नए दशक में भारतीय क्रिकेट का भविष्य क्या है ?

  •  दीपक कुमार मिश्रा
  •  जनवरी 22, 2021   11:16
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नए दशक में भारतीय क्रिकेट का भविष्य क्या है ?

रिषभ पंत पर हमेशा से ही उनके गैरजिम्मेदाराना तरीकों से खेलने को लेकर सवाल उठते रहते थे। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भी उन्हें पहले टेस्ट में मौका नहीं दिया गया। लेकिन उसके बाद उन्हें साहा के नाकाम होने पर दूसरे टेस्ट में मौका दिया गया।

ऑस्ट्रेलिया में टीम इंडिया ने टेस्ट सीरीज 2-1 से जीतकर इतिहास रच दिया है। यह एक ऐसा कारनामा है जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। शायद भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे यादगार जीत का नाम लिया जाएगा तो इस सीरीज जीत का नाम सबसे उपर होगा। यह सीरीज जीत इसलिए खास है क्योंकि इसे मुख्य खिलाड़ियों के बिना जीता गया। इस सीरीज जीत में विराट कोहली या फिर मोहम्मद शमी जैसे सीनियर खिलाड़ियों का योगदान नहीं था। यहां टीम इंडिया को जीत युवा खिलाड़ियों ने दिलाई। इस सीरीज जीत में भारत को कई युवा सितारें मिले जो आगे चलकर भारतीय क्रिकेट का नाम रोशन करने वाले है। इन नामों में शुभमन गिल, रिषभ पंत, मोहम्मद सिराज, टी.नटराजन और वाशिंगटन सुंदर जैसे खिलाड़ियों का नाम शामिल है।

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ऐसे में अब सवाल यह है कि आखिर टीम इंडिया के लिए भविष्य में वह कौन से खिलाड़ी है जो बड़े सितारों के जाने के बाद टीम की बागडौर संभालेंगे। इसके साथ ही सवाल यह भी है कि क्या घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद यह खिलाड़ी इंटरनेशनल लेवल पर भी अपने नाम का सिक्का जमा पाएंगे।

शुभमन गिल बनेंगे नए दशक के सुपरस्टार !

शुभमन गिल को ऑस्ट्रेलिया दौरे में टेस्ट सीरीज में डेब्यू करने का मौका मिला। इस खिलाड़ी ने मौके को दोनों हाथों से पकड़ा और शानदार प्रदर्शन कर टीम में अपनी जगह पक्की कर ली। गिल ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज के 3 मैचों की 6 पारियों में 51.8 औसत से 259 रन बनाए जहां उन्होंने 2 अर्धशतक लगाएं और उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 91 रन का रहा है। अपने अंडर-19 टीम के कप्तान पृथ्वी शॉ की जगह ओपनिंग करने का मौका पाने वाले शुभमन गिल किसी भी पारी में बल्लेबाजी करते हुए असहज नहीं दिखाई दिए। पैट कमिंस, मिचेल स्टार्क और जॉश हेजलवुड जैसे गेंदबाजों के सामने गिल ने शानदार शॉट्स खेले। उनके गाबा टेस्ट में खेले गए 91 रन किसी बड़े शतक से भी ज्यादा तारीफों के हकदार है। गिल का यह प्रदर्शन भारतीय क्रिकेट को उम्मीद देता है कि आने वाले समय में विराट, रोहित और रहाणे जैसे खिलाड़ियों के रिटायर होने के बाद यही खिलाड़ी भारत का नाम रोशन करेंगे।

किसी भी हालत से जीत दिलाने का दम रखते हैं रिषभ पंत !

