नरेन्द्र मोदी के जीवन-सपनों का सच है नया भारत

Narendra Modi
ललित गर्ग । Sep 17 2021 1:13PM

अगर कोई एक शब्द है जो नरेन्द्र मोदी के जीवन का चरित्र चित्रण कर सकता है और जो जीवन भर उनके साथ रहा है, वह है ‘राष्ट्र-सेवा’। राष्ट्र-निर्माण एवं भारत को दुनिया में अव्वल बनाना ही उनके जीवन का ध्येय है।

एक दीया लाखों दीयों को उजाला बांट सकता है यदि दीए से दीया जलाने का साहसिक प्रयत्न कोई शुरु करे। ऐसे ही अंधेरों से संघर्ष एवं सशक्त राष्ट्र-निर्माण की एक सार्थक मुहिम है नरेन्द्र मोदी। जिसकी सुखद प्रतिध्वनियां अक्सर अनुगूंजित होती रहती हैं। नई खोजों, दक्षता, कौशल विकास, बौद्धिक संपदा की रक्षा, रक्षा क्षेत्र में उत्पादन, श्रेष्ठ का निर्माण-ये और ऐसे अनेकों सपनों को आकार देकर सचमुच मोदीजी नये भारत-सशक्त भारत के निर्माण में जुटें हैं।

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नरेंद्र मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को वड़नगर में दामोदरदास मूलचंद मोदी और हीरा बेन के यहां हुआ। वे पांच भाई बहन में से दूसरे नंबर की संतान है। उनको बचपन में नरिया कह कर बुलाया जाता था। उनके पिता की रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान थी। वे बचपन में आम बच्चों से बिल्कुल अलग थे। उन्हें बचपन में एकिं्टग का शौक था। वे गंभीरता, संघर्ष, दिलचस्प और मजबूत संकल्पों के बल पर दुनिया की एक महान हस्ति बने हैं।

ऑस्कर वाइल्ड ने कहा था कि मेरी बहुत साधारण रुचि है कि मैं श्रेष्ठ से संतुष्ट हो जाता हूं। नरेन्द्र मोदी भी भारत को श्रेष्ठता के सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ करने के लिए प्रयासरत है। हम श्रेष्ठ दिखें, हम श्रेष्ठ करें, हम श्रेष्ठ बोलें और श्रेष्ठ सुनें। श्रेष्ठता ही हमारा ध्येय हो। नरेन्द्र मोदी के रूप में एक रोशनी अवतरित होते हुए हमने देखी है। उनके नेतृत्व में हम स्वयं का विकास कर रहे हैं और देश को भी प्रगति की ओर अग्रसर कर रहे हैं। प्रकाश की एक किरण कभी पूरा सूरज नहीं बनती। जिसे एक किरण मिल जाती है वह संपूर्ण सूरज बनने की दिशा में प्रस्थान कर देता है। जीवन की प्रयोगशाला में भले हम बड़े कामों के लिए ऊंचे मनसूबे न बनायें और न ही आकांक्षी सपने देखें पर मोदी रूपी दीए की तरह यह नन्हा-सा संकल्प लेकर अवश्य आगे बढ़ें कि मैं रात भर जागता रहूंगा पहरूआ बनकर। इसलिए तूफानों से संघर्ष करके भी स्वाभिमानी मोदी अकेले सब कुछ सहते हुए उजाले बांट रहे हंै। मोदी उन लोगों के लिए चुनौती है जो अकर्मण्य, आलसी, निठल्ले, हताश, सत्वहीन बनकर सिर्फ सफलता की ऊंचाइयों के सपने देखते हैं पर अपनी दुर्बलताओं को मिटाकर नयी जीवनशैली की शुरुआत का संकल्प नहीं स्वीकारते।

