क्या गाली देने वाला बॉस बेहतर लीडर हो सकता है? जानिए क्या कहता है नया वैश्विक अध्ययन

एक नए वैश्विक अध्ययन के अनुसार, क्या गाली देने वाला बॉस एक अच्छा लीडर हो सकता है, यह कर्मचारियों के व्यक्तित्व और उनके सामाजिक परिवेश पर निर्भर करता है। हालांकि, सामान्य तौर पर ऐसे अधिकारियों से कर्मचारी कम संतुष्ट पाए गए। अध्ययन में पाया गया कि अधिक आर्थिक असमानता वाले देशों में गाली-गलौज करने वाले अधिकारियों को नकारात्मक रूप से देखा जाता है।
(अलेक्जेंड्रोस साइकोगियोस, लॉफबोरो विश्वविद्यालय और ड्रिटजोन ग्रुडा, कैथोलिक यूनिवर्सिटी ऑफ पुर्तगाल) लंदन, 27 जुलाई (द कन्वरसेशन) कुछ लोगों की बातचीत में गाली-गलौज आम बात होती है। कार्यस्थल पर भी ऐसे लोग मिल जाते हैं और कई बार वे नेतृत्व की भूमिका में होते हैं। क्या गाली देने वाला बॉस बेहतर ‘टीम लीडर’ हो सकता है?
सुनने में यह अजीब लग सकता है, लेकिन एक नए अध्ययन के मुताबिक, इसका जवाब हर किसी के लिए एक जैसा नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि सामने वाला व्यक्ति और उसकी टीम उस को किस तरह लेती है। शायद आपने भी ऐसे ‘टीम लीडर’ या ‘मैनेजर’ के साथ काम किया हो, जो कर्मचारियों का हौसला बढ़ाते समय बीच-बीच में गाली-गलौज से परहेज नहीं करते हों या अपनी बात को सबसे स्पष्ट तरीके से रखने के लिए अक्सर अपशब्दों का सहारा लेते हैं।
हालांकि, ऐसे व्यवहार पर सहकर्मियों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। कुछ लोगों को यह सहज और मजेदार लग सकता है, कुछ इसे नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि कई लोग इसे खराब नेतृत्व, गैर-पेशेवर रवैया और पूरी तरह अनावश्यक मानते हैं। हमारे अध्ययन से पता चलता है कि गाली देने वाले बॉस के प्रति लोगों की राय केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उन्होंने क्या कहा, बल्कि इसपर भी निर्भर करती है कि सुनने वाला कौन है और वह किस देश या सामाजिक परिवेश में रहता है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि नेतृत्व करने का कोई एक ऐसा तरीका नहीं है, जिसे हर जगह ‘‘सही’’ माना जाए। फिर भी, कुल मिलाकर जिन कर्मचारियों के वरिष्ठ अधिकारी अक्सर गाली-गलौज करते थे, वे उनसे कम संतुष्ट पाए गए। इसलिए यदि आप सोच रहे हैं कि बैठकों में गाली-गलौज करना एक प्रभावी प्रबंधन रणनीति हो सकती है, तो बेहतर होगा कि इससे बचा जाए।
हालांकि, हमारे अध्ययन में शामिल 19 देशों के 5,660 कर्मचारियों में कुछ लोगों की राय बिल्कुल अलग थी। स्वयं में साइकोपैथिक और मैकियावेलियन (भावनाओं या सहानुभूति के बजाय अपने लाभ को प्राथमिकता देने वाले) व्यक्तित्व के अधिक लक्षण बताने वाले प्रतिभागियों ने बताया कि जैसे-जैसे उनके बॉस की में गाली-गलौज बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनके प्रति उनकी संतुष्टि भी बढ़ी। साइकोपैथिक और मैकियावेलियन व्यक्तित्व वाले लोग भावनात्मक रूप से अपेक्षाकृत कम जुड़ाव महसूस करते हैं और सामाजिक मानदंडों की परवाह भी कम करते हैं।
