Jallianwala Bagh Massacre: आज भी दीवारों पर मौजूद हैं गोलियों के निशान, बयां करते हैं क्रूरता की कहानी

Jallianwala Bagh Massacre
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आज 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग नरसंहार स्मृति दिवस है। आज से 107 साल पहले अमृतसर के उस बाग में हुए नरसंहार ने पूरी दुनिया की आत्मा को झझकोर दिया था। देश की आजादी को सच करने के लिए सैकड़ों लोगों ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी।

आज यानी की 13 अप्रैल की तारीख भारतीय इतिहास में हमारे देश के लोगों के खून से लिखी गई है। आज 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग नरसंहार स्मृति दिवस है। आज से 107 साल पहले अमृतसर के उस बाग में हुए नरसंहार ने पूरी दुनिया की आत्मा को झझकोर दिया था। इस दिन देश की आजादी को सच करने के लिए सैकड़ों लोगों ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी। तो आइए जानते हैं इस दिन के इतिहास के बारे में...

जलियांवाला बाग हत्याकांड

13 अप्रैल 1919 को बैशाखी का पर्व बड़ी उत्साह के साथ मनाया जा रहा था। इसी दिन पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला बाग में हजारों की संख्या लोग जुटे थे। कोई अपने परिवार के साथ मेला देखने के लिए आया था और कोई वहां पर शांति से अपनी बात रखने के लिए सभा कर रहा था। बच्चे खेल रहे और बड़े-बुजुर्ग भी मौजूद थे। वहां का माहौल शांत था, लेकिन किसी को इसका अंदाजा नहीं था कि वहां पर कुछ देर में क्या होने वाला है।

तभी अचानक जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग पहुंच गया। जनरल डायर ने बिना किसी वॉर्निंग के बाग से बाहर जाने वाला रास्ता बंद कर दिया, जिससे कि कोई बाहर न जा सके। इसके बाद उसने सैनिकों से निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। करीब 10 मिनट तक वहां पर गोलियां चलती रहीं। लोग अपनी जान बचाने के लिए दीवारों की ओर भागे, लेकिन दीवारें इतनी ऊंची थीं कि उनको पास करना नामुमकिन था।

बर्बरता की कहानी

जब चारों ओर से गोलियां चल रही थीं, तो लोग घबराकर बाग के अंदर बने कुएं में कूदने लगे। लोगों को लगा शायद कुएं में उनकी जान बच जाएगी। लेकिन देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से भर गया था। आज भी उस जगह की दीवारों पर गोलियों के निशान साफ नजर आते हैं। जो उस दिन हुए बेरहमी की याद दिलाते हैं। जलियांवाला बाग का मंजर इतना ज्यादा खौफनाक था, जिसको सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

उधम सिंह का बदला

इस भीषण घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। लोगों के मन में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा भर गया था। महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। लेकिन क्रांतिकारी उधम सिंह ने इस नरसंहार का बदला लेने के लिए 21 सालों तक इंतजार किया। आखिर में साल 1940 में उधम सिंह ने लंदन जाकर इस घटना के समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर रहे माइकल ओ'डायर की गोली मारकर हत्याकर दी थी।

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