चाय और गरीबी उनके जीवन के आरंभिक वर्षों का यथार्थ है। उनका परिवार समाज के उस कमजोर तबके से था, जिसे दो वक्त का भोजन जुटाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था। पूरा परिवार एक बेहद छोटे से घर में रहता था। एक बालक के रूप में नरेन्द्र मोदी ने अपनी पढ़ाई, पाठ्योत्तर जीवन और पिता के चाय स्टाल में उनके योगदान के बीच संतुलन स्थापित किया। लेकिन, उनके विचार और स्वप्न विद्यालय की कक्षा में शुरू होकर किसी दफ्तर के माहौल में खत्म हो जाने वाले पारम्परिक जीवन में नहीं बंधे, बल्कि कहीं आगे निकल गए। वे लीक से हटकर चलना चाहते थे और समाज में एक परिवर्तन देखना चाहते थे। समाज और व्यवस्था के हाशिये पर पड़े लोगों के दुःख-दर्द को खत्म करना चाहते थे। युवावस्था में ही उनका झुकाव त्याग और तप की ओर बढ़ रहा था। उन्होंने नमक, मिर्च, तेल और गुड़ खाना छोड़ दिया था। स्वामी विवेकानंद के कार्यों का गहन अध्ययन उन्हें अध्यात्म की यात्रा की ओर ले गया और उन्होंने भारत को जगतगुरु बनाने के स्वामी विवेकानंद के सपनों को पूरा करने के लिए अपने मिशन की नींव रखी। उनकी विकास यात्रा नरेन्द्र- स्वामी विवेकानन्द से नरेन्द्र यानी नरेन्द्र मोदी तक की प्रेरक यात्रा है।

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अगर कोई एक शब्द है जो नरेन्द्र मोदी के जीवन का चरित्र चित्रण कर सकता है और जो जीवन भर उनके साथ रहा है, वह है ‘राष्ट्र-सेवा’। राष्ट्र-निर्माण एवं भारत को दुनिया में अव्वल बनाना ही उनके जीवन का ध्येय है। जब ताप्ती नदी ने बाढ़ का कहर ढाया था, नौ वर्ष के नरेन्द्र और उनके मित्रों ने खाने के स्टाल लगाये और राहत कार्यों हेतु धन जुटाने का कार्य किया था। जब पाकिस्तान के साथ युद्ध अपने चरम पर था, उन्होंने रेलवे स्टेशन पर सीमा की ओर जाने और वहां से लौटने वाले जवानों के लिए चाय वितरित करने का कार्य किया। यह एक छोटा कदम था लेकिन उन्होंने बेहद कम उम्र में भारत माता के आह्वान पर अपने सामथ्र्य का दृढ़ संकल्पित होकर प्रदर्शन किया। तभी तो मोदी की विचारधारा हमारी राष्ट्रीय एकता, संगठन, सौहार्द, भाईचारा, समन्वय, मैत्री एवं राष्ट्रीयता की बुनियाद बनने की क्षमता रखती है। मोदी का संदेश है कि-हम जीवन से कभी पलायन न करें, जीवन को परिवर्तन दें, क्योंकि पलायन में मनुष्य के दामन पर बुज़्ादिली का धब्बा लगता है जबकि परिवर्तन में विकास की संभावनाएं सही दिशा और दर्शन खोज लेती है।

मोदी-दर्शन कहता है-जो आदमी अभय से जुड़ता है वह अकेले में जीने का साहस करता है। जो अहिंसा को जीता है वह विश्व के साथ मैत्री स्थापित करता है। जो अनेकांत की भाषा में सोचता है वह वैचारिक विरोधों को विराम देता है। मोदी इस बात की परवाह नहीं करते कि लोग क्या कहेंगे, क्योंकि वे अपने कर्म में निष्ठा से प्रयत्नशील है। पुरुषार्थ का परिणाम फिर चाहे कैसा भी क्यों न आए, वे कभी नहीं सोचते। नरेन्द्र मोदी को अपनी कार्यजा शक्ति पर कभी संदेह नहीं रहा। उनका आत्मविश्वास उन्हें नित-नवीन रोशनी देता है। यही पुरुषार्थ और निष्ठा उनको सीख और समझ देती है कि सिर्फ कुर्सी पर बैठने वालों का कर्तृत्व ही कामयाबी पर नहीं पहुंचता, सामान्य कागजों पर उतरने वाले आलेख भी इतिहास की विरासत बनते देखे गये हैं। समय से पहले समय के साथ जीने की तैयारी का दूसरा नाम है मोदी। दुनिया का कोई सिकंदर नहीं होता, वक्त सिकंदर होता है इसलिए जरूरी है कि हम वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना सीखें।

