अफगानिस्तान की खनिज संपदा पर ड्रैगन की नजर, अमेरिका समेत कई देशों को हो सकता है आर्थिक नुकसान

China
अफगानिस्तान दुनिया के सबसे गरीब देशों में शामिल है। लेकिन 2010 में खुलासा हुआ था कि देश में करीब एक लाख करोड़ डॉलर का खनिज भंडार है।
काबुल। अफगानिस्तान पर तालिबान का राज है। इतिहास के पन्नों में झांके तो सोवियत संघ ने तख्तापलट कर अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट की सरकार बनावायी थी। जिसके बाद अमेरिका, साउदी अरब समेत कई देशों ने मिलकर सोवियत संघ के खिलाफ मोर्चा तैनात करने के लिए तालिबान जैसे ग्रुप को जन्म दिया गया। उत्तरी पाकिस्तान से तालिबान जैसे संगठन की शुरुआत हुई। अमेरिका, साउदी अरब जैसे देशों ने पैसा और हथियार देकर तालिबान को मजबूत किया और सोवियत संघ को वहां से निकलने के लिए मजबूर कर दिया। 

इसे भी पढ़ें: नहीं बदला तालिबान, महज बदल गए साथी, बिपिन रावत बोले- भारत हर स्थिति से निपटने के लिए तैयार 

इसके बाद अफगानिस्तान पर तालिबान का राज था लेकिन बाद में अमेरिका ने तालिबान को वहां से उखाड़ फेंका और सरकार का गठन करवाया। हालांकि 15 अगस्त को काबुल में तालिबान की एंट्री के साथ ही अमेरिकी समर्थन सरकार गिर गई और राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर भाग गए लेकिन क्या आप जानते हैं कि अफगानिस्तान में मौजूद खनिज संप्रदा पर बहुत से देशों की नजर है। तालिबान का समर्थन करने वालों मुल्कों में विश्व पर राज करने की चाहत रखने वाला चीन भी शामिल है।

साल 2001 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान से तालिबानियों को खदेड़ा था तब वैश्विक अर्थव्यवस्था काफी अलग थी। टेस्ला जैसी कंपनी नहीं थी, आईफोन मौजूद नहीं था और स्टीवन स्पीलबर्ग फिल्म में ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस देखने को मिलता था। अब तीनों आधुनिक अर्थव्यवस्था में सबसे आगे हैं, जो उच्च तकनीक वाले चिप्स और उच्च क्षमता वाली बैटरी में प्रगति से प्रेरित हैं।

सबसे बड़ा लिथियम भंडार

अफगानिस्तान दुनिया के सबसे गरीब देशों में शामिल है। लेकिन 2010 में खुलासा हुआ था कि देश में करीब एक लाख करोड़ डॉलर का खनिज भंडार है। इससे देश की अर्थव्यवस्था में काफी परिवर्तन हो सकता है। अफगानिस्तान में दुनिया का सबसे बड़ा लिथियम भंडार के साथ-साथ लोहे, तांबे और सोने का भंडार भी हैं। 

इसे भी पढ़ें: तालिबान की अमेरिका को अंतिम चेतावनी, कहा- 31 अगस्त तक अफगानिस्तान छोड़े सैनिक 

आपको बता दें कि लिथियम से रिचार्जेबल बैटरी बनाई जाती है। जिसका उपयोग मोबाइल फोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वीकल्स में होता है। ऐसे में लिथियम को धरती से बाहर कौन निकालेगा। इसी का खेला चल रहा है।

खरबों डॉलर की दुर्लभ धातु मौजूद

चीन की नजर अब वहां धरती पर मौजूद खरबों डॉलर मूल्य की दुर्लभ धातुओं पर है। सीएनबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में अफगान दूतावास के पूर्व राजनयिक अहमद शाह कटवाजई के हवाले से कहा कि अफगानिस्तान में मौजूद दुर्लभ धातुओं की कीमत 2020 में एक हजार अरब डॉलर से लेकर तीन हजार अरब डॉलर के बीच लगाई गई थी। इन कीमतों धातुओं का इस्तेमाल हाई-टेक मिसाइल की प्रणाली जैसी उन्नत तकनीकों में प्रमुख तौर पर किया जाता है।

सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन दुनिया की 85 प्रतिशत से अधिक दुर्लभ पृथ्वी की धातुओं की आपूर्ति करता है। चीन सुरमा (एंटीमनी) और बराइट जैसी दुर्लभ धातुओं और खनिजों की भी आपूर्ति करता है, जो वैश्विक आपूर्ति के लिए मौजूद लगभग दो-तिहाई हिस्सा है।

चीन ने दी थी अमेरिका को धमकी

चीन ने 2019 में अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध के दौरान धातु निर्यात को नियंत्रण में करने की धमकी दी थी। चीन के इस कदम से अमेरिकी उच्च तकनीक उद्योग के लिए कच्चे माल की गंभीर कमी हो सकती है। उभरते बाजार ऋण एलायंसबर्नस्टीन की निदेशक शमिला खान का मानना है कि तालिबान ऐसे संसाधनों के साथ सामने आये हैं जो दुनिया के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकते है। अफगानिस्तान में मौजूद खनिजों का दुरुपयोग किया जा सकता है। 

