RGF की तरह चंदा नहीं लेता RSS, संघ को विवाद में घसीटना कांग्रेस का पुराना शौक है

RGF की तरह चंदा नहीं लेता RSS, संघ को विवाद में घसीटना कांग्रेस का पुराना शौक है

जब भी कांग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा भाजपा को घेरने का प्रयास किया जाता रहा है तब-तब संघ के ऊपर भी ऐसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। कालांतर में भी कांग्रेस पार्टी द्वारा संघ और भाजपा को वोटों की राजनीति के चलते एक ही दिखाने का प्रयास किया जाता रहा है।

गलवान घाटी में चीनी सैनिकों और भारतीय सैनिकों के मध्य खूनी संघर्ष से उपजी स्थिति पर आजकल देश में लगातार बहस चल रही है। भारत में नियमित अंतराल पर आम चुनाव होते रहते हैं और चुनावों में ऐसे संघर्ष मुद्दे भी बनते रहे हैं। भारतीय जवानों की यह शहादत भी मीडिया के पटल पर आजकल टीवी चैनलों के लिए टीआरपी बटोरने का काम कर रही है। एक तरफ सत्ताधारी दल के लिए यह चुनौती भरा समय है तो दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियों के लिए एक सुनहरा मौका जिससे सत्ताधारी दल को संकट में डाला जा सके। पूर्वाग्रह से ग्रसित टेलीविजन की आक्रामक बहस राजनेताओं को अपनी-अपनी पार्टियों के प्रमुखों को यह दिखाने के प्रयास में है कि मेरी बहस सबसे अच्छी थी। सतही स्तर तक पहुँचती इन बहसों का परिणाम व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक ही सिमट जाता है। सत्ताधारी दल भाजपा ने अपने को चीनी आक्रमण विवाद में घिरता देख मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के दो प्रमुख नेताओं पर व्यक्तिगत आरोप लगाया है कि उनके द्वारा संचालित राजीव गांधी फाउंडेशन ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष और चीनी दूतावास से सहायता राशि प्राप्त की है, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी राजीव गांधी फाउंडेशन की चेयरपर्सन के साथ ही साथ प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की भी पदेन सदस्य हैं। यह आरोप इसलिए भी गंभीर है कि जब प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से राजीव गांधी फाउंडेशन को आरोपित सहायता दी गई थी उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी राजीव गांधी फाउंडेशन के सदस्य थे। दूसरी तरफ इन आरोपों से तिलमिलाई कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं ने सत्ताधारी दल के नेताओं पर चीनी संबंधों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी विवाद में घेरने का प्रयास किया है। यह कोई नई बात भी नहीं है। जब भी कांग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा भाजपा को घेरने का प्रयास किया जाता रहा है तब-तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऊपर भी ऐसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। कालांतर में भी कांग्रेस पार्टी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा को वोटों की राजनीति के चलते एक ही दिखाने का प्रयास किया जाता रहा है।

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यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूल में जाया जाए तो यह विशुद्ध रूप से एक सांस्कृतिक संगठन है जो समाज का संगठन करने के लिए बनाया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपने बढ़ते प्रभाव के कारण सत्ता का प्रतिरोध भी झेलना पड़ा है। संघ के ऊपर तीन-तीन बार प्रतिबंध भी लगाए गए। पहला प्रतिबंध गांधी जी की हत्या के बाद 1948 में लगाया गया। आपातकाल के दौरान संघ के ऊपर 4 जुलाई 1975 को प्रतिबंध लगाया गया। आपातकाल के दौरान सबसे ज्यादा बंदी संघ के कार्यकर्ता ही थे। तीसरी बार 1992 में जब बाबरी मस्जिद विध्वंस हुआ तब संघ के ऊपर प्रतिबंध लगा। लेकिन प्रत्येक प्रतिबंध के बाद संघ मजबूती से समाज के सामने आता रहा। गांधी जी की हत्या के बाद गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के कहने पर संघ ने अपना संविधान भी बनाया और तब से संघ अपने संविधान के अनुसार ही चलता रहा है, प्रत्येक 3 वर्ष में संघ के आंतरिक चुनाव भी होते हैं।

यह भी कटु सत्य है कि सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, सभी ने संघ के कार्यों की प्रशंसा की है। संघ की प्रशंसा करते हुए 1962 की परेड में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को परेड के लिए आमंत्रित किया था। रूस यात्रा के दौरान इंदिरा गांधी से जब वहां की मीडिया ने प्रश्न किया था कि आपके देश में कोई सामाजिक संगठन है, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम ही इंदिरा गांधी ने लिया था। यानी जब-जब प्रामाणिकता की बात आती है तब-तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चर्चा ही राजनेताओं के द्वारा की जाती रही है।

आज कोरोना काल में जब एक दूसरे को छूने से लोग डर रहे हैं, उस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषांगिक संघटन सेवा भारती ने लाखों सेवा प्रकल्प चलाकर कोरोना पीड़ितों की, असहाय लोगों की, निर्धन लोगों की मदद की है। जिसकी प्रशंसा संघ विरोधी पत्रकारों ने भी अपने चैनलों पर की है। आज संघ समाज में विश्वास जमाने में सफल हुआ है। संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार किए जा रहे सेवा कार्य ने समाज में उसकी विश्वसनीयता को और मजबूत किया है।

