आखिर क्यों पूरा नहीं कर पाते शिक्षा मंत्री अपना कार्यकाल

Dharmendra Pradhan
ANI

मोदी सरकार के कार्यकाल के चारों शिक्षा मंत्रियों में से एक भी अपना विज़न लागू करने के लिए स्वतंत्र नहीं था। रणनीतियां ऊपर से बनती थीं। ये ज़रूर है कि हर मंत्री का उसे लागू करने का तरीक़ा अलग हो सकता है जैसे, स्मृति ईरानी ज़्यादा मुख़र थीं, जावड़ेकर रणनीतिक चुप्पी वाले व्यक्ति थे।

कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने भारत की शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और सरकार की प्राथमिकताओं पर एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ़ इस्तीफा देने वाले शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान पर नहीं, बल्कि मोदी सरकार के दौरान शिक्षा मंत्रालय की पूरी दिशा को लेकर भी उठ रहे हैं। साल 2014 से केंद्र में सत्ता में आने के बाद से अब तक मोदी सरकार में शिक्षा मंत्री रही स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल 'निशंक' और धर्मेंद्र प्रधान को अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किए बिना इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा।  

पांचवा शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी को बनाया गया है, हालांकि जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। मोदी सरकार को तय करना है कि जोशी ही पूर्णकालिक शिक्षा मंत्री रहेंगे या किसी नए चेहरे की तलाश करके उसको स्वतंत्र रूप से शिक्षा मंत्री के पद की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। जोशी भी विवादों में रहे हैं। साल 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो गैंग रेप और उनके परिवार के सदस्यों की हत्या के मामले में उम्र क़ैद की सज़ा काट रहे 11 दोषियों की समय से पहले रिहाई पर जब चौतरफ़ा सवाल उठ रहे थे, तब प्रल्हाद जोशी ने इसका बचाव किया था।

सवाल यही है कि आखिरकार कोई भी शिक्षा मंत्री अपना कार्यकाल क्यों नहीं पूरा कर पाया। मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में शिक्षा मंत्रालय ही ऐसा प्रमुख मंत्रालय रहा, जिसकी कमान पांच अलग-अलग मंत्रियों ने संभाली वहीं, गृह, विदेश, वित्त, रक्षा और स्वास्थ्य जैसे मंत्रालयों में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही। शिक्षा, संस्कृति और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (आईएनबी) ऐसे कुछ चुनिंदा मंत्रालय हैं, जिन्हें सॉफ्ट पावर की तरह देखा जाता है और जो संघ की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए अहम रहे हैं।

यही कारण है कि यहां विवाद ज़्यादा हुए और अस्थिरता भी उतनी ही दिखती है। गौरतलब है कि आईएनबी में 12 साल के भीतर सात केंद्रीय मंत्री और संस्कृति मंत्रालय में पांच केंद्रीय मंत्री बने हैं। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में स्मृति ईरानी और प्रकाश जावड़ेकर ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय संभाला मोदी के दूसरे कार्यकाल में यह ज़िम्मेदारी रमेश पोखरियाल 'निशंक' को मिली। मगर 2021 में हुए कैबिनेट विस्तार के दौरान धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री बना दिया गया, जिनके इस्तीफ़े की मांग को लेकर एक महीने तक कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक जंतर-मंतर पर बैठे रहे और आख़िरकार केंद्र सरकार दबाव में आई और प्रधान को इस्तीफा देने को मजबूर होना पड़ा।

नीट परीक्षा के लीक होने का मामला अलग कर दें, तो संघ से जुड़े उन सभी प्रमुख लक्ष्यों को धर्मेंद्र प्रधान बिना शोर-शराबा किए लागू करा पाने में सफल रहे हैं, जिनकी कोशिश उनके पूर्ववर्तियों ने ज़ोर लगाते हुए की और विवादों में फंसते गए। ग़ौरतलब है कि 2014 में बनी पहली मोदी कैबिनेट में धर्मेंद्र प्रधान को पेट्रोलियम मंत्री बनाया गया, फिर मोदी के दूसरे कार्यकाल में वे शिक्षा मंत्री बने और मोदी के तीसरे कार्यकाल में भी यह ज़िम्मेदारी जारी रही। प्रधान के शिक्षा मंत्री रहते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को बढ़ावा मिला। मातृभाषा और कई भाषाओं में शिक्षा को उन्होंने बढ़ावा दिया। मगर तीन-भाषा फ़ॉर्मूला पर तमिलनाडु राज्य सरकार के साथ लंबे समय तक वे विवाद के केंद्र में भी रहे। विरोधियों ने उन पर राजनीतिक हस्तक्षेप और हिंदी थोपने का आरोप लगाया, जिससे शिक्षा नीति केंद्र बनाम राज्य के विवाद का मुद्दा बन गई।