रिषभ पंत पर हमेशा से ही उनके गैरजिम्मेदाराना तरीकों से खेलने को लेकर सवाल उठते रहते थे। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भी उन्हें पहले टेस्ट में मौका नहीं दिया गया। लेकिन उसके बाद उन्हें साहा के नाकाम होने पर दूसरे टेस्ट में मौका दिया गया। जिसके बाद पंत ने मानो मिले मौके को अच्छे से भुनाया। पंत ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में पंत ने शानदार प्रदर्शन किया। पंत ने सीरीज के 3 मैचों की 5 पारियों में 68.50 की औसत से 274 रन बनाए। जहां पंत ने 2 अर्धशतक लगाएं और उनका बेस्ट स्कोर 97 रन रहा। पंत ने अपने प्रदर्शन से बता दिया कि वो किसी भी हालत में मैच जिताने का दम रखते है। गाबा में खेले गए चौथी पारी में नाबाद 89 रन उनके जीवन की सबसे अहम पारियों में शुमार होंगे। ऐसे में पंत को लेकर भारतीय क्रिकेट की उम्मीदें बढ़ गई है। माना जा रहा है रिषभ पंत आने वाले समय में भारत के लिए बड़े खिलाड़ी बनेंगे और टीम इंडिया को नई उचाइयों पर ले जाएंगे।

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युवा गेंदबाजों की फौज भारत के लिए सबसे बड़ी खुशी 

ऑस्ट्रेलिया दौरे पर टीम इंडिया के मुख्य गेंदबाज एक एक कर चोटिल हो रहे थे। भारत के लिए पहले इशांत शर्मा, मोहम्मद शमी, उमेश यादव और आखिरी टेस्ट आते आते जसप्रीत बुमराह भी चोटिल होकर मैच से बाहर हो गए। ऐसे में तेज गेंदबाजी की कमान संभाली युवा गेंदबाज मोहम्मद सिराज, नवदीप सैनी, टी नटराजन, शार्दुल ठाकुर जैसे गेंदबाजों ने जिन्होंने गाबा के मैदान में कमाल कर दिया। तेज गेंदबाज मोहम्मद सिराज तो भारत के लिए टेस्ट सीरीज के 3 मैचों में 13 विकेट लेकर सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बनें। यह मोहम्मद सिराज की डेब्यू सीरीज थी। भारतीय क्रिकेट के युवा तेज गेंदबाजों का यह प्रदर्शन बताता है कि एक समय रफ्तार वाले गेंदबाजों की कमी झेलने वाली टीम इंडिया अब बदल चुकी है। इस टीम के पास ऐसे तेज गेंदबाजों का कोर ग्रुप है जो विदेशों में जाकर भारत के लिए जीत की इबारत लिखेगा। टीम इंडिया के तेज गेंदबाज अब टेस्ट क्रिकेट में 20 विकेट लेने का दम रखते है। भारतीय क्रिकेट के पास लगभग 10 तेज गेंदबाजों का ऐसा ग्रुप है जो समय पड़ने पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने से पीछे नहीं हटेगा।

नए दशक में कैसा रहेगा भारतीय क्रिकेट का भविष्य ?

टीम इंडिया ने जिस तरह से ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज जीती उसमें युवा खिलाड़ियों का बड़ा योगदान था। भारतीय टीम के इस तरह के प्रदर्शन के पीछे बीसीसीआई का बड़ा काम रहा जिन्होंने पिछले कुछ सालों में इंडिया ए के कई दौरे विदेशों में करवाए जिससे युवा खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा मैच खेलने का मौका मिला। इसके अलावा सबसे ज्यादा तारीफ यहां पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ की करना चाहेंगे जिन्होंने युवा भारतीय क्रिकेटरों को निखारा। कंगारू सरजमीं पर टेस्ट सीरीज जीत के बाद राहुल द्रविड़ की जमकर तारीफ की गई। पूर्व पाकिस्तानी तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने राहुल द्रविड़ की तारीफ करते हुए कहा कि " राहुल द्रविड़ ने पहले अंडर-19 टीम को मजबूत बनाया। इसके बाद नेशनल क्रिकेट अकादमी को ढ़ंग के खड़ा किया। अब हिंदुस्तान के यंगस्टर जीते है। भारत इसके लिए पिछले 10 सालों से इन्वेस्टमेंट कर रहा है। तगड़े और ईमानदार लोग लाएं जिन्हें सैलरी से ज्यादा मतलब नहीं था।" 

