नवरात्र में कलश स्थापना होता है समृद्धि का प्रतीक

Shardiya Navratri
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कलश स्थापित करने के लिए व्यक्ति को सदैव नदी की रेत का इस्तेमाल करना चाहिए। इस रेत में सबसे पहले जौ डालें। उसके बाद कलश में इलायची, गंगाजल, पान, लौंग, रोली, सुपारी, कलावा, हल्दी, चंदन, रुपया,अक्षत, फूल इत्यादि डालें।

आज से शारदीय नवरात्र प्रारम्भ हो रहा है, नवरात्र में कलश स्थापना का विशेष मुहूर्त होता है, तो आइए हम आपको कलश स्थापना के महत्व एवं विधि के बारे में बताते हैं। 

कलश स्थापना का शुभ संयोग 

इस शारदीय नवरात्र में कलश स्थापना का संयोग बहुत शुभ है। कलश स्थापना के समय शुक्र ग्रह का उदय हो रहा है जो समृद्धि का कारक है। इस शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना कर देवी की आराधना करने से भक्तों की आर्थिक परेशानी दूर होती है। साथ ही नवरात्र में कलश स्थापना चक्र सुदर्शन मुहूर्त में करना अच्छा माना गया हैं। लेकिन अगर आप अभिजित मुहूर्त में कलश स्थापना नहीं कर पाएं तो अनुकूल लाभ, शुभ तथै अमृत चौघडिया भी अच्छी मानी गयी है। अगर इन सभी मुहूर्तों में भी आप घट नहीं बैठा पाए तो सोम, बुध, गुरु और शुक्र में से किसी की भी दिन होरा में कलश स्थापित करें।

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विशेष मुहूर्त में शुरू हो रहा है नवरात्र

शारदीय नवरात्रि इस वर्ष 26 सितंबर से शुरू हो रही है। इस बार पूरे नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होगी। कोई तिथिक्षय जैसी स्थिति नहीं है। इस बार माता का आगमन और प्रस्थान दोनों ही हाथी पर होगा। आगमन विशेष शुभ प्रभाव वाला होगा जबकि माता का प्रस्थान बारिश की संभावना वाली होगी। 26 सितंबर की सुबह 03 बजकर 23 मिनट पर प्रतिपदा तिथि का आरंभ हो रहा है। जबकि प्रतिपदा तिथि का समापन 27 सितम्बर की सुबह 03 बजकर 08 मिनट पर हो रही है।

स्थापना के समय ये तरीके अपनाएं

कलश स्थापित करने के लिए व्यक्ति को सदैव नदी की रेत का इस्तेमाल करना चाहिए। इस रेत में सबसे पहले जौ डालें। उसके बाद कलश में इलायची, गंगाजल, पान,  लौंग, रोली, सुपारी, कलावा, हल्दी, चंदन, रुपया,अक्षत, फूल इत्यादि डालें। इसके बाद  'ॐ भूम्यै नमः' का जाप करते हुए कलश को सात प्रकार के अनाज के साथ रेत के ऊपर स्थापित करें। मंदिर में जहां आप कलश स्थापित किया है वहां नौ दिन तक अखंड दीपक जलाते रहें।

विधानपूर्वक पूजन से मिलता है विशेष लाभ

पंडितों का मानना है कि सही मुहूर्त में पूजन आरंभ से लेकर सम्पूर्ण विधान से माता का पूजन जातक का भला करने वाला होता है। नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना करते हुए मां के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा आराधना होगी। जबकि इसके बाद नौ दिनों तक शक्ति की साधना-आराधना के क्रम में माता के विभिन्न स्वरूपों का पूजन सम्पन्न होगा। दुर्गा उपासना, पूजा, उपवास और मंत्रों के जाप का विशेष महत्व होता है इसलिए हर जातक इसका विशेष ध्यान रखें।

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कलश स्थापना का महत्व 

हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान और किसी भी विशेष अवसर पर कलश स्थापना बेहद ही महत्वपूर्ण होती है। शास्त्रों में कलश स्थापना को काफी महत्व दिया जाता है और इससे सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पंडितों का मानना है कि कलश में सभी ग्रह,नक्षत्रों और तीर्थों का निवास होता है।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग के अनुसार 26 सितंबर को नवरात्र के पहले दिन देवी आराधना की पूजा और कलश स्थापना की जाएगी। इसका शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 10 मिनट से सुबह 7 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। हालांकि, अगर आप भूलवश या किसी कारण इस मुहूर्त में कलश स्थापना नहीं कर पाते हैं तो दूसरा शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 49 मिनट से लेकर 12 बजकर 37 मिनट तक रहेगा। पंडितों के अनुसार 26 सितंबर को कलश स्थापना के दिन बहुत ही शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन शुक्ल और ब्रह्रा योग का शुभ संयोग होगा।

इन्हें भी आजमाएं

कलश को स्थापित करते समय मुहूर्त का हमेशा ध्यान रखें। कलश का मुंह कभी भी खुला न रखें। साथ ही अगर आप कलश को किसी बर्तन से ढक कर रख रहे हैं, तो उस बर्तन को कभी भी खाली नहीं छोड़े बल्कि उसे चावलों से भर दें। यही नहीं चावल के बीच में एक नारियल भी रखें। प्रतिदिन अर्चना के पश्चात माता रानी को शुभ-शाम लौंग और बताशे चढ़ाएं। ध्यान रखें देवी को लाल फूल बहुत पसंद हैं। इसलिए हमेशा लाल फूल चढ़ाए। मां दुर्गा को मदार, आक, दूब और तुलसी पत्र अर्पित न करें। 

शारदीय नवरात्र का महत्व

शारदीय नवरात्र बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। ये मां दुर्गा की शक्ति प्रतीक माने जाते हैं। जब महिषासुर का आतंक धरती पर बढ़ गया था। तब सभी देवताओं ने त्रिदेव से मदद मांगी। मगर ब्रह्मा के वरदान के कारण त्रिदेव ने असमर्थता जताई। तब त्रिदेव ने अपनी शक्ति से मां दुर्गा का सृजन किया। सभी देवताओं ने मां को अपनी शक्तियां और अश्त्र- शस्त्र प्रदान किया। इसके बाद नौ दिन तक मां दुर्गा का महिषासुर से युद्ध चला और दसवें दिन उसका वध हुआ। मां दुर्गा की शक्ति और सामर्थ्य से सभी देवता चकित हो गए। तभी से यह नौ दिन नवरात्र और दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है। रावण के वध से पहले भी श्री राम ने मां दुर्गा की पूजा कर विजय का आशीर्वाद लिया था।

- प्रज्ञा पाण्डेय

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