इन मानदंडों में यह धारणा भी शामिल है कि ‘बॉस को गाली नहीं देनी चाहिए’। ऐसे लोगों को गाली देने वाला बॉस अधिक सच्चा, आत्मविश्वासी और औपचारिक नियमों से मुक्त व्यक्ति के रूप में दिखाई दे सकता है। वहीं, जिन कर्मचारियों में ‘नार्सिसिस्टिक’ यानी आत्ममुग्धता के लक्षण अधिक थे, उनकी प्रतिक्रिया चौंकाने वाली रही।
उन्हें न तो बॉस की गालियां विशेष रूप से पसंद आईं और न ही उनसे कोई खास आपत्ति हुई। उनके वरिष्ठ अधिकारी के प्रति संतुष्टि लगभग वैसी ही बनी रही। अध्ययन में यह भी स्पष्ट हुआ कि केवल व्यक्ति का स्वभाव ही नहीं, बल्कि वह किस समाज में रहता है, यह भी उसकी प्रतिक्रिया को प्रभावित करता है।
जिन देशों में आय की समानता अपेक्षाकृत अधिक है, जैसे स्वीडन और ऑस्ट्रिया, वहां लोगों के व्यक्तित्व के आधार पर प्रतिक्रियाओं में स्पष्ट अंतर दिखाई दिया। यानी वही मैनेजर, वही और वही गाली- एक कर्मचारी को सहज और मिलनसार लग सकती है, जबकि दूसरे को वही व्यवहार गैर-पेशेवर प्रतीत हो सकता है। इसके विपरीत, जिन देशों में आर्थिक असमानता अधिक है, जैसे दक्षिण अफ्रीका और मेक्सिको, वहां व्यक्तित्व का प्रभाव लगभग खत्म हो गया।
ऐसे देशों में अधिकांश कर्मचारियों ने, चाहे उनका व्यक्तित्व कैसा भी रहा हो, गाली देने वाले बॉस को नकारात्मक नजरिये से ही देखा। आखिर ऐसा क्यों होता है? आर्थिक असमानता पर हुए दूसरे अध्ययन बताते हैं कि जिन समाज में असमानता अधिक होती है, वहां लोग सामाजिक हैसियत और पद को लेकर अधिक सजग रहते हैं।
ऐसे माहौल में कार्यस्थल की पदानुक्रम व्यवस्था भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए जब कोई वरिष्ठ अधिकारी गाली देता है, तो कर्मचारी उसे दोस्ताना व्यवहार या स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अपना प्रभुत्व दिखाने की कोशिश के रूप में देख सकते हैं। यानी वहां निजी व्यक्तित्व से ज्यादा सामाजिक परिवेश लोगों की सोच को प्रभावित करता है।
इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश बेहद सरल है। प्रभावी संवाद केवल सही शब्द चुनने का नाम नहीं है। एक ही वाक्य किसी कर्मचारी को प्रेरित कर सकता है, दूसरे को नाराज कर सकता है और तीसरे पर उसका कोई असर ही नहीं पड़ सकता।
यही वजह है कि नेतृत्व को लेकर दी जाने वाली सलाह कई बार विरोधाभासी लगती है। कोई विशेषज्ञ कहता है कि नेता को हमेशा ‘स्वाभाविक’ रहना चाहिए, जबकि दूसरा हर परिस्थिति में पेशेवर आचरण बनाए रखने की सलाह देता है। असलियत यह है कि दोनों ही बातें सही हो सकती हैं।
यह इस बात पर निर्भर करता है कि सामने कौन है और वह किस सांस्कृतिक तथा सामाजिक वातावरण से आता है। तो क्या नेतृत्व की भूमिकाएं निभा रहे लोगों को गाली देना पूरी तरह छोड़ देना चाहिए? जरूरी नहीं।
लेकिन उन्हें यह जरूर समझना चाहिए कि हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए संवाद करने का कोई एक तरीका ऐसा नहीं हो सकता जो सभी कर्मचारियों पर समान रूप से असर करे। अच्छा बॉस वही होता है जो अपनी टीम को समझे। एक प्रभावी बॉस के लिए यह जानना उतना ही जरूरी है कि उसकी टीम कैसी है, जितना कि यह तय करना कि किस परिस्थिति में कौन-से शब्द बोलने चाहिए और किनसे बचना चाहिए।
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