जाहिर है शुभमन गिल, पृथ्वी शॉ, ऋषभ पंत, वॉशिंगटन सुंदर- ये सभी उस अंडर-19 टीम से निकले हैं, जिसे कभी द्रविड़ ने कोच किया था। 2016 से लेकर 2019 तक अंडर-19 और इंडिया ए टीम के कोच थे द्रविड़। आज जिस बेंच स्ट्रेंथ की बात हो रही है, जिन खिलाड़ियों के नाम लिए जा रहे हैं कि वे भविष्य के स्टार हैं, वे सभी इस दौर में निकले। अब भी वह नैशनल क्रिकेट अकैडमी के हेड के तौर पर खिलाड़ियों को गाइड कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में ऐसे ही औऱ युवा खिलाड़ियों के निकलने की उम्मीद है जो भारतीय क्रिकेट के भविष्य को संवारेंगे।

- दीपक कुमार मिश्रा







अंतरराष्ट्रीय महिला दिवसः महामारी में भी लड़ती रही नारी

  •  प्रज्ञा पाण्डेय
  •  मार्च 8, 2021   11:54
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवसः महामारी में भी लड़ती रही नारी

पिछले साल भारत में शुरू हुई कोरोना महामारी के भय ने लोगों को घरों में बंद कर दिया। सामान्य गतिविधियों में कमी आने के कारण लोगों में अवसाद बढ़ गया। लेकिन कोरोना पहली महामारी नहीं है जिसने दुनिया में तबाही मचायी है बल्कि इससे पहले भी विश्व ने कई घातक बीमारियों का सामना किया है।

कोरोना महामारी के शुरूआती दिनों में हुए लॉकडाउन में स्त्रियों ने मुश्किलें तो उठायीं लेकिन हार नहीं मानीं। अपने परिवार को बीमारी की भयावहता, भूख की विवशता तथा अवसाद की तीव्र वेदना से निकालने के लिए जूझती रही नारी, अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर नारियों की गौरव गाथा इस विकट परिस्थिति की चर्चा बिना अधूरी है। 

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पिछले साल भारत में शुरू हुई कोरोना महामारी के भय ने लोगों को घरों में बंद कर दिया। सामान्य गतिविधियों में कमी आने के कारण लोगों में अवसाद बढ़ गया। लेकिन कोरोना पहली महामारी नहीं है जिसने दुनिया में तबाही मचायी है बल्कि इससे पहले भी विश्व ने कई घातक बीमारियों का सामना किया है। इस तरह की खतरनाक बीमारियों में स्पेनिश फ्लू प्रमुख है। 1918 में आयी इस बीमारी से दुनिया भर में 5-10 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। लेकिन 1919 में यह बीमारी खत्म हो गयी। इसके अलावा मिश्र में फैले जस्टिनियन प्लेग को इतिहास की दूसरी सबसे घातक महामारी के रूप में माना जाता है।  यह बीमारी अगली दो सदी तक बार-बार आती रही इससे पांच करोड़ लोगों की मौत हुई थी। 

कोरोना महामारी ने भारतीय स्त्रियों के लिए पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों पर निर्भरता को बढ़ा दिया है। महामारी का संक्रमण तो स्त्री तथा पुरुष पर समान आक्रमण कर रहा है लेकिन हमारा समाज स्त्रियों के प्रति होने वाले भेदभाद भाव के प्रति तटस्थ नहीं रहा है। कोरोना महामारी के बहाने स्त्रियों के लिए सदियों से खीचीं गए घरेलू दायरों की लक्ष्मण रेखा पर चर्चा हुई है। साथ ही स्त्रियों हेतु काम के अधिकार, उनकी लैंगिक समानता तथा आजीविका हेतु संघर्ष के विषय भी आज प्रासंगिक हैं।

कोरोना महामारी के दौरान सार्वजनिक स्थानों तथा घर के बीच में खीचीं गयी लक्ष्मण रेखा का पुरुषों ने पहली बार अनुभव किया। ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक रूप से ऐसा पहली बार हुआ जब स्त्रियों के साथ पुरुष भी घर की चारदीवारी में बंद थे। इस दौरान न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में स्त्रियों के खिलाफ असहनीय उत्पीड़न की कहानी लिखी गयी। महिलाओं को इस लक्ष्मण रेखा की आदत थी लेकिन इस बार वह घर के अंदर सुरक्षित नहीं थी। इस बार उत्पीड़न की शिकार स्त्रियां घर से बाहर नहीं जा सकती थीं। स्वास्थ्य तथा पेट भरने की कठिनाइयों ने नयी परिस्थितियों को जन्म दिया। इस बार घर में हिंसा तो थी आजीविका हेतु घर के बाहर किए जाने वाले छोटे-मोटे काम भी हाथ से जा रहे थे।

