हरियाली तीज पर खूब झूमें-नाचें-गायें पर इन परम्पराओं का भी पालन करें

By शुभा दुबे | Publish Date: Aug 2 2019 3:17PM
हरियाली तीज पर खूब झूमें-नाचें-गायें पर इन परम्पराओं का भी पालन करें
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सुहागिन महिलाओं को सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद मां गौरी की रेशमी वस्‍त्र और गहने से सजावट करें और खुद से मां की मूर्ति बनाएं जोकि अर्धगोले के आकार की हो। इसे पूजा के स्थान पर रखें और पूजन करें।

आया सावन झूम के। जी हाँ, सावन के माह की छटा ही निराली है। यह माह हिन्दू धर्म में खास महत्व रखता है। भगवान शिव को प्रिय माने जाने वाले सावन माह में हर ओर उमंग का माहौल रहता है। बागों में झूले लग जाते हैं, घेवर और तरह-तरह की मिठाइयों से बाजार सज जाते हैं। इस माह में महिलाएं खासकर नवविवाहताएं हरियाली तीज को लेकर काफी उत्सुक रहती हैं और इस दिन खूब सजती संवरती हैं। हरियाली तीज का त्योहार सावन माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह पर्व खासकर उत्तर भारत में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार में इस पर्व से जुड़ी परम्पराओं में थोड़ा बहुत अंतर भी देखने को मिलता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस त्योहार को कजली तीज भी कहा जाता है। राजस्थान और पंजाब में तो यह त्योहार बड़े ही धूमधाम से पारम्परिक अंदाज में मनाया जाता है वहीं दिल्ली तथा एनसीआर में बाजार इस त्योहार पर काफी हद तक हावी हो चुका है।


हरियाली तीज भारतीय परम्परा में पति पत्नी के प्रेम को और प्रगाढ़ बनाने तथा आपस में श्रद्धा और विश्वास पैदा करने का त्योहार है। इस दिन कुंवारी लड़कियां व्रत रखकर अपने लिए शिव जैसे वर की कामना करती हैं। विवाहित महिलाएं अपने सुहाग को भगवान शिव तथा पार्वती से अक्षुण्ण बनाए रखने की कामना करती हैं। इस तीज पर निम्न बातों को त्यागने का विधान है− पति से छल कपट, झूठ बोलना एवं दुर्व्यवहार, परनिन्दा। कहते हैं कि इस दिन गौरी विरहाग्नि में तपकर शिव से मिली थीं।
 
सुहागिन महिलाओं को इस तरह करना चाहिए पूजन
 
सुहागिन महिलाओं को सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद मां गौरी की रेशमी वस्‍त्र और गहने से सजावट करें और खुद से मां की मूर्ति बनाएं जोकि अर्धगोले के आकार की हो। इसे पूजा के स्थान पर रखें और पूजन करें। पूजन के समय कथा जरूर सुननी चाहिए। पूरे सोलह श्रृंगार कर आभूषण पहनें और मेहंदी जरूर लगवाएं। इस दिन झूला जरूर झूलें। 


हरियाली तीज का उल्लास


 
महिलाएं चाहे किसी भी उम्र की हों सभी को श्रावणी तीज का इंतजार बेसब्री से रहता है क्योंकि इस पर्व के दौरान उनका जीवन एक बार फिर उमंगों से भर जाता है। इस पर्व पर नारियों के समूहों को झूलों पर झूलते, तरह-तरह के पकवान बनाते, खिलाते या सामूहिक गीत गाते देखा जा सकता है। इस पर्व के आने से पहले ही घर−घर में झूले पड़ जाते हैं। नारियों के समूह गीत गाते हुए झूला झूलते दिखाई देते हैं। इस दिन बेटियों को बढ़िया पकवान, गुजिया, घेवर, फैनी आदि सिंधारा के रूप में भेजा जाता है। इस दिन सुहागिनें बायना छूकर सास को देती हैं। इस तीज पर मेंहदी लगाने का विशेष महत्व है। स्त्रियां हाथों पर मेंहदी से भिन्न−भिन्न प्रकार के बेल बूटे बनाती हैं। स्त्रियां पैरों में आलता भी लगाती हैं जो सुहाग का चिन्ह माना जाता है।
 
राजस्थान का रंग
 
हरियाली तीज पर राजस्थान में राजपूत लाल रंग के कपड़े पहनते हैं। इस दिन माता पार्वती की सवारी निकाली जाती है। राजा सूरजमल के शासन काल में इस दिन कुछ पठान कुछ स्त्रियों का अपहरण करके ले गये थे, जिन्हें राजा सूरजमल ने छुड़वाकर अपना बलिदान दिया था। उसी दिन से यहां मल्लयुद्ध का रिवाज शुरू हो गया। राजस्थान के लोगों के लिए त्यौहार जीवन का सार है खासकर राजधानी जयपुर में इसकी अलग ही छटा देखने को मिलती है। यदि इस दिन वर्षा हो, तो इस पर्व का आनंद और बढ़ जाता है। राजस्थान सहित उत्तर भारत में नवविवाहिता युवतियों को सावन में ससुराल से मायके बुला लेने की परम्परा है। सभी विवाहिताएँ इस दिन विशेष रूप से श्रृंगार करती हैं। सायंकाल सज संवरकर सरोवर के किनारे उत्सव मनाती हैं और कजली गीत गाते हुए झूला झूलती हैं।
 
बताया जाता है कि जयपुर के राजाओं के समय में पार्वती जी की प्रतिमा, जिसे 'तीज माता' कहते हैं, को एक जुलूस उत्सव में दो दिन तक ले जाया जाता था। उत्सव से पहले प्रतिमा का पुनः रंगरोगन किया जाता है और नए परिधान तथा आभूषण पहनाए जाते हैं इसके बाद प्रतिमा को जुलूस में शामिल होने के लिए लाया जाता है। हजारों लोग इस दौरान माता के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ते हैं। शुभ मुहूर्त में जुलूस निकाला जाता है। सुसज्जित हाथी और बैलगाड़ियां इस जुलूस की शोभा को बढ़ा देते हैं।
मथुरा, बुंदेलखंड में भी रहती है हरियाली तीज की धूम
 
हरियाली तीज के अवसर पर वृन्दावन के बांके बिहारी सहित अनेक मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं जिससे सड़कों पर पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है, इसलिए शहर में चार पहिया वाहनों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया जाता है। यही वह दिन होता है जब बांके बिहारी के दर्शन संभव हो पाते हैं। दूसरी तरफ इस पर्व को बुन्देलखंड में हरियाली तीज के नाम से व्रतोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
 
-शुभा दुबे
 

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