सावजी ढोलकिया से दानवीरता सीखें माल लेकर उड़ने वाले नीरव और चौकसी

By आशीष वशिष्ठ | Publish Date: Oct 29 2018 12:35PM
सावजी ढोलकिया से दानवीरता सीखें माल लेकर उड़ने वाले नीरव और चौकसी
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भारतीय धनकुबेर और उद्योगपति भले ही दुनिया भर के आर्थिक मंच पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवा रहे हों, लेकिन कर्मचारियों व समाज कल्याण के नाम पर खर्च करने के मामले में उनकी छवि ठीक नहीं है।

भारतीय धनकुबेर और उद्योगपति भले ही दुनिया भर के आर्थिक मंच पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवा रहे हों, लेकिन कर्मचारियों व समाज कल्याण के नाम पर खर्च करने के मामले में उनकी छवि ठीक नहीं है। विश्व के सबसे धनी व्यक्ति रहे वारेन बफेट ने एक बार भारतीय धनकुबेरों की कंजूसी पर तंज कसते हुए कहा था कि वे परोपकार और दान से बहुत दूर रहते हैं। दरअसल बफेट और उन्हीं के देश के बिल गेट्स सदृश अन्य धनपतियों द्वारा जिस दरियादिली का परिचय देते हुए अपनी संपत्ति और कमाई का बड़ा हिस्सा परोपकार हेतु दान किया जाता रहा है उसकी तुलना में वाकई भारतीय उद्योगपतियों का योगदान इस दिशा में नगण्य ही रहा है। पश्चिम के उद्योगपतियों जैसी दानशीलता भारतीय औद्योगिक घरानों में कम ही नजर आती है। 
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धर्म-कर्म और आस्था के चलते मंदिर, धर्मशालाएं, विद्यालय और अस्पताल आदि बनवाने के लिए ये वर्ग अपनी तिजोरी से धन निकालता रहा लेकिन सही मायनों में जिसे परोपकार कहा जाता है अर्थात् कर्मचारी कल्याण, सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व के मद में उनका योगदान बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता। जो खर्च किया भी जाता है वो कानून के डर या फिर टैक्स बचाने की जुगत में। 
 


भारत एक ऐसा देश है जहां पर कर्मचारी और मालिक के रिश्ते दिन ब दिन खराब होते जा रहे हैं। इस बात की तस्दीक मॉर्गन स्टेनली की वर्ष 2014 की रिपोर्ट भी करती है। मॉर्गन स्टेनली की रिपोर्ट के अनुसार श्रमिक मालिक संबन्धों में मामलों में भारत सूची में 61वें स्थान पर है। इस मामले में भारत मेक्सिको, थाईलैंड और फिलिपींस जैसे देशों से भी पीछे है। इसी रिपोर्ट में दिया गया है कि भारत में श्रमिक या कहें कर्मचारियों व मालिकों के बीच रिश्ते खराब हैं। जिससे श्रम बाजार खराब होता जा रहा है। श्रम बाजार को कामयाब होने से यही चीज रोक रही है।
 
इस निराशा के माहौल के बीच देश में एक उद्योगपति ऐसा भी है जो दिल खोलकर अपने कर्मचारियों पर पैसा लुटाता है। इस उदार हृदय वाले उद्योगपति का नाम सावजी ढोलकिया है। प्रसिद्ध हीरा व्यापारी सावजी ढोलकिया एक बार फिर सुर्खियों में हैं क्योंकि दीवाली जो करीब है। ढोलकिया सबसे पहले 2011 में सुर्खियों में आए थे जब उनकी उदारता टीवी न्यूज चैनलों के साथ लगभग हर अखबारों की सुर्खियां बनी थी। इस दौरान दीवाली के मौके पर उनके द्वारा दिए गए बेशकीमती गिफ्ट और आकर्षक बोनस की चर्चा हर जगह हुई थी। 2015 में ढोलकिया ने अपनी कंपनी के कर्मचारियों को 491 कारें और 200 फ्लैट गिफ्ट दिए थे जिसकी काफी चर्चा हुई थी और सबने कारोबारी ढोलकिया की कर्मचारियों के प्रति उदारता को मुक्त कंठ से सराहा था। 2016 में भी उन्होंने सैंकड़ों कर्मचारियों को कार और फ्लैट भेंट किए थे। ढोलकिया हरि   कृष्णा एक्सपोर्ट्स के चेयरमैन हैं जो कई देशों में डायमंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट करती है। 
 
