लोकसभा चुनाव के मुद्दों में आखिर युवाओं की उपेक्षा क्यों?

By ललित गर्ग | Publish Date: Apr 3 2019 2:15PM
लोकसभा चुनाव के मुद्दों में आखिर युवाओं की उपेक्षा क्यों?
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पिछले कई वर्षों से नए मतदाताओं को लक्ष्य कर किए जा रहे प्रयत्नों के परिणामस्वरूप 18−25 साल आयु वर्ग के मतदाताओं का मतदान के लिए निकलना तेजी से बढ़ा है। 2009 में इनका मतदान फीसद 54 था जो 2014 में बढ़कर 68 हो गया था।

लोकसभा चुनाव का रंग गहरा रहा है। विभिन्न पार्टियों ने अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं और धीरे−धीरे प्रचार अभियान जोर पकड़ने लगा है। विभिन्न राजनीतिक दल इन चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने जा रहे पहली बार मतदाता बने युवाओं तक पहुंचने और उन्हें अपनी ओर खींचने की रणनीतियां बनाने और संदेश देने में व्यस्त हैं। लेकिन इन चुनावों में युवाओं का प्रतिनिधित्व बढ़े, यह परम आवश्यक है। राजनीति में युवाओं की भूमिका कैसी हो, इस पर लोगों की अलग−अलग राय हो सकती है। लेकिन यह तय है कि युवाओं का मताधिकार का उपयोग करना, लोकतंत्र को मजबूत करने का एक सशक्त माध्यम है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं विपक्ष के नेता युवाओं को राजनीति में सक्रिय करने के लिये जो प्रयास कर रहे हैं, उससे निश्चित ही भारत की राजनीति को एक नया मोड़ मिल सकेगा। लेकिन इसके लिये चुनावी मुद्दों में युवाओं के सपनों, रोजगार एवं कैरियर के सवालों को गंभीरता से उठाना होगा। क्या भारतीय लोकतंत्र के लिये युवाओं से जुड़े मुद्दें चुनावी घोषणापत्रों में सिर्फ उल्लेख करने लायक मुद्दें रह गये हैं?


एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से किए गए मतदाता सर्वेक्षण के नतीजों पर अगर हम एक नजर डाले तो उभर कर आया है कि पूरे भारत में नौकरी के बेहतर अवसर सर्वाच्च प्राथमिकता हैं, जो युवाओं को लगातार निराश करता रहा है। जो भी दल नौकरियों के मामले में युवाओं को ठीक से आश्वस्त कर पाएगा, उसे बेरोजगारों के वोट ज्यादा संख्या में मिल सकते हैं, यह बात राजनीतिक दलों को समझनी होगी। बहरहाल सर्वे का एक संकेत यह भी है कि देश के आम मतदाताओं के साथ−साथ युवाओं का एक बड़ा हिस्सा जाति−धर्म और दूसरे भावनात्मक मुद्दों से बाहर आ रहा है। समय रहते इस बात को सभी पार्टियां समझ लें तो बेहतर होगा। गौरतलब है कि बेहतर रोजगार के अवसर को 2017 में 30 प्रतिशत लोगों ने अपनी प्राथमिकता बताया था, लेकिन 2018 में 47 प्रतिशत लोगों ने इसे प्राथमिकता बताया। इसी दौरान इस मुद्दे पर सरकार का प्रदर्शन पांच के पैमाने पर 3.17 से गिरकर 2.15 हो गया। यह इस बात का संकेत है कि रोजगार की समस्या बढ़ी है और यह इस बार एक अहम चुनावी मुद्दा बनेगी। जो सत्तापक्ष के लिये चिन्ता का विषय होनी चाहिए। 
 
पहली बार मतदाता के रूप में अपने मताधिकार का प्रयोग करने जा रहे युवाओं पर नरेन्द्र मोदी का निरंतर ध्यान देना अकारण नहीं है, फिर भी वे युवाओं के लिये रोजगार के विषय पर क्यों नाकाम रहे? जबकि सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार मतदान करने वालों ने भाजपा को सर्वाधिक समर्थन दिया था। इसके मुताबिक 18−22 वर्ष आयु वर्ग के लोगों ने कांग्रेस की तुलना में भाजपा को दोगुना समर्थन दिया था। लंदन के राजनीतिविज्ञानी ऑलिवर हीथ ने 2015 में एक विश्लेषण में पाया था कि कांग्रेस से मतदाताओं के विमुख होने की आम धारणा के विपरीत 2014 में भाजपा की भारी जीत का कारण उसकी नए मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफलता थी। मोदी भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं। परीक्षार्थियों को परीक्षा के तनाव से मुक्त रखने में सहायता करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री की लिखी पुस्तक एग्जाम वारिर्यस में एक जगह पर लिखा गया है कि 'उनकी जीत में भारत के युवाओं का ऐतिहासिक योगदान था, खासतौर पर पहली बार मतदान करने वालों का।' फिर युवाओं की उपेक्षा क्यों हुई?
 