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सामान्य परिस्थितियों में स्त्रियों को आजीविका हेतु इच्छा न होते हुए भी जबरजस्ती घर से बाहर भेजा जाता था। लॉकडाउन में महिलाओं ने घर में अधिक समय व्यतीत किया। इन परिस्थितियों में वह अनावश्यक घरेलू कामों में लगी रहीं। इसके अलावा कई महिलाओं ने स्वेच्छा से खुद को काम में व्यस्त कर लिया। इसके लिए उन्होंने घर की साफ-सफाई से लेकर साल भर के लिए आचार पापड़ बनाना उचित समझा।  

घर में विभिन्न परम्पराओं को छोड़ दिया जाय तो स्त्रियां सामान्यतया पितृसत्ता के विभिन्न रूपों पूंजीवाद, सामन्तवाद और गुलामी के तहत जीवन व्यतीत करती हैं। वेतन हेतु कार्य करने वाली महिलाएं चाहे वह कामकाजी हो या घरेलू अपनी गृहिणी की भूमिका को कभी त्याग नहीं पाती हैं। घरेलू क्षेत्र में विवाह तथा बच्चों को पालने के माध्यम से स्त्रियां शक्ति, प्रभुत्व, हिंसा, अवैतनिक श्रम तथा पितृसत्ता के पुनरूत्पादन का शिकार होती रही हैं। ऐसे में लॉकडाउन के दौरान घर में रहें, सुरक्षित रहें की टैग लाइन स्त्रियों के लिए तो सुखदायी नहीं ही रही। लॉकडाउन के दौरान न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में स्त्रियों के खिलाफ घरेलू हिंसा में वृद्धि देखी गयी। भारत में असंगठित क्षेत्र में महिलाओं द्वारा अपनी नौकरियों को खोना भी उऩ्हें हिंसा की ओर ले गया। 

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लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के लिए वर्क फ्राम होम में भी समस्याएं कम नहीं थी। भारत में अंसगठित क्षेत्र में महिलाओं हेतु कोई वर्क फ्राम होम का तो प्रावधान नहीं था तथा संगठित क्षेत्रों में जिन्हें ऐसी सुविधा मिली वह काम के बोझ से कराह उठीं। पतियों और बच्चों का लगातार घर में रहना अनावश्यक काम के बोझ बढ़ाता चला गया। जो बच्चे पहले डे-केयर सेंटर या कामवालियों के हाथों पलते थे उनकी जिम्मेदारी भी मां की हो गयी। यही नहीं बच्चों की ऑनलाइन कक्षाओं ने उन्हें घंटों लैपटॉप के सामने बैठने को मजबूर कर दिया। महामारी के दौरान सामाजिक दूरी ने न केवल बच्चों को उनके दादा-दादी, नाना-नानी तथा पड़ोसियों से दूर किया बल्कि दोस्तों के साथ खेलने में भी परेशानी खड़ी की। ऐसी परिस्थितियों में मां के ऊपर काम का बोझ बढ़ता चला गया।

महामारी का भय, परिवार को संक्रमण से बचाने, उसका भरण-पोषण करने, अपने काम का उत्तरदायित्व तथा परिवार की जिम्मेदारियां निभाने, बच्चों की शिक्षा, उनके स्वास्थ्य की देखभाल  करने में नारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जो आगे भी जारी रहेगी।

- प्रज्ञा पाण्डेय







कोरोना की मार दुनिया के अधिकतर देशों के शिक्षा बजट पर पड़ी है

  •  डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
  •  मार्च 6, 2021   15:17
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कोरोना की मार दुनिया के अधिकतर देशों के शिक्षा बजट पर पड़ी है

वैक्सीन आने के बाद यह समझा जा रहा था कि अब कोरोना पर काबू पा लिया जाएगा पर कोरोना की लगभग एक साल की यात्रा के बाद स्थिति में वापस बदलाव आने लगा है और जिस तरह से कोरोना पॉजिटिव केसों में कमी आने लगी थी उस पर विराम लगने के साथ ही नए केस आने लगे हैं।

