ब्रिक्स@20: सपने बड़े, चुनौतियां उससे बड़ी, ब्रिक्स की ‘ब्रिक’ कितनी मजबूत?

भारत ने 2026 की अध्यक्षता के लिए ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता के लिए निर्माण’ की थीम चुनकर इसी चुनौती का व्यावहारिक उत्तर देने की कोशिश की है। ‘मानवता प्रथम’ की भावना से जुड़ा यह दृष्टिकोण ब्रिक्स को भू-राजनीतिक नारों से निकालकर विकास के ठोस एजेंडे से जोड़ता है।
कभी चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए गढ़ा गया ‘ब्रिक’ आज 11 देशों की बड़ी इमारत बन चुका है। हालांकि किसी भी इमारत की मजबूती उसके आकार से नहीं, नींव से तय होती है। यही सवाल अब ब्रिक्स के सामने है कि क्या यह समूह केवल पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प की तलाश करता राजनीतिक मंच बनेगा या वैश्विक दक्षिण की आर्थिक और विकास संबंधी आकांक्षाओं को ठोस शक्ति में बदल सकेगा? नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को भारत मंडपम में हो रहा 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस सवाल के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारत की अध्यक्षता में हो रहा यह सम्मेलन ब्रिक्स की स्थापना के 20 वर्ष पूरे होने का भी साक्षी है। इसलिए यह केवल वार्षिक बैठक नहीं बल्कि दो दशक की यात्रा के मूल्यांकन और अगले चरण की दिशा तय करने का अवसर है।
ब्रिक्स की शुरुआत मूलतः एक आर्थिक अवधारणा के रूप में हुई थी। 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन की आर्थिक संभावनाओं को रेखांकित करते हुए ‘BRIC’ शब्द गढ़ा। तब यह निवेश विश्लेषण की शब्दावली थी लेकिन जल्द ही इन देशों ने महसूस किया कि उनकी समानता केवल तेज आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय शासन व्यवस्था में असंतुलन भी उनकी साझा चिंता है। 2006 में चारों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला शिखर सम्मेलन इस अवधारणा को औपचारिक अंतर-सरकारी मंच में बदलने की निर्णायक कड़ियां बने। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने इस प्रक्रिया को और बल दिया। पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था की कमजोरियों ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं को यह सवाल उठाने का अवसर दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते योगदान के अनुरूप वैश्विक संस्थाओं में उनकी हिस्सेदारी क्यों न बढ़े।
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दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद 2011 में ‘BRIC’ का ‘BRICS’ बनना इसके विस्तार का पहला बड़ा पड़ाव था। इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तथा 2025 में इंडोनेशिया के पूर्ण सदस्य बनने से समूह 11 देशों तक पहुंच गया। साझेदार देशों की बढ़ती संख्या ने इसका दायरा और व्यापक कर दिया है। अब ब्रिक्स एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और दक्षिण अमेरिका की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाता है। यह विस्तार केवल संख्या नहीं है, इसके साथ बाजार, ऊर्जा, संसाधन, जनसंख्या और रणनीतिक प्रभाव भी बढ़ा है लेकिन यही विस्तार ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती भी है। अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक संरचनाओं और विदेश नीति की प्राथमिकताओं वाले 11 देशों के बीच साझा एजेंडा बनाना पहले की तुलना में कहीं कठिन है। भारत-चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, रूस की भू-राजनीतिक स्थिति और पश्चिम एशिया के तनाव इसके सामने जटिल समीकरण पैदा करते हैं यानी ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती है।
भारत ने 2026 की अध्यक्षता के लिए ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता के लिए निर्माण’ की थीम चुनकर इसी चुनौती का व्यावहारिक उत्तर देने की कोशिश की है। ‘मानवता प्रथम’ की भावना से जुड़ा यह दृष्टिकोण ब्रिक्स को भू-राजनीतिक नारों से निकालकर विकास के ठोस एजेंडे से जोड़ता है। भारत की अध्यक्षता में 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। राजनीतिक एवं सुरक्षा, आर्थिक एवं वित्तीय तथा सांस्कृतिक एवं जन-से-जन संपर्क इसके तीन प्रमुख स्तंभ रहे हैं। अब असली परीक्षा यह है कि इन बैठकों के निष्कर्ष कितने ठोस परिणामों में बदलते हैं। ब्रिक्स की आर्थिक प्रासंगिकता का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान है। डॉलर की भूमिका कम करने की चर्चा लंबे समय से होती रही है लेकिन साझा ब्रिक्स मुद्रा निकट भविष्य में व्यावहारिक लक्ष्य नहीं दिखती। सदस्य देशों की मौद्रिक नीतियां, आर्थिक संरचनाएं और वित्तीय बाजार काफी अलग हैं। इसलिए अधिक यथार्थवादी रास्ता यह है कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़े, भुगतान प्रणालियां आपस में जुड़ें और सीमा-पार लेन-देन की लागत घटे।
