, दुष्प्रचारों को यह उपन्यास एक जवाब है। भगवा ध्वज को गुरू मानना और सरसंघचालक परंपरा जैसे विषय भी सहज संवाद से सरल लगने लगते हैं।
समकालीन कथासाहित्य में प्रायः एक ही तरह की कहानियां और उपन्यास पढ़कर जिस तरह के मनोविकार और अवसाद उपजते हैं, उसके बीच में यह उपन्यास एक ठंडी हवा के झोंके की तरह है। यह पाठकों को एक संगठन और उसके प्रचारक की कथा तो सुनाता ही है, नए भारत के निर्माण में जुटे राष्ट्रप्रेमियों से भी परिचित कराता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय समाज के पुनर्गठन की वह प्रयोगशाला है, जो विचार, सेवा और अनुशासन के आधार पर एक सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण कर रही है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की अनोखी भारतीय दृष्टि से उपजा यह संगठन आज अपनी शताब्दी मना रहा है। यह केवल संगठन विस्तार की नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक अनवरत यात्रा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सही निगाहों से देखना और उसका उचित मूल्यांकन किया जाना अभी शेष है, यह उपन्यास उस दिशा में एक सार्थक प्रयास है।
- प्रो. संजय द्विवेदी
(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी), नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं और संप्रति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
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