Prabhasakshi NewsRoom: Bangladesh Elections से पहले आये सर्वे में Jamaat-E-Islami को मिली बढ़त ने भारत की चिंता बढ़ाई

सर्वे बताता है कि कुल मत प्रतिशत में बीएनपी आगे है, पर जिन सीटों पर जीत लगभग तय मानी जा रही है वहां जमात के नेतृत्व वाला गठबंधन बढ़त बना रहा है। इस्लामी ताकतों को 105 सीट पर पक्की जीत मिल सकती है, जबकि बीएनपी गठबंधन को 101 सीट पर बढ़त है।
बांग्लादेश में 13वें संसदीय चुनाव से पहले सियासी माहौल चरम पर है और मतदान से दो दिन पहले आए सर्वे के नतीजे बेहद कड़ा मुकाबला दिखा रहे हैं। यह चुनाव शेख हसीना सरकार के पतन के बाद पहला आम चुनाव है, इसलिए इसके नतीजों पर पूरे दक्षिण एशिया की नजर है। हम आपको बता दें कि बांग्लादेश के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी के सर्वे के अनुसार तारिक रहमान के नेतृत्व वाला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी गठबंधन 44.1 प्रतिशत मत के साथ आगे दिख रहा है। वहीं जमात ए इस्लामी के नेतृत्व वाला 11 दल का गठबंधन 43.9 प्रतिशत मत पा सकता है। मत प्रतिशत का यह अंतर बहुत कम है, लेकिन सीट के स्तर पर तस्वीर और दिलचस्प है।
सर्वे बताता है कि कुल मत प्रतिशत में बीएनपी आगे है, पर जिन सीटों पर जीत लगभग तय मानी जा रही है वहां जमात के नेतृत्व वाला गठबंधन बढ़त बना रहा है। इस्लामी ताकतों को 105 सीट पर पक्की जीत मिल सकती है, जबकि बीएनपी गठबंधन को 101 सीट पर बढ़त है। करीब 75 सीटें ऐसी हैं जहां दोनों के बीच सीधा और कड़ा टकराव है।
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हम आपको बता दें कि बांग्लादेश की संसद में कुल 350 सीटें हैं। इनमें 300 सीटों पर सीधा चुनाव होता है। 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं जो 300 सीटों के नतीजों के अनुपात में दलों को मिलती हैं। सरकार बनाने के लिए 300 में से कम से कम 151 सीटों का साधारण बहुमत चाहिए।
वहीं एक अन्य सर्वे एमिनेंस एसोसिएट्स फॉर सोशल डेवलपमेंट ने जारी किया है। उसके अनुसार बीएनपी गठबंधन को साफ बढ़त मिल सकती है और वह करीब 208 सीट जीत सकता है। इस आकलन में जमात के नेतृत्व वाला गठबंधन 46 सीट, जातीय पार्टी 3 सीट, अन्य दल 4 सीट और निर्दलीय 17 सीट जीत सकते हैं। इसी सर्वे में मतदाता पसंद के स्तर पर बीएनपी को भारी समर्थन दिखा। 66.3 प्रतिशत मतदाता बीएनपी के पक्ष में दिखे, जबकि जमात ए इस्लामी को केवल 11.9 प्रतिशत समर्थन मिला। एनसीपी को 1.7 प्रतिशत समर्थन मिला।
उधर, इन नतीजों को भारत के लिए राहत और चिंता दोनों रूप में देखा जा रहा है। राहत इसलिए कि विश्लेषक मानते हैं कि बीएनपी अब वह उदार मध्यमार्गी जगह भरने की कोशिश कर रही है जो पहले अवामी लीग के पास थी। वहीं जमात ए इस्लामी का रुख खुले तौर पर भारत विरोधी माना जाता है और नई छात्र आधारित एनसीपी भी भारत पर सख्त रुख रखती है। बीएनपी ने खुला भारत विरोध नहीं अपनाया है, पर वह “बांग्लादेश पहले” की बात करती है और उसका नारा है “दोस्त हां, मालिक नहीं।” माना जा रहा है कि यदि बीएनपी सत्ता में आती है तो नई दिल्ली तारिक रहमान से रिश्ते सुधारने की कोशिश करेगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर से उनकी हाल की मुलाकात इसी दिशा का संकेत मानी जा रही है।
हम आपको बता दें कि बांग्लादेश में चुनाव प्रचार अपने अंतिम चरण में है। देश भर में रैली, घर घर संपर्क, माइक से प्रचार और रंगीन पोस्टर बैनर से माहौल गरम है। बांग्लादेश में 12 फरवरी को मतदान होगा और कानून के अनुसार मतदान से 48 घंटे पहले प्रचार थम जाएगा। यानी 10 फरवरी शाम 7.30 बजे प्रचार बंद होगा। मुख्य मुकाबला बीएनपी और जमात ए इस्लामी तथा एनसीपी के नेतृत्व वाले 11 दलों के समूह के बीच है। शेख हसीना की अवामी लीग फिलहाल निलंबित है और चुनाव लड़ने से रोकी गई है।
यह पूरा चुनाव शेख हसीना के सत्ता से हटने की पृष्ठभूमि में हो रहा है। हम आपको याद दिला दें कि अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बीच उन्हें देश छोड़ना पड़ा था। उसके बाद अंतरिम नेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश ने लंबे समय तक सियासी उथल पुथल, प्रदर्शन, हिंसा और सरकारी संपत्ति का नुकसान देखा था। हसीना सरकार के पतन और खास कर हिंदू समुदाय के खिलाफ घटनाओं के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव आया। भारत ने सुरक्षा चिंता का हवाला देकर बांग्लादेशी नागरिकों के पर्यटक वीजा पर रोक लगाई और चुनाव से पहले अपने राजनयिकों के परिवार को भी वापस बुला लिया।
तनाव का असर खेल जगत पर भी दिखा। पिछले महीने बांग्लादेश ने पुरुष टी20 विश्व कप से नाम वापस ले लिया जब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने उसके मैच भारत से हटाकर श्रीलंका ले जाने का अनुरोध नहीं माना।
बहरहाल, यदि जमात ए इस्लामी जैसे खुले भारत विरोधी तत्व मजबूत होते हैं तो भारत की पूर्वी सीमा पर नई परेशानी खड़ी हो सकती है। अवैध घुसपैठ, सीमा पार