पुतिन ने आखिर ऐसा क्या कह दिया है जिससे रूसी लोग सामान समेटकर देश छोड़ रहे हैं?

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हम आपको बता दें कि रूस की सरकार ने ऐलान किया है कि सेना में उन लोगों की भर्ती भी की जायेगी जोकि सेना में पहले रह चुके हैं या जिन्हें सैन्य मामलों का अनुभव है। लेकिन ऐलान से विपरीत आम नागरिकों से भी सेना में शामिल होने को कहा जा रहा है।

यूक्रेन के खिलाफ युद्ध छेड़ कर बुरी तरह फँस चुके रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने देश के लोगों को नये संकट की ओर धकेल दिया है। दरअसल यूक्रेनी सेना ने जब कुछ क्षेत्रों में बढ़त हासिल की और युद्ध का रुख यूक्रेन के पक्ष में मुड़ता नजर आने लगा तो पुतिन ने ऐलान कर दिया कि रूस की सेना में तीन लाख और लोगों की भर्ती की जायेगी ताकि यूक्रेन पर करारी चोट की जा सके। पुतिन ने तीन लाख लोगों की भर्ती का ऐलान किया तो उन्हें लगा कि सेना में भर्ती होने वालों की लाइन लग जायेगी लेकिन रूसी लोग तो इस युद्ध के खिलाफ पहले दिन से ही हैं और जब उन्हें यह दिख रहा है कि पुतिन का सनकीपना रूस की छवि खराब कर रहा है और रूसियों के लिए दुनिया के दरवाजे बंद कर रहा है तो वह इस युद्ध का हिस्सा बनने को कतई तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि सेना में भर्ती का अभियान खुद ही संघर्ष करता नजर आ रहा है।

हम आपको बता दें कि रूस की सरकार ने ऐलान किया है कि सेना में उन लोगों की भर्ती की जायेगी जोकि सेना में पहले रह चुके हैं या जिन्हें सैन्य मामलों का अनुभव है। लेकिन ऐलान से विपरीत आम नागरिकों से भी सेना में शामिल होने को कहा जा रहा है जिससे पूरे देश में दहशत का माहौल देखा जा रहा है। रिपोर्टें हैं कि पुतिन के ऐलान के बाद आम लोगों को समन भेजकर सेना में भर्ती होने के लिए निर्देश दिया जा रहा है।

इस बीच, बीबीसी समेत तमाम मीडिया रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि पुतिन के इस फैसले के बाद लोग देश छोड़कर भाग रहे हैं, रूस की सीमा पर कई जगह लंबी-लंबी कतारें लग गयी हैं। जिसे देखो वह अपना सामान समेट कर रूस छोड़ देना चाहता है। कोई साइकिल से भाग रहा है तो कोई कार लेकर निकलना चाहता है तो कोई पैदल ही नई मंजिल की ओर निकल पड़ा है। रूस में मची यह भगदड़ देखकर पड़ोसी देश अपनी सीमा पर निगरानी बढ़ा रहे हैं और रूसियों के प्रवेश को प्रतिबंधित कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि लगभग दो लाख रूसी नागरिक फिनलैंड, जॉर्जिया और कजाख्स्तान भाग चुके हैं। वहीं रूस की सरकार का कहना है कि नागरिकों के देश छोड़ने संबंधी खबरों को अंतरराष्ट्रीय मीडिया बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।

इसके अलावा, रूस के लोगों के बारे में कहा जा रहा है कि वह उन तरीकों को ढूँढ़ रहे हैं जिनसे सेना में भर्ती होने से बचा जा सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि लोग जानते हैं कि सेना में जाने का मतलब सीधे युद्ध मैदान में जाना है। लोगों के बीच मची इस भगदड़ को देखते हुए ही रूस के रक्षा मंत्रालय को बयान जारी करके कहना पड़ा है कि आईटी, बैंकिंग और सरकारी मीडिया में काम करने वालों पर राष्ट्रपति का ऐलान लागू नहीं होगा। लेकिन इन सेक्टरों के लोगों का दावा है कि उन्हें भी सेना में शामिल होने के लिए कहा जा रहा है। रूस के आईटी, बैंकिंग और सरकारी मीडिया के लोगों का कहना है कि वह अपने काम में ध्यान नहीं लगा पा रहे हैं और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता उन्हें सता रही है। 

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यही नहीं, एक ओर जहां राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन के कुछ क्षेत्रों को रूस में मिलाने का ऐलान कर दिया है तो वहीं रूस में यूक्रेन युद्ध के खिलाफ माहौल तेजी से फैलता जा रहा है। युद्ध विरोधी रैलियां हो रही हैं जिनमें लोग बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। हालांकि इन रैलियों में शामिल होने वालों पर पुलिस कार्रवाई भी कर रही है। इस तरह की भी खबरें हैं कि इन रैलियों में शामिल होने वाले बहुत से लोगों ने पुलिस कार्रवाई के डर से शहर या घर बदल लिया है ताकि वह निगरानी में आने से बच सकें। इस तरह की भी खबरें हैं कि युद्ध विरोधी रैलियों में या सैन्य भर्ती के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में जो लोग शामिल होते हैं उन्हें तुरंत भर्ती होने के आदेश दिए जा रहे हैं। हालांकि इन दावों-प्रतिदावों के बीच इस बात के प्रमाण भी बढ़ते जा रहे हैं कि रूस में जिस तरह से सैन्य भर्ती हो रही है वह न केवल बेतरतीब है बल्कि ऐसा लगता है कि यह कुछ लोगों को निशाना बनाकर की जा रही है। 

इस बीच, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बात को लेकर विमर्श हो रहा है कि जब सशस्त्र संघर्ष के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को एक देश से दूसरे देश में भागते देखा जाता है तो रूसियों के भागने में क्या बुराई है। उल्लेखनीय है कि वियतनाम युद्ध से बचने के लिए हजारों अमेरिकी कनाडा भाग गए थे, इस साल फरवरी में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था तो यूक्रेन के लाखों लोगों को देश से बाहर भागते देखा गया था। अब रूसी भी भाग रहे हैं क्योंकि वह युद्ध का हिस्सा नहीं बनना चाहते। यदि रूसी लोग सेना में भर्ती नहीं होना चाहते तो यह उनका अधिकार है लेकिन उनका यह अधिकार छीना जा रहा है जिस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गौर करना चाहिए। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रुख हैरान कर देने वाला है। खासतौर पर पश्चिमी देश भाग रहे रूसियों के प्रति उदार रुख नहीं दिखा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कानूनों के अनुसार देश छोड़कर भागने वाले लोगों को सुरक्षा दी जानी चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

बहरहाल, हम आपको बता दें कि रूस में सभी के लिए सैन्य प्रशिक्षण लेना अनिवार्य है। वहां 18 से 27 साल के युवाओं को एक साल की अनिवार्य सैन्य सेवा करनी होती है। रूसी सेना के अलावा वहां 20 लाख रिजर्व सैनिक भी हैं जिन्हें मिलिट्री ट्रेनिंग दी गयी है। लेकिन पुतिन ने रिजर्व सैनिकों की बजाय नये लोगों को सेना में शामिल करने का जो अभियान छेड़ा है उसने उनकी लोकप्रियता का ग्राफ बिल्कुल गिराकर रख दिया है। पुतिन ने जिस तरह से इस युद्ध का संचालन किया उस पर पहले दिन से सवाल उठते रहे हैं। रूसी सैन्य अधिकारी भी मानते हैं कि उनके पास बड़े फैसले लेने का अधिकार नहीं है और सबकुछ ऊपर से ही तय होने के चक्कर में युद्ध उलझता जा रहा है।

-नीरज कुमार दुबे

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