इसे भी पढ़ें: अफगनिस्तान में गुरुद्वारों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे तालिबानी! सिख समुदाय के लिए सबसे बुरा समय 

चीन वित्तीय सहयोग करने के लिए तैयार

चीन ने संकेत दिया कि वह तालिबान के कब्जे वाले अफगानिस्तान को वित्तीय सहयोग प्रदान करेगा। तालिबान के सत्ता पर काबिज होने के बाद काबुल को विभिन्न देशों द्वारा वित्तीय मदद रोके जाने के बीच चीन मदद करना चाहता है। हाल ही में चीन ने कहा था कि वह युद्धग्रस्त देश की मदद करने में ‘सकारात्मक भूमिका’ निभाएगा।

चीन ने अमेरिका को निशाने पर लेते हुए कहा था कि वह अफगान संकट के लिए मुख्य गुनहगार है और अमेरिका, अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए कुछ किए बिना ऐसे हाल में छोड़कर नहीं जा सकता।

वहीं, जी7 देशों की प्रस्तावित बैठक से पहले चीन ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि अफगानिस्तान एक स्वतंत्र, संप्रभु राष्ट्र है। अमेरिका और उसके सहयोगियों को अतीत से सबक सीखना चाहिए और अफगानिस्तान से संबंधित मुद्दों पर समझदारी से काम लेना चाहिए। 

इसे भी पढ़ें: अफगानिस्तान से तय समय-सीमा पर वापसी, तालिबान के सहयोग पर निर्भर: बाइडन 

साल 2003 से 2020 तक पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में वरिष्ठ कर्नल रहे झोउ बो ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक ऑप-एड में लिखा कि अमेरिका की वापसी के साथ बीजिंग, काबुल को राजनीतिक निष्पक्षता और आर्थिक निवेश की पेशकश कर सकता है जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है।

उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में बदले हालात के बीच चीन के लिए आर्थिक विकास को खोजना एक पुरस्कार की तरह ही होगा। क्योंकि चीन काफी तेजी से अफगानिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास कर सकता है और अफगानिस्तान की जमीन के अंदर छिपे एक ट्रिलियन डॉलर के खनिज तक पहुंच सकता है।

तालिबान को तबाह कर सकता है अमेरिका

तालिबान भले ही अमेरिका को 31 अगस्त तक निकलने की चेतावनी दे रहा है कि लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी भी अमेरिका के पास उसे तबाह करने की हिम्मत और ताकत दोनों ही मौजूद है। चीन का मानना है कि अमेरिका कभी भी तालिबान को अफगानिस्तान से उखाड़ सकता है और तमाम विदेशी कंपनियों को भी अफगानिस्तान पर निवेश करने से रोक सकता है। ऐसे में अफगानिस्तान के हालात और भी ज्यादा बदतर हो सकते हैं। 

इसे भी पढ़ें: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख का बयान, तालिबान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में बर्बरता की खबरें मिली हैं 

आर्थिक मोर्चे पर तालिबान को लगा झटका  

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के बाद अब वर्ल्ड बैंक ने अफगानिस्तान की तमाम परियोजनाओं के लिए दी जाने वाली फंडिंग को रोक दिया है। वहीं, अमेरिका ने पहले ही अफगानिस्तान की करीब 9.5 बिलियन डॉलर की संपत्ति को फ्रीज कर दिया था। इसके बाद आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक द्वारा फंडिंग रोके जाने से तालिबान को बड़ा झटका लगा है।

चीन का मानना है कि तालिबान के लिए अफगानिस्तान की सरकार को चला पाना काफी मुश्किल होगा। ऐसे में चीन अफगानिस्तान के हालातों पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। माना जा रहा है कि चीन अफगानिस्तान पर अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए कोई भी मौका नहीं छोड़ेगा। क्योंकि बात खनिज संप्रदा की है। जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था को काफी मजबूती मिलेगी।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान गहरे आर्थिक संकट की तरफ आगे बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले समय में आटा, दाल, चावल, तेल से लेकर दवाईयों तक की कीमत में भारी इजाफा हो सकता है। दूसरी तरफ जिस तरह से अमेरिका को तालिबान धमकी दे रहा है उसे नहीं भूलना चाहिए कि उसकी आर्थिक स्थिति को और भी कमजोर करने से अमेरिका चूकेगा भी नहीं। हालांकि तालिबान चाहता है कि उसके ऊपर से वैश्विक प्रतिबंधों को समाप्त किया जाए। 

इसे भी पढ़ें: अफगानिस्तान से वतन वापसी के लिए 24 घंटे काम कर रही है ये स्पेशल टीम! 

हाल ही में तालिबान के प्रवक्ता ने कहा था कि अफगानिस्तान पर लगा आर्थिक प्रतिबंध पुननिर्माण की प्रक्रिया को कमजोर कर देगा। इसलिए प्रतिबंधों को समाप्त किया जाना चाहिए। इसका फैसला एकतरफा है और अफगानी लोगों के खिलाफ है।

अन्य न्यूज़