पिछले कई वर्षों से नए मतदाताओं को लक्ष्य कर किए जा रहे प्रयत्नों के परिणामस्वरूप 18−25 साल आयु वर्ग के मतदाताओं का मतदान के लिए निकलना तेजी से बढ़ा है। 2009 में इनका मतदान फीसद 54 था जो 2014 में बढ़कर 68 हो गया था। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि 2014 में ऐसा पहली बार हुआ था कि मताधिकार का पहली बार प्रयोग करने वालों का मत−प्रतिशत पूरे चुनाव के कुल मत प्रतिशत 66 से ज्यादा था। राजनैतिक विद्वानों का आकलन है कि यह रुझान 2019 में भी जारी रहेगा और इसी के मद्देनजर न केवल भाजपा बल्कि सभी प्रमुख राजनैतिक दलों ने देश की कुल आबादी के 9 प्रतिशत इस युवा मतदाता समूह के ज्यादा से ज्यादा हिस्से को अपने साथ जोड़ने की योजनाएं बनाई हैं। 


 
देश अब सबसे बड़े चुनावी महासंग्राम के लिए तैयार हो रहा है तो 'सहस्राब्दी मतदाताओं' को रिझाने के लिए भाजपा के राष्ट्रवादी एजेंडे से लेकर कांग्रेस के समावेशन और रोजगार के वादे तक तरह−तरह के हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है। अलबत्ता, इन सारी बातों में एक स्वागतयोग्य परिवर्तन निहित है कि युवा तेजी से भारतीय चुनाव का केंद्र बिंदु बन रहे हैं। 
 
मोदी सरकार ने भी−बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना, प्रधानमंत्री सुकन्या समृद्धि योजना और प्रधानमंत्री युवा उद्यमिता विकास अभियान जैसी योजनाएं युवाओं की शिक्षा और जीवन संवरण के लिए तैयार की हैं। बावजूद इसके भाजपा का चुनाव घोषणा−पत्र बनाने के काम में शामिल एक केंद्रीय मंत्री का कहना है कि 'हम अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार अवसरों के सृजन की चर्चा भले करें, लेकिन भारतीय युवा अब भी सरकारी नौकरी पाना चाहता है।' नेशनल सैंपल सर्वे अॉफिस (एनएसएसओ) की उस विवादित रिपोर्ट के मुताबिक 2017−18 में भारत में बेरोजगारी 45 साल के सर्वोच्च स्तर 6.1 प्रतिशत पर थी। इस रिपोर्ट से नए मतदाताओं को आकृष्ट करने की मोदी की महायोजनाओं की चूलें हिल सकती हैं।


परिवर्तन, क्रांति और बदलाव की राजनीति ने युवाओं से जो उम्मीदें बांधी थीं उसका अंश आज भी कहीं ना कहीं हमारी राजनीतिक समझदारी में कायम है लेकिन ऐसा होने के बावजूद राजनीति में युवाओं की सक्रिय भागीदारी क्यों नहीं हो पा रही है, क्यों नहीं युवाओं से जुड़े सवाल चुनाव का एजेंडा बनते? ये अहम सवाल हैं। जिसको लेकर इन चुनावों में चर्चा होना, देश के लिये शुभता का सूचक है। लेकिन लोकसभा चुनाव के प्रारंभ में जो घटनाएं हो रही हैं वे शुभ का संकेत नहीं दे रही हैं। अशांति, अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, महिलाओं से जुड़ी स्थितयिां, काश्मीर में आतंकवादियों की हताशापूर्ण गतिविधियां, सीमापार से छेड़खानी− ये काफी कुछ बोल रही हैं। इन स्थितयिों में युवा मतदाता भी धर्म संकट में है। उसके सामने अपना प्रतिनिधि चुनने का विकल्प नहीं होता। प्रत्याशियों में कोई योग्य नहीं हो तो मतदाता चयन में मजबूरी महसूस करते हैं। मत का प्रयोग न करें या न करने का कहें तो वह संविधान में प्रदत्त अधिकारों से वंचित होना/करना है, जो न्यायोचित नहीं है।
 