इस बार ढोलकिया ने अपनी कम्पनी के लॉयल्टी प्रोग्राम के तहत 1500 कर्मचारी चुने हैं जिसमें 600 लोगों ने गिफ्ट के रूप में कार को चुना है और 900 लोगों को फिक्सड डिपोजिट सर्टिफिकेट दिया जाएगा। यानी इन्हें उपहार या बोनस स्वरूप एक निश्चित धनराशि बतौर फिक्सड डिपोजिट दी जाएगी। ऐसा पहली बार होगी जब कर्मचारी कार की चाभी और बैंक सर्टिफिकेट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों लेंगे। कंपनी के चार कर्मचारियों को (जिसमें एक दिव्यांग महिला कर्मचारी भी शामिल हैं) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कार की चाबी सौंपेंगे। 


 
इसमें कोई दो राय नहीं है कि हीरों के व्यापार में अरबों-खरबों का मुनाफा होता है इसलिए कहने वाले कह सकते हैं कि सावजी की उदारता कोई बड़ी या विशेष बात नहीं है। लेकिन हीरे के अंतर्राष्ट्रीय कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी बैंकों का अरबों-खरबों डकार कर विदेश भाग गये वहीं सावजी अपनी मोटी कमाई का बड़ा हिस्सा अपने कर्मचारियों में बांटकर उनको प्रोत्साहित करते हुए मालिक और कर्मचारी सम्बन्धों के आत्मीय संबंधों का सकारात्मक रूप प्रस्तुत किया है जो अन्य व्यवसायियों और उद्योगपतियों के लिए भी अनुकरणीय है। 
 
सावजी ढोलकिया के जीवन की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। सावजी ने गुजरात के अमरेली जिले के दुधाला गांव से पढ़ाई की और 13 साल की उम्र में स्कूल छोड़ने के बाद अपने चाचा के हीरा व्यापार में हाथ बंटाना शुरू किया। 10 साल तक कड़े संघर्ष के बीच उन्होंने बहुत कुछ सीखा और 1991 में हरी कृष्णा एक्सपोर्ट्स की शुरुआत की। तब तक डायमंड कारोबार के हर गुर सीख चुके थे ढोलकिया लिहाजा उन्होंने अपनी अलग कंपनी बना कर बिजनेस करने की ठानी।


 
ढोलकिया की डायमंड कंपनी जल्द ही बुलंदियों को छूने लगी और 2014 में उनकी कंपनी ने 400 करोड़ का टर्नओवर हासिल किया जो 2013 के मुकाबले 104 फीसदी ज्यादा था। आज की तारीख में इस कंपनी में लगभग 6000 लोग काम करते हैं जो डायमंड ज्वेलरी के एक्सपोर्ट से जुड़े हुए हैं। इनका माल तकरीबन 50 देशों में जाता है जिसमें अमेरिका, बेल्जियम, यूएई, हांगकांग और चीन जैसे देश भी शामिल हैं। सावजी ढोलकिया हमेशा से अपने कर्मचारियों को महंगे गिफ्ट देने को लेकर चर्चा में रहे हैं। हरि कृष्ण डायमंड कंपनी के मालिक सावजी भाई ढोलकिया ने इसी साल अगस्त में 25 साल से कंपनी में काम कर रहे तीन कर्मचारियों को उपहार स्वरूप मर्सिडीज कार भेंट की थी जिनकी कीमत 1-1 करोड़ रुपये बताई गई। ढोलकिया ने अपने कर्मचारियों को गिफ्ट देने की शुरुआत वर्ष 2011 से शुरु की। हालांकि पिछले वर्ष 2017 की दिवाली पर कर्मचारियों को कोई गिफ्ट नहीं दिया गया। शायद इसके पीछे जीएसटी को एक बड़ी वजह माना गया। हालांकि इस वर्ष नए साल के मौके पर उनकी ओर से 1200 कर्मचारियों को कार गिफ्ट में दी थी। सावजी मानते हैं कि कर्मचारियों के लिए कुछ करने से उन्हें जो खुशी मिलती है उसका कोई मूल्य नहीं है। 
 
