Vishwakhabram: BRICS Meeting में Iran-UAE के मतभेद खुलकर सामने आये, Modi-Jaishankar-Doval की Energy Diplomacy ने संभाले हालात

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित बनाए रखे। ईरान ने हाल के सप्ताहों में अमेरिका और इजराइल के हमलों की निंदा करते हुए ब्रिक्स की ओर से साझा बयान जारी करने की पहल भारत से करने का आग्रह किया था।
ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भले ही पश्चिम एशिया संकट को लेकर सदस्य देशों के बीच आम सहमति नहीं बन पाई, लेकिन भारत ने अध्यक्षीय बयान के जरिये जिस संतुलित और परिपक्व कूटनीति का परिचय दिया, उसकी व्यापक चर्चा हो रही है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे परस्पर विरोधी पक्षों के बीच भारत ने ऐसा संतुलन साधने की कोशिश की जिसमें संवाद, कूटनीति, संप्रभुता, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता जैसे सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को जगह मिली। साथ ही भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से अलग से मुलाकात कर ऊर्जा कूटनीति को भी मजबूती दी। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने भी ईरानी नेतृत्व से अलग बातचीत कर भारत की सुरक्षा और सामरिक चिंताओं को प्रमुखता से उठाया। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य में भारत के करीब एक दर्जन जहाजों के फंसे होने और समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते खतरे को लेकर भारत ने गंभीर चिंता जताते हुए सुरक्षित और निर्बाध समुद्री आवाजाही की आवश्यकता पर जोर दिया।
हम आपको बता दें कि ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान नई दिल्ली एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में दिखाई दी। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेद, संयुक्त राष्ट्र सुधार, वैश्विक व्यापार व्यवस्था और बहुपक्षवाद जैसे मुद्दों पर भारत ने संतुलित और संयमित भूमिका निभाते हुए संवाद और कूटनीति को आगे बढ़ाने का संदेश दिया। वैसे ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की दो दिवसीय बैठक में पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी। विशेष रूप से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के अलग अलग रुख के कारण साझा बयान जारी करना कठिन हो गया। इसके बाद भारत ने अध्यक्षीय वक्तव्य जारी कर ऐसा संतुलित रुख अपनाने की कोशिश की जिसमें सभी पक्षों की चिंताओं को स्थान मिल सके। बयान में कहा गया कि सदस्य देशों ने पश्चिम एशिया की स्थिति पर अपने अपने राष्ट्रीय दृष्टिकोण साझा किए और संकट के शीघ्र समाधान, संवाद और कूटनीति, संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर जोर दिया। साथ ही अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में निर्बाध समुद्री व्यापार और आम नागरिकों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण बताया गया।
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देखा जाये तो भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित बनाए रखे। ईरान ने हाल के सप्ताहों में अमेरिका और इजराइल के हमलों की निंदा करते हुए ब्रिक्स की ओर से साझा बयान जारी करने की पहल भारत से करने का आग्रह किया था। दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात भी ब्रिक्स का सदस्य है और उसका रुख अलग है। भारत ने किसी भी पक्ष का खुला समर्थन करने से बचते हुए ऊर्जा ढांचे पर हमलों, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय अस्थिरता के वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई।
विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने बैठक के दौरान वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वर्तमान विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अब भी पुराने दौर की संरचना पर आधारित हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को अधिक प्रतिनिधित्व देने तथा स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया। जयशंकर ने कहा कि बहुपक्षवाद को प्रभावी बनाए रखने के लिए सुधार अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुका है।
उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों, आपूर्ति शृंखला की कमजोरियों, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ते दबाव तथा विकासशील देशों की आवश्यकताओं को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे में व्यापक सुधार जरूरी है। बहुपक्षीय विकास बैंकों को अधिक सक्षम और उत्तरदायी बनाने तथा विश्व व्यापार संगठन को निष्पक्ष और समावेशी बनाने की आवश्यकता पर भी उन्होंने बल दिया। जयशंकर ने कहा कि भारत का बहुपक्षवाद संवाद, सहयोग और मतभेदों को पाटने की भावना पर आधारित है।
उधर, ब्रिक्स बैठक के इतर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मुलाकात की। पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद यह भारत और ईरान के बीच पहली उच्चस्तरीय कूटनीतिक बातचीत मानी जा रही है। दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय हालात और द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की। इसके अलावा ईरानी विदेश मंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से भी लगभग नब्बे मिनट तक बातचीत की। दोनों पक्षों ने दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता बनाए रखने तथा तनाव कम करने के उपायों पर जोर दिया। इसके बाद, नई दिल्ली में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान से जुड़े किसी भी मुद्दे का सैन्य समाधान संभव नहीं है और हर समस्या का समाधान बातचीत के माध्यम से ही निकल सकता है। उन्होंने कहा कि ईरान ने कभी परमाणु हथियार बनाने की इच्छा नहीं जताई। साथ ही उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति को जटिल बताते हुए कहा कि वहां केवल बातचीत और समझौते के जरिए ही समाधान संभव है। अराघची ने यह भी कहा कि ईरान सभी जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए तैयार है।
इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से भी मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच यूक्रेन और पश्चिम एशिया की स्थिति सहित कई महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने सभी संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए भारत के समर्थन को दोहराया। उन्होंने रूस के साथ विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी में प्रगति पर संतोष व्यक्त किया। साथ ही विदेश मंत्री जयशंकर और लावरोव के बीच भी द्विपक्षीय वार्ता हुई जिसमें ऊर्जा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और संपर्क व्यवस्था सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई। लावरोव ने कहा कि रूस ब्रिक्स, संयुक्त राष्ट्र, शंघाई सहयोग संगठन और जी बीस जैसे मंचों पर भारत की प्राथमिकताओं का समर्थन करता है।
कुल मिलाकर देखें तो नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक ने यह संकेत दिया कि मौजूदा वैश्विक संकटों के बीच भारत संवाद, संतुलन और बहुपक्षीय सहयोग की नीति को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पश्चिम एशिया के संघर्ष, यूक्रेन संकट और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों पर भारत ने एक जिम्मेदार और मध्यस्थकारी शक्ति के रूप में अपनी छवि को और मजबूत किया है।
-नीरज कुमार दुबे
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