आज का जीवन अच्छाई और बुराई का इतना गाढ़ा मिश्रण है कि उसका नीर-क्षीर करना मुश्किल हो गया है। पर अनुपात तो बदले। अच्छाई विजयी स्तर पर आये, वह दबे नहीं। अच्छाई की ओर बढ़ना है तो पहले बुराई को रोकना होगा। इस छोटे-से दर्शन वाक्य में मोदी की ‘कल्पना का भारत’ का आधार छुपा है। और उसका मजबूत होना आवश्यक है। बहुत सारे लोग जितनी मेहनत से नरक में जीते हैं, उससे आधे में वे स्वर्ग में जी सकते हैं। यही मोदी-जीवन का दर्शन है। इतिहास के दो प्रमुख राजा हुए। दृढ़ मनोबल के अभाव में एक ने पहले ही संघर्ष में घुटने टेक दिये और साला कहलाया। दूसरे ने दृढ़ मनोबल से संकल्पित होकर, घास की रोटी खाकर, जमीन पर सोकर संघर्ष किया और महाराणा प्रताप कहलाया। हमें साला नहीं प्रताप बनना है तभी राष्ट्रीय चरित्र में नैतिकता आयेगी, तभी हम राष्ट्र को वास्तविक प्रगति की ओर अग्रसर कर सकेंगे, जैसा माहौल इनदिनों नरेन्द्र मोदी निर्मित कर रहे है।

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एक बालक के तौर पर उनका एक सपना था, भारतीय सेना में जाकर देश की सेवा करने का। लेकिन ऐसा न होने से बालक नरेन्द्र भले बेहद निराश था, लेकिन भाग्य ने उसके लिए कुछ अलग ही सोच कर रखा था। इन वर्षों में उन्होंने एक अद्वितीय पथ पर यात्रा आरम्भ की, जो उन्हें मानवता की सेवा के लिए बड़े मिशन की खोज के लिए भारत भर में ले गयी। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने एक असाधारण निर्णय लिया, जिसने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने घर छोड़ने और देश भर में भ्रमण करने का निर्णय कर लिया। उन्होंने भारतभर की यात्राएँ की, उसमें हिमालय, पश्चिम बंगाल में रामकृष्ण आश्रम और यहाँ तक कि पूर्वोत्तर भी शामिल है। इन यात्राओं ने इस नौजवान के ऊपर अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने भारत के विशाल भू-भाग में यात्राएँ कीं और देश के विभिन्न भागों की विभिन्न संस्कृतियों एवं माटी के स्पर्श का अनुभव किया। 

नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ कार्य करने का मन बना लिया था। आर.एस.एस. से उनका पहला परिचय बेहद कम आयु में हुआ, जब वह अपनी चाय की दुकान पर दिन भर काम करने के बाद आर.एस.एस. के युवाओं की स्थानीय बैठक में भाग लिया करते थे। इन बैठकों में भाग लेने का प्रयोजन राजनीति से परे था। वे यहाँ अपने जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव डालने वाले लक्ष्मणराव ईनामदार, जिनको ‘वकील साहेब’ के नाम से भी जाना जाता था, से मिले थे। उनकी प्रेरणा रही कि हमें राष्ट्रीय जीवन में नैतिकता को स्थापित करने के लिए समस्या के मूल को पकड़ना होगा। हम पत्तों और फूलों के सींचन पर ज्यादा विश्वास करते हैं, जड़ के अभिसिंचन की ओर कम ध्यान देते हैं इसलिए पत्र और पुष्प मुरझा जाते हैं। नैतिक मूल्य पनप नहीं पातें। नरेन्द्र मोदी समस्याओं के मूल को पकड़ने के लिये जद्दोजहद कर रहे है। वे पत्तों और फूलों को सींचने की बजाय जड़ को सींच रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां समस्यामुक्त जीवन जी सके। उनके पुरुषार्थी हाथों में राष्ट्र के भाग्य को बदलने का गहरा आत्मविश्वास सुरक्षा पाये। एक के लिए सब, सबके लिए एक की मैत्री-चेतना जागे, यही उनके जन्म दिन का सार्थक सन्देश है।

- ललित गर्ग

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