कोरोना की मार का असर अब शिक्षा व्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। वर्ल्ड बैंक की हालिया रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि दुनिया के अधिकांश देशों की सरकारों ने शिक्षा के बजट में कटौती की है। खासतौर से शिक्षा बजट में कमी निम्न व निम्न मध्यम आय वाले देशों ने की है तो उच्च व मध्यम उच्च आय वाले देशों में से कई देश भी शिक्षा बजट में कटौती करने में पीछे नहीं रहे हैं। रिपोर्ट में 65 प्रतिशत देशों द्वारा महामारी के बाद शिक्षा के बजट में कमी की बात की गई है। संभव है इसमें अतिश्योक्ति हो पर यह साफ है कि कोरोना महामारी का असर शिक्षा के क्षेत्र में साफ रूप से दिखाई दे रहा है। देखा जाए तो कोरोना के कारण सभी क्षेत्र प्रभावित हुए हैं। जहां एक ओर आज भी सब कुछ थमा-थमा-सा लग रहा हैं वहीं कोरोना की दूसरी लहर और अधिक चिंता का कारण बनती जा रही है।

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कोरोना वैक्सीन आने के बाद यह समझा जा रहा था कि अब कोरोना पर काबू पा लिया जाएगा पर कोरोना की लगभग एक साल की यात्रा के बाद स्थिति में वापस बदलाव आने लगा है और जिस तरह से कोरोना पॉजिटिव केसों में कमी आने लगी थी उस पर विराम लगने के साथ ही नए केस आने लगे हैं। हालांकि समग्र प्रयासों से दुनिया के देशों में उद्योग धंधे पटरी पर आने लगे हैं, अर्थव्यवस्था में सुधार भी दिखाई देने लगा है पर अभी भी कुछ गतिविधियां ऐसी हैं जो कोरोना के कारण अधिक ही प्रभावित हो रही हैं। इसमें शिक्षा व्यवस्था प्रमुख है। भारत सहित कई देशों में स्कुल खुलने लगे हैं तो उनमें बड़ी कक्षा के बच्चों ने आना भी शुरू किया है पर अभी तक पूरी तरह से शिक्षा व्यवस्था के पटरी पर आने का काम दूर की कौड़ी दिख रही है।

लगभग एक साल से शिक्षा व्यवस्था ठप्प-सी हो गई है। प्राइमरी से उच्च शिक्षा व्यवस्था तक को पटरी पर लाना सरकारों के सामने बड़ी चुनौती है। क्योंकि कोरोना के दौर में ऑनलाइन शिक्षा के भले ही कितने ही दावे किए गए हों पर उन्हें किसी भी स्थिति में कारगर नहीं माना जा सकता। इसका एक बड़ा कारण दुनिया के अधिकांश देशों में सभी नागरिकों के पास ऑनलाइन शिक्षा की सुविधा नहीं है। इंटरनेट सुविधा और फिर इसके लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता लगभग नहीं के बराबर है। इसके साथ ही स्कूल कॉलेज खोलना किसी चुनौती से कम नहीं है। कोरोना प्रोटोकाल की पालना अपने आप में चुनौती है, ऐसे में आवश्यकता तो शिक्षा बजट को बढ़ाने की है पर उसके स्थान पर शिक्षा बजट में कटौती शिक्षा के क्षेत्र में देश दुनिया को पीछे ले जाना ही है। आवश्यकता तो यह थी कि कोरोना प्रोटोकाल की पालना सुनिश्चित कराने पर जोर देते हुए शिक्षण संस्थाओं को खोलने की बात की जाती। इसके लिए कक्षाओं में एक सीमा से अधिक विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था ना होने, थर्मल स्कैनिंग की व्यवस्था, सैनेटाइजरों की उपलब्धता और अन्य सावधानियां सुनिश्चित करने की व्यवस्था अतिरिक्त बजट देकर की जानी चाहिए थी।

