काबुल में हमला करने वाले आईएस-के की तालिबान के साथ है वैचारिक प्रतिद्वंद्विता, खुरासान की करना चाहता है स्थापना

ISIS
काबुल में हुए आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आईएसआईएस-के (इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत) को आईएसकेपी और आईएसके के नाम से भी जाना जाता है।

अफगानिस्तान के 33 प्रांतों पर तालिबान का कब्जा है और इसके बाद काबुल में गुरुवार को पहला बड़ा धमाका हुआ है। काबुल हवाई अड्डे के बाहर जमा भीड़ पर हुए आत्मघाती हमले में 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जिनमें 13 अमेरिकी सैनिक भी शामिल हैं। इस हमले की जिम्मेदारी आईएसआईएस-के ने ली है। ऐसे में सवाल खड़ा हो रहा है कि आईएसआईएस-के कौन सा संगठन है। 

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क्या है आईएसआईएस-के ?

काबुल में हुए आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आईएसआईएस-के (इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत) को आईएसकेपी और आईएसके के नाम से भी जाना जाता है। अफगानिस्तान पर कब्जा करने वाला तालिबान भी आईएसआईएस-के की तरह आतंकवादी संगठन है लेकिन दोनों संगठन एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों संगठनों के बीच भारी मतभेद है।

एक-दूसरे से भिन्न हैं आतंकी संगठन

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता स्थापित करने की कोशिशों में जुटा हुआ है। जिससे आईएसआईएस-के नाराज है।

कहा जाता है कि तालिबान के कमांडर मुल्ला उमर की मौत की बात बहुत से आतंकवादी आईएसआईएस-के में शामिल हो गए। जो खुरासान राज्य को स्थापित करना चाहते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अफगानिस्तान की स्थिति और बिगड़ने वाली है क्योंकि आईएसआईएस-के, अलकायदा के साथ मिलकर तालिबान के खिलाफ जंग शुरू कर सकता है। 

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आपको बता दें कि आईएसआईएस-के तालिबान छोड़ने वाले लड़ाकों को अपने संगठन में शामिल करा लेता है। इस संगठन का खोरासन माड्यूल सबसे ज्यादा सक्रिय है। 

कब स्थापित हुआ आईएसआईएस-के ?

आईएसआईएस-के की स्थापना जनवरी 2015 में हुई थी। जिसे पाकिस्तानी तालिबान, अफगान तालिबान और इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान के पूर्व सदस्यों ने मिलकर बनाया था। इस संगठन को इराक और सीरिया के इस्लामिक स्टेट ने मान्यता दी है। तालिबान की तरह आईएसआईएस-के ने भी अफगानिस्तान के ग्रामीण जिलों पर अपनी पकड़ बना ली थी। इसकी शुरुआत उन्होंने उत्तर-पूर्वी अफगानिस्तान से की। इसके बाद उन्होंने अफगानिस्तान और पाकिस्तान को निशाना बनाया और कई घातक हमले किए। लेकिन अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी समर्थक सरकार के सामने यह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया और इसका नेतृत्व कमजोर होने लगा।

अफगानिस्तान को अमेरिकी सैनिकों का समर्थन प्राप्त था। जिसकी वजह से आईएसआईएस-के ने लगभग अपने घुटने ही टेक दिए। तभी तो साल 2019 और 2020 के दरम्यान आतंकी संगठन के 1,400 से अधिक लड़ाकों ने खुद को सरेंडर कर दिया। 

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कैसे बढ़ी आईएसआईएस-के की ताकत ?

आईएसआईएस-के की स्थापना के साथ ही इसमें खूंखार लोग शामिल होते गए और आतंकवादी संगठन ने सबसे पहले नंगरहार प्रांत के दक्षिणी जिलों में अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी। यह इलाका पाकिस्तान से लगा हुआ है। जिसे कभी अलकायदा का गढ़ माना जाता था।

आईएसआईएस-के को इराक और सीरिया के इस्लामिक समूहों ने हर प्रकार की सहायता दी और उनके लड़ाकों को प्रशिक्षण दिया। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि समूह को 10 करोड़ अमेरीकी डॉलर की मदद मिली।

आईएसआईएस-के लोगों में दहशत पैदा करना चाहता है। इसका उद्देश्य सबसे प्रमुख जिहादी संगठन के रूप में खुद को मजबूत करना है और जिहादी समूहों की विरासत को बरकरार रखना है।

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