मोदी सरकार के कार्यकाल के चारों शिक्षा मंत्रियों में से एक भी अपना विज़न लागू करने के लिए स्वतंत्र नहीं था। रणनीतियां ऊपर से बनती थीं। ये ज़रूर है कि हर मंत्री का उसे लागू करने का तरीक़ा अलग हो सकता है जैसे, स्मृति ईरानी ज़्यादा मुख़र थीं, जावड़ेकर रणनीतिक चुप्पी वाले व्यक्ति थे। मोदी के शासन में शिक्षा विभाग में जो भी नीतियां अपनाई गईं, वे सभी वाम विचारधारा को हटाने के मक़सद से लागू हुईं। संघ का मक़सद भारत की शिक्षा व्यवस्था से वाम विचारधारा वाली शिक्षा-पद्धति को हटाना है, क्योंकि संघ मानता है कि वे मुग़लों के समर्थक रहे हैं। संघ की नज़र में, मुग़ल घुसपैठिए हैं और देश की मुस्लिम आबादी उनकी वंशज है। संघ पर आरोप लगते रहें कि इस एजेंडे को पूरा मोदी सरकार के जरिए कराया जा रहा है।

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इसी लक्ष्य को साधने के लिए मोदी सरकार के चार शिक्षा मंत्रियों के चयन का पैमाना रहा है। "स्मृति ईरानी को छोड़ दें, तो नवनियुक्त शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल 'निशंक' और धर्मेंद्र प्रधान संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं। वाजपेयी के ज़माने में भी संघ से आने वाले मुरली मनोहर जोशी को शिक्षा मंत्री बनाया गया था, जो दर्शाता है कि संघ इस मंत्रालय में अपना दख़ल हमेशा चाहता रहा है। स्मृति ईरानी के साथ उनके नाम पर डिग्री विवाद, जेएनयू विवाद और रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे विवाद जुड़ चुके थे।

स्मृति ईरानी संघ की पृष्ठभूमि से नहीं थीं। नई शिक्षा नीति तैयार करने और उसे लागू करने में देरी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्मृति से बहुत खुश नहीं था। संघ के संदेशों को समझना आसान नहीं है। संघ शोर-शराबा नहीं करता। यही कारण है कि फिलाहल संघ की पृष्ठभमि वाले प्रकाश जोशी को प्राथमिकता देते हुए शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है। मंत्रालय में स्मृति ईरानी के कार्यकाल के दौरान नई शिक्षा नीति पर काम की शुरुआत हुई। मोदी के कार्यकाल के तीसरे शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' के समय इसे लागू किया गया।

शिक्षा मंत्री रहे "निशंक की पहचान संघ से आने वाले एक विद्वान की रही है, जो संघ के मक़सद को आगे ले जा सकते थे। हालांकि, अपने अवैज्ञानिक बयानों को लेकर भी वे विवादों में आए। उन्होंने यहां तक कहा कि चरक ऋषि ने अणु-परमाणु की खोज की थी। कोविड के समय जेईई-नीट की परीक्षा कराए जाने की घोषणा के बाद निशंक के ख़िलाफ़ काफ़ी ऑनलाइन विरोध हुआ था। विरोध में लोग कोर्ट भी गए, जहां सरकार के पक्ष में फ़ैसला आया। हालांकि, तब बड़ी संख्या में छात्र परीक्षा देने से रह गए, जिसे लेकर विवाद हुआ। उनके समय भी आरोप लगे कि नई शिक्षा नीति के ज़रिए केंद्र सरकार शिक्षा पर नियंत्रण अपने हाथों में लेने की कोशिश कर रही है, जिसे उन्होंने नकार दिया था।

शिक्षा मंत्रालय के जरिए मोदी सरकार का सारा जोर संघ को साधने में रहा है, किन्तु शिक्षा के उत्थान के लिए बजट को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसी कारण शिक्षा मंत्रालय में बजट घटता गया और विवाद बढ़ते गए। केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी पिछले 12 वर्षों में तेज़ी से घटी हैै यह हिस्सा 2013-14 में कांग्रेस-नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में 4.6% था, जो 2025-26 में घटकर 2.5% रह गया। शिक्षा का घटता बजट ही दर्शाता है कि मोदी सरकार शिक्षा में सुधार को लेकर गंभीर नहीं है। चारों शिक्षा मंत्रियों के समय में लगभग हर विश्वविद्यालय में बड़े स्तर पर फ़ैकल्टी के चयन में संघ की विचारधारा को प्राथमिकता दी गई है।

शिक्षा में सुधार के लिए आवश्यक रोजगारपरक, रचनात्मक, सकारात्मक और शोधपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित मुद्दे खास स्थान नहीं ले सके। पेपर लीक के केंद्र ही नहीं राज्यों की सरकारों ने कठोर कानून बनाए हैं, सजा और जुर्माने को बढ़ाया है, किन्तु देश में जब तक मौजूद सिस्टम ठीक नहीं होगा, तब तक चाहे कितने ही मंत्री बदल दिए जाएं, पेपर लीक की घटनाएं रुकने की कोई गारंटी नहीं है।

- योगेन्द्र योगी

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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