इसी तरह से अन्य आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया जाना चाहिए था क्योंकि ऑनलाइन क्लासों के कारण बच्चों में सुनाई देने में परेशानी जैसे साइड इफेक्ट सामने आने लगे हैं। ऑनलाइन पढ़ाई की गुणवत्ता और उसके परिणाम भी अधिक उत्साहवर्द्धक नहीं हैं। अपितु बच्चों में मोबाइल व लैपटॉप के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। कोरोना के कारण येन-केन प्रकारेण बच्चों को प्रमोट करने के विकल्प से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। इसके लिए औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था करनी ही होगी। दुनिया के देशों की सरकारों को इस दिशा में गंभीर विचार करना ही होगा। गैरसरकारी संस्थाओं को भी इसके लिए आगे आना होगा क्योंकि यह भावी पीढ़ी के भविष्य का सवाल है तो दूसरी और स्वास्थ्य मानकों की पालना भी जरूरी हो जाता है।

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केवल और केवल फीस लेने या नहीं लेने से इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला है। इसमें कोई दो राय नहीं कि निम्न व निम्न मध्यम आय वाले देशों या यों कहें कि अविकसित, अल्प विकसित, विकासशील देश ही नहीं अपितु विकसित देशों के सामने भी कोरोना नई चुनौती लेकर आया है। सभी देशों में बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई है। परिजनों की अभी भी बच्चों को स्कूल भेजने की हिम्मत नहीं हो रही है। आधारभूत सुविधाएं व संसाधन होने के बावजूद विकसित देशों में भी शिक्षा को पटरी पर नहीं लाया जा सका है। कोरोना प्रोटोकाल के अनुसार मास्क, सैनेटाइजर, थर्मल स्केनिंग और दूरी वाली ऐसी स्थितियां हैं जिसके लिए अतिरिक्त बजट प्रावधान की आवश्यकता है। यह सभी आधारभूत व्यवस्थाएं व संसाधन उपलब्ध कराना मुश्किल भरा काम है तो दूसरी और शिक्षण संस्थाओं द्वारा यह अपने संसाधनों से जुटाना आसान नहीं है। अभिभावकों से इसी राशि को वसूलना भी कोरोना महामारी से टूटे हुए लोगों पर अतिरिक्त दबाव बनाने के समान ही होगा। आम आदमी वैसे ही मुश्किलों के दौर से गुजर रहे हैं। नौकरियों के अवसर कम हुए हैं तो वेतन कटौती का दंश भुगत चुके हैं। अनेक लोग बेरोजगार हो गए हैं। ऐसे में शिक्षा को बचाना बड़ा दायित्व हो जाता है। इसके लिए दुनिया के देशों की सरकारों को कहीं ना कहीं से व्यवस्थाएं करनी ही होंगी। संयुक्त राष्ट्र संघ को भी इसके लिए आगे आना होगा। शिक्षा को बचाना हमारा सबका दायित्व हो जाता है।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा







मध्यप्रदेश की सेवा मुख्यमंत्री नहीं, अभिभावक के रूप में कर रहे हैं शिवराज

  •  मनोज कुमार
  •  मार्च 5, 2021   12:15
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मध्यप्रदेश की सेवा मुख्यमंत्री नहीं, अभिभावक के रूप में कर रहे हैं शिवराज

मध्यप्रदेश की सत्ता में मुख्यमंत्री रहने का एक रिकार्ड तेरह वर्षों का है तो दूसरा रिकार्ड चौथी बार मुख्यमंत्री बन जाने का है। साल 2018 के चुनाव में मामूली अंतर से शिवराजसिंह सरकार की पराजय हुई तो लोगों को लगा कि शिवराजसिंह का राजनीतिक वनवास का वक्त आ गया है।