संघ की सोच शुरू से यही रही है कि संघ जितना बढ़ता जाएगा, समाज में उतना ही समाहित होता जाएगा। संघ समाज में उसी तरह घुल-मिल जाएगा जैसे दूध में शक्कर। संघ के सरसंघचालक भी लगातार यह कहते रहे हैं कि संघ समाज में कोई संगठन करने के लिए नहीं बल्कि समाज का संगठन करने के लिए शुरू किया गया है। इसलिए संघ हमेशा पीछे रहकर काम करता रहा और समाज को आगे रखता रहा है। इसी सोच के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी अपने नाम से किसी सामाजिक कार्य को आगे नहीं बढ़ाया बल्कि उसके अनुषांगिक संगठनों ने आगे आकर विभिन्न क्षेत्रों में कमान संभाल ली। सेवा क्षेत्र में सेवा भारती, मजदूरों के क्षेत्र में अखिल भारतीय मजदूर संघ, राष्ट्रीय किसान संघ, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, अखिल भारतीय बनवास कल्याण आश्रम, शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए विद्या भारती इत्यादि सैंकड़ों संगठनों ने समाज में एक अलग ही पहचान बनाई है। पूर्वोत्तर राज्यों में एकल विद्यालय के माध्यम से पूर्वोत्तर के नागरिकों में राष्ट्रवाद का बीज बोने का काम भी संघ के कार्यकर्ता लगातार कर रहे हैं।

संघ शुरू से ही सरकारी सहायता प्राप्त करने के विरुद्ध रहा है। पुरानी बात है जब अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ने वनवासी क्षेत्रों में सेवा कार्य के लिए सरकारी सहायता की अपेक्षा की थी, परंतु सरकारी सहायता न मिलने से कार्यकर्ता निराश हो गए। तब यह बात उन्होंने तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरु जी को बताई थी। श्री गुरु जी ने यह सुनते ही ठहाका लगाते हुए जोर से कहा 'चलो अच्छा हुआ, अब जनता जनार्दन के पास जाएंगे'। श्री गुरु जी ने तब जनता से सीधे सहायता देने का आग्रह किया था और रामनवमी के दिन ही 10-12 करोड़ रुपए जमा हो गए थे और वनवासी कल्याण आश्रम ने अपना कार्य प्रारंभ कर दिया था। बताते हैं कि तभी से संघ के किसी भी अनुषांगिक संगठन ने सरकारी सहायता प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया।

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आज संघ के कार्यों को समाज में प्रचारित प्रसारित करने के लिए संघ के पास 3000 के आसपास पूर्णकालिक प्रचारक हैं। देशभर में संघ के कार्यालयों के रख रखाव, सेवा कार्य और प्रचारकों के दैनिक खर्च संघ के स्वयंसेवकों द्वारा वर्ष में एक बार की जाने वाले गुरु दक्षिणा की राशि से ही चलता रहा है।

वर्तमान चीनी संघर्ष के विवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घसीटते हुए कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने एक बार फिर संघ के खातों का ऑडिट न कराने व गुरु दक्षिणा पर भी सवाल उठाया है। संघ विरोधियों द्वारा संघ की गुरु दक्षिणा पर प्रश्नचिन्ह पहली बार नहीं लगाया गया है। पहले भी यह सवाल खड़े किये गये थे और यह भी कहा गया कि यह राशि आयकर के अधीन है। सरकार ने भी संघ के ऊपर दबाव बनाने के लिए गुरु दक्षिणा की राशि पर आयकर देने का नोटिस भिजवाया था। जिसे चुनौती दी गई और मुंबई (1975-1976) और पटना (1980) के आयकर अधिकरण ने सरकारी नोटिस को निरस्त कर दिया था। लेकिन पटना उच्च न्यायालय में इसके विरूद्ध अपील की गई 'आयुक्त आयकर बनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (1994 (42) BLJR 969)' के नाम से दायर इस वाद को पारस्परिकता के सिद्धांत के आधार पर 22 फरवरी 1994 को न्यायमूर्ति के परिपूर्णन और न्यायमूर्ति एनके सिन्हा की पीठ ने खारिज कर दिया था। इस निर्णय को आज तक उच्चतम न्यायालय में चुनौती नहीं दी गई। यह साबित करता है कि सरकार का मंतव्य केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को परेशान करने का था। न्यायालय ने संघ के स्वयंसेवकों की गुरूदक्षिणा राशि को पारस्परिक सहयोग की राशि माना, जिसके माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज के संगठन का कार्य कर रहा है।

चीनी संघर्ष विवाद के वर्तमान परिदृश्य में सत्ताधारी दल और विपक्ष के वाद विवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अनायास घसीटना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता। संघ का अनुषांगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच शुरू से ही स्वदेशी सामानों के प्रयोग हेतु जनमानस तैयार करता रहा है और एक बार फिर चीनी सामानों के बहिष्कार के लिए अलग जगा रखी है। ऐसे में इस समय संघ के राष्ट्रवाद पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करके कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर खुद को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

-आशीष राय

(लेखक उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)