देश के कई बड़े औद्योगिक घरानों ने बीते कुछ दशक से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कदम रखा किन्तु इक्का-दुक्का छोड़कर उनके अधिकांश गतिविधियां व्यावसायिक उद्देश्य से ही संचालित हैं जिनमें परोपकार का दिखावा होता है। यही नहीं अपने कर्मचारियों का हितचिंतन करने के प्रति भी औद्योगिक घरानों का रवैया प्रशंसनीय नहीं रहा। कारपोरेट मंत्रालय ने कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिल्टी की गाइड लाइन जारी कर, औद्योगिक घरानों को समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाने की याद दिलायी है। 
 
हालांकि बीते कुछ सालों में परिदृश्य थोड़ा बदला जरूर है। विप्रो के अध्यक्ष अजीम हाशिम प्रेमजी ने अपनी कमाई का काफी बड़ा हिस्सा दान कर दिया। उनकी देखा-देखी कुछ और धनकुबेर भी सामने आए। यद्यपि इस जमात में बहुत से ऐसे भी हैं जो दान का ढिंढोरा नहीं पीटते। टाटा घराने का नाम इनमें अग्रणी है। लेकिन जिस तरह की दानशीलता वारेन बफेट, बिल गेट्स और विकसित देशों के अन्य उद्योगपति दिखाते हैं वह हमारे देश में बिरली ही नजर आती है। देश के सबसे बड़ा औद्योगिक घराना रिलांयस भी काफी हद तक कर्मचारी कल्याण के प्रति अधिक उदार नहीं है। अभी तक भारतीय औद्योगिक घराने कर्मचारियों व समाज पर खर्चे करने के मामले में काफी हद तक कंजूसी ही बरतते हैं। किसी जमाने में देश की अग्रणी शराब कंपनी मोहन मीकिन लिमिटेड भी कर्मचारी कल्याण व सामाजिक कार्यों के कार्यों के लिये प्रसिद्ध थी।
 
देश में जिस तरह औद्योगिक घरानों और उद्योगपतियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है उसके सापेक्ष कर्मचारियों के प्रति उदारता की खबरें कम ही सुनाई देती हैं। कुछ औद्योगिक घराने और कुबेर पति प्रशंसा बटोरने के लिए उदारता का प्रदर्शन करते हैं, या उसके पीछे किसी स्वार्थसिद्धि का मकसद निहित होता है। आजकल राजनीतिक नेताओं के अलावा सरकारी अधिकारियों की पत्नी एवं अन्य परिजन स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ), ट्रस्ट बनाकर उनके लिए जो दान बटोरते हैं वह भी अप्रत्यक्ष रूप से चंदा या रिश्वत ही होती है।
 
सावजी ढोलकिया कि भांति यदि देश के दूसरे व्यवसायी और उद्योगपति भी ऐसी ही दरियादिली का प्रदर्शन करने लग जाएं तो देश में कार्यसंस्कृति का विकास अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो सकता है। कर्मचारियों में कार्यकुशलता और उद्यमशीलता बढ़ाने के लिए केवल जुबानी प्रशंसा ही नहीं अपितु आर्थिक लाभ भी मिलना चाहिए। दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल की कार्य संस्कृति और कर्मचारी कल्याण की किस्से आये दिन सुर्खियां बटोरते हैं। फेसबुक की कार्यसंस्कृति भी लोगों की जुबानी है। सावजी जैसे उद्योगपति देश में कार्यसंस्कृति का समुचित विकास करने के प्रेरणास्रोत बन सकते हैं। बशर्ते उद्योग जगत उनका मखौल उड़ाने के बजाय उनका अनुसरण करे। 
 
श्रमिक की गरिमा का जो सिद्धांत विकसित देशों में है वह मुफ्तखोरी की बजाय कार्यकुशलता को प्रोत्साहित करने से ही बनी रह सकती है। जिस देश में अधिकांश कर्मचारी अपने मालिकों के प्रति नाराजगी का भाव रखते हों, जिस देश में औद्योगिक अशांति आम बात हो। वहां सावजी ढोलकिया का अपने कर्मचारियों के प्रति उदार दृष्टिकोण प्रशंसनीय और अनुकरणीय है। वास्तव में मालिक कर्मचारी के बीच मधुर संबंध किसी भी उद्योग और राष्ट्र का भाग्य बदल सकते हैं।
 
-आशीष वशिष्ठ

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