नए मध्यप्रदेश की स्थापना के लगभग 7 दशक होने को आ रहे हैं। इस सात दशकों में अलग-अलग तेवर और तासीर के मुख्यमंत्रियों ने राज्य की सत्ता संभाली है। लोकोपयोगी और समाज के कल्याण के लिए अलग-अलग समय पर योजनाओं का श्रीगणेश होता रहा है और मध्यप्रदेश की तस्वीर बदलने में कामयाबी भी मिली है। लेकिन जब इन मुख्यमंत्रियों की चर्चा करते हैं तो सालों-साल आम आदमी के दिल में अपनी जगह बना लेने वाले किसी राजनेता की आज और भविष्य में चर्चा होगी तो एक ही नाम होगा शिवराजसिंह चौहान। 2005 में उनकी मुख्यमंत्री के रूप में जब ताजपोशी हुई तो वे उम्मीदों से भरे राजनेता के रूप में नहीं थे और ना ही उनके साथ संवेदनशील, राजनीति के चाणक्य या स्वच्छ छवि वाला कोई विशेषण नहीं था। ना केवल विपक्ष में बल्कि स्वयं की पार्टी में उन्हें एक कामचलाऊ मुख्यमंत्री समझा गया था। शिवराज सिंह की खासियत है वे अपने विरोधों का पहले तो कोई जवाब नहीं देते हैं और देते हैं तो विनम्रता से भरा हुआ। वे बोलते खूब हैं लेकिन राजनीति के मंच पर नहीं बल्कि अपने लोगों के बीच में। आम आदमी के बीच में। ऐसा क्यों नहीं हुआ कि जिनके नाम के साथ कोई संबोधन नहीं था, आज वही राजनेता बहनों का भाई और बेटियों का मामा बन गया है। यह विशेषण इतना स्थायी है कि वे कुछ अंतराल के लिए सत्ता में नहीं भी थे, तो उन्हें मामा और भाई ही पुकारा गया। कायदे से देखा जाए तो वे मुख्यमंत्री नहीं, एक अभिभावक की भूमिका में रहते हैं।

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मध्यप्रदेश की सत्ता में मुख्यमंत्री रहने का एक रिकार्ड तेरह वर्षों का है तो दूसरा रिकार्ड चौथी बार मुख्यमंत्री बन जाने का है। साल 2018 के चुनाव में मामूली अंतर से शिवराजसिंह सरकार की पराजय हुई तो लोगों को लगा कि शिवराजसिंह का राजनीतिक वनवास का वक्त आ गया है। लेकिन जब वे ‘टायगर जिंदा है’ का हुंकार भरी तो विरोधी क्या, अपने भी सहम गए। राजनीति ने करवट ली और एक बार फिर भाजपा सत्तासीन हुई। राजनेता और राजनीतिक विश्लेषक यहां गलतफहमी के शिकार हो गए. सबको लगा कि अब की बार नया चेहरा आएगा। लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को पता था कि प्रदेश की जो स्थितियां है, उसे शिवराजसिंह के अलावा कोई नहीं संभाल पाएगा। देश की नब्ज पर हाथ रखने वाले मोदी-शाह का फैसला वाजिब हुआ। कोरोना ने पूरी दुनिया के साथ मध्यप्रदेश को जकड़ रखा था। पहले से कोई पुख्ता इंतजाम नहीं था। संकट में समाधान ढूंढने का ही दूसरा नाम शिवराजसिंह चौहान है। अपनी आदत के मुताबिक ताबड़तोड़ लोगों के बीच जाते रहे। उन्हें हौसला देते रहे। इलाज और दवाओं का पूरा इंतजाम किया। भयावह कोरोना धीरे-धीरे काबू में आने लगा। इस बीच खुद कोरोना के शिकार हो गए लेकिन काम बंद नहीं किया।

एक वाकया याद आता है। कोरोना का कहर धीमा पड़ा और लोग वापस काम की खोज में जाने लगे। इसी जाने वालों में एक दम्पत्ति भी औरों की तरह शामिल था लेकिन उनसे अलग। इस दम्पत्ति ने इंदौर में रूक कर पहले इंदौर की मिट्टी को प्रणाम किया और पति-पत्नी दोनों ने मिट्टी को माथे से लगाया। इंदौर का, सरकार और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का शुक्रिया अदा कर आगे की यात्रा में बढ़ गए। यह वाकया एक मिसाल है।

कोरोना संकट में मध्यप्रदेश से गए हजारों हजार मजदूर जो बेकार और बेबस हो गए थे, उनके लिए वो सारी व्यवस्थाएं कर दी जिनके लिए दूसरे राज्यों के लोग विलाप कर रहे थे। श्रमिकों की घर वापसी से लेकर खान-पान की व्यवस्था सरकार ने निरपेक्ष होकर की। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की पहल पर अनेक स्वयंसेवी संस्था भी आगे बढक़र प्रवासी मजदूरों के लिए कपड़े और जूते-चप्पलों का इंतजाम कर उन्हें राहत पहुंचायी। आज जब कोरोना के दूसरे दौर का संकेत मिल चुका है तब शिवराज सिंह आगे बढक़र इस बात का ऐलान कर दिया है कि श्रमिकों को मध्यप्रदेश में ही रोजगार दिया जाएगा। संभवत: मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान देश के पहले अकेले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने ऐसा फैसला लिया है। उनकी सतत निगरानी का परिणाम है कि लम्बे समय से कोरोना से मृत्यु की खबर शून्य पर है या एकदम निचले पायदान पर। आम आदमी का सहयोग भी मिल रहा हैं कोरोना के दौर में लोगों को भय से बचाने के लिए वे हौसला बंधाते रहे हैं।