इस बार की लड़ाई कई दलों के लिए आरपार की है। "अभी नहीं तो कभी नहीं।" ये चुनाव दिल्ली के सिंहासन का भाग्य निश्चित करेंगे। इसी बात को लेकर सभी आर−पार की लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें केवल  चुनाव की चिन्ता है, अगली पीढ़ी की नहीं। मतदाताओं के पवित्र मत को पाने के लिए पवित्र प्रयास की सीमा लांघ रहे हैं। यह त्रासदी बुरे लोगों की चीत्कार नहीं है, भले लोगों की चुप्पी है जिसका नतीजा राष्ट्र भुगत रहा है। भुगतता रहेगा, जब तक भले लोग या युवापीढ़ी मुखर नहीं होगी। 
 
मतदाता का मत ही जनतंत्र का निर्माण करता है और इनके आधार पर ही राजनीतिक नेतृत्व की दशा−दिशा तय होती है। ऐसे में यदि भारत का भविष्य−यानी युवा सत्ता एवं जनतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में सक्रिय हस्तक्षेप नहीं कर पाता तो पर्याप्त मतशक्ति के बावजूद राजनीतिक नेतृत्व में उसकी प्रत्यक्ष भागीदारी संभव नहीं हो सकती। भारत युवा आबादी वाला देश है और बीते कुछ दशकों में यहां 'युवा' मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है। अलग−अलग जाति समूह एवं राजनीतिक दलों में बंटे होने के बावजूद राजनीतिक हस्तक्षेप की अपनी क्षमता के बावजूद उन्हें विभिन्न राजनीतिक दलों में भागीदारी नहीं मिल रही है, उनसे जुड़े सवाल चुनावी मुद्दें नहीं बन पा रहे हैं। आज भी वे केवल अपने−अपने दलों की 'युवा इकाई' की राजनीति तक सीमित हैं। इसी तरह युवकों में मत देने की चाह तो बढ़ी है, लेकिन अभी उनमें राजनीतिक हस्तक्षेप की अपेक्षित शक्ति विकसित नहीं हो पाई है या होने नहीं दी जा रही है। शायद यही कारण है कि आबादी के अनुपात में उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि युवा पीढ़ी राजनीति से अलिप्त ही रहे, उसे देश के वर्तमान और भविष्य से कुछ मतलब ही न हो? यदि ऐसा हुआ, तो यह राष्ट्र के लिये बहुत ही खतरनाक होगा। इसलिए उन्हंे भी राजनीति में सक्रिय होना चाहिए, पर उनकी सक्रियता का अर्थ सतत जागरूकता है। ऐसा हर विषय, जो उनके आज और कल को प्रभावित करता है, उस पर वे अहिंसक आंदोलन कर देश, प्रदेश और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को अपनी नीति और नीयत बदलने पर मजबूर कर दें। ऐसा होने पर हर दल और नेता दस बार सोचकर ही कोई निर्णय लेगा।
 
स्पष्ट है कि युवाओं की राजनीतिक सक्रियता का अर्थ चुनाव लड़ना नहीं, सामयिक विषयों पर जागरूक व आंदोलनरत रहना है। यदि युवा पीढ़ी अपने मनोरंजन, सुविधावाद से ऊपर उठकर देखे, तो सैकड़ों मुद्दे उनके हृदय में कांटे की तरह चुभ सकते हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार, कामचोरी, राजनीति में वंशवाद, महंगी शिक्षा और चिकित्सा, खाली होते गांव, घटता भूजल, मुस्लिम आतंकवाद, माओवादी और नक्सली हिंसा, बंगलादेशियों की घुसपैठ, हाथ से निकलता कश्मीर, जनसंख्या के बदलते समीकरण, किसानों द्वारा आत्महत्या, गरीब और अमीर के बीच बढ़ती खाई आदि तो राष्ट्रीय मुद्दे हैं ही, इनसे कहीं अधिक स्थानीय मुद्दे होंगे, जिन्हें आंख और कान खुले रखने पर पहचान सकते हैं। आवश्यकता यह है युवा चुनावी राजनीति में तो सक्रिय बने ही, साथ ही साथ इन ज्वलंत मुद्दों पर भी उनकी सक्रियता हों। उनकी ऊर्जा, योग्यता, संवेदनशीलता और देशप्रेम की आहुति पाकर देश का राजनीतिक परिदृश्य निश्चित ही बदलेगा और इसके लिये वर्ष 2019 के चुनाव में उनकी सक्रिय सहभागिता अपेक्षित है। 
 
ललित गर्ग
 

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