यहीं भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का अनुभव महत्वपूर्ण हो जाता है। यूपीआई, डिजिटल पहचान और खुले डिजिटल ढ़ांचे ने भारत में कम लागत पर बड़े पैमाने पर वित्तीय समावेशन को संभव बनाया है। यदि ऐसे मॉडलों को ब्रिक्स देशों के बीच सुरक्षित और अंतर-संचालनीय तरीके से जोड़ा जा सके तो यह केवल तकनीकी सहयोग नहीं होगा बल्कि विकासशील देशों के लिए व्यापार और वित्त का नया आधार तैयार कर सकता है। न्यू डेवलपमेंट बैंक इस दिशा में ब्रिक्स की सबसे ठोस संस्थागत उपलब्धियों में है। 2014 में स्थापित इस बैंक ने यह दिखाया कि ब्रिक्स केवल वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग करने वाला समूह नहीं, विकासशील देशों की जरूरतों के लिए वैकल्पिक वित्तीय क्षमता बनाने वाला मंच भी हो सकता है। आगे स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण, बुनियादी ढ़ांचे और सतत विकास में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है।
ब्रिक्स का एजेंडा अब वित्त तक सीमित नहीं है। खाद्य, ऊर्जा और स्वास्थ्य सुरक्षा भी इसकी प्राथमिकताओं में हैं। महामारी ने चिकित्सा आपूर्ति श्रृंखलाओं की कमजोरियां उजागर की जबकि युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों ने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के जोखिम बढ़ाए हैं। महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा, उर्वरक, दवाओं और कृषि तकनीक की विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाने में सहयोग ब्रिक्स को वास्तविक आर्थिक ताकत दे सकता है। प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इसका अगला निर्णायक क्षेत्र है। डिजिटल कृषि, भू-स्थानिक तकनीक और एआई का इस्तेमाल छोटे किसानों की उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में किया जा सकता है। इसी तरह स्टार्टअप, एमएसएमई और डिजिटल कौशल के क्षेत्र में सहयोग उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच नई आर्थिक कड़ियां बना सकता है। लेकिन ब्रिक्स की असली पहचान आर्थिक परियोजनाओं से भी आगे तय होगी। सवाल यह है कि क्या यह पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनेगा? ब्रिक्स की ताकत किसी दूसरे शक्ति-गुट का प्रतिरूप बनने में नहीं, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधिक बनाने में है। वैश्विक दक्षिण की आवाज को प्रभावी बनाने का अर्थ पश्चिम से टकराव नहीं, वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में अधिक संतुलित भागीदारी सुनिश्चित करना है।
यहीं भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत एक ओर अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ अपने रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है तो दूसरी ओर रूस, चीन और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ ब्रिक्स में सक्रिय है। यह विरोधाभास नहीं, भारत की बहु-संरेखीय कूटनीति की वास्तविकता है। ब्रिक्स भारत को चीन के साथ मतभेदों के बावजूद संवाद का मंच देता है और साथ ही वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ अपनी नेतृत्वकारी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी। इसलिए नई दिल्ली शिखर सम्मेलन की सफलता घोषणापत्र की लंबाई से नहीं, उसके क्रियान्वयन से मापी जानी चाहिए। क्या सीमा-पार भुगतान सस्ता और आसान होगा? क्या व्यापारिक बाधाएं घटेंगी? क्या एमएसएमई को नए बाजार और वित्त मिलेगा? क्या डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना साझा होगी? क्या ऊर्जा, खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भरोसेमंद तंत्र बनेंगे? और क्या ब्रिक्स वैश्विक वित्तीय एवं राजनीतिक संस्थाओं में सुधार के लिए साझा और प्रभावी आवाज बन सकेगा?
दो दशक पहले ‘ब्रिक’ एक आर्थिक अनुमान था। आज ‘ब्रिक्स’ बदलती विश्व व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण वास्तविकता है। मगर आर्थिक भार अपने आप सामूहिक शक्ति में नहीं बदलता, उसके लिए संस्थागत क्षमता, आपसी विश्वास, व्यावहारिक सहयोग और साझा हितों की पहचान जरूरी है। इसलिए ब्रिक्स की ‘ब्रिक’ कितनी मजबूत है, इसका उत्तर उसके 11 सदस्यों की संख्या में नहीं, उनके बीच बनने वाली परस्पर निर्भरता में छिपा है। यदि यह समूह व्यापार को आसान बनाता है, विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराता है, तकनीकी समाधान साझा करता है और वैश्विक दक्षिण को निर्णय-निर्माण में अधिक प्रभावी आवाज देता है तो इसकी नींव मजबूत मानी जाएगी। भारत के सामने इस अवसर को आकार देने की बड़ी जिम्मेदारी है। उसे ब्रिक्स को किसी देश या शक्ति के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय विकास, सहयोग और बहुधु्रवीयता का व्यावहारिक मंच बनाना होगा। तब ब्रिक्स केवल 11 देशों की इमारत नहीं रहेगा बल्कि ऐसी विश्व व्यवस्था की आधारशिला बन सकता है, जिसमें वैश्विक दक्षिण दर्शक नहीं, बल्कि निर्णय का सक्रिय भागीदार हो।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
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