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वे मध्यप्रदेश को अपना मंदिर मानते हैं और जनता को भगवान। शहर से लेकर देहात तक का हर आदमी उन्हें अपने निकट का पाता है। चाय की गुमटी में चुस्की लगाना, किसानों के साथ जमीन पर बैठ कर उनके दुख-सुख में शामिल होना। पब्लिक मीटिंग में आम आदमी के सम्मान में घुटने पर खड़े होकर अभिवादन कर शिवराजसिंह चौहान ने अपनी अलहदा इमेज क्रिएट की है। कभी किसी की पीठ पर हाथ रखकर हौसला बढ़ाना तो कभी किसी को दिलासा देने वाले शिवराजसिंह चौहान की ‘शिवराज मामा’ की छवि ऐसी बन गई है कि विरोधी तो क्या उनके अपनों के पास इस इमेज की कोई तोड़ नहीं है।

सभी उम्र और वर्ग के प्रति उनकी चिंता एक बराबर है। बेटी बचाओ अभियान से लेकर बेटी पूजन की जो रस्म उन्होंने शुरू की है, वह समाज के लोगों का मन बदलने का एक छोटा सा विनम्र प्रयास है। इस दौर में जब बेटियां संकट में हैं और वहशीपन कम नहीं हो रहा है तब ऐसे प्रयास कारगर होते हैं। बेटियों को लेकर उनकी चिंता वैसी ही है, जैसा कि किसानों को लेकर है। लगातार कृषि कर्मण अवार्ड हासिल करने वाला मध्यप्रदेश अपने धरती पुत्रों की वजह से कामयाब हो पाया है तो उन्हें हर कदम पर सहूलियत हो, इस बात का ध्यान भी शिवराजसिंह चौहान ने रखा है। विद्यार्थियो को स्कूल पहुंचाने से लेकर उनकी कॉपी-किताब और फीस की चिंता सरकार कर रही है। विद्यार्थियों को समय पर वजीफा मिल जाए, इसके लिए भी कोशिश जा रही है। मध्यप्रदेश शांति का टापू कहलाता है तो अनेक स्तरों पर सक्रिय माफिया को खत्म करने का ‘शिव ऐलान’ हो चुका है। प्रदेश के नागरिकों को उनका हक दिलाने और शुचिता कायम करने के लिए वे सख्त हैं।

पहली दफा मुख्यमंत्री बन जाने के बाद सबसे पहले वेशभूषा में परिवर्तन होता है लेकिन जैत से निकला पांव-पांव वाले भैया शिवराज आज भी उसी पहनावे में हैं। आम आदमी की बोलचाल और देशज शैली उन्हें लोगों का अपना बनाती है। समभाव और सर्वधर्म की नीति पर चलकर इसे राजनीति का चेहरा नहीं देते हैं। इस समय प्रदेश आर्थिक संकट से गुजर रहा है लेकिन उनके पास इस संकट से निपटने का रोडमेप तैयार है। प्रदेश के हर जिले के खास उत्पादन को मध्यप्रदेश की पहचान बना रहे हैं तो दूर देशों के साथ मिलकर उद्योग-धंधे को आगे बढ़ा रहे हैं। आप मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की आलोचना कर सकते हैं लेकिन तर्क नहीं होगा। कुतर्क के सहारे उन्हें आप कटघरे में खड़े करें लेकिन वे आपको सम्मान देने से नहीं चूकेंगे। छोडि़ए भी इन बातों को। आइए जश्र मनाइए कि वे एक आम आदमी के मुख्यमंत्री हैं। मामा हैं, भाई हैं। ऐसा अब तक दूजा ना हुआ।

-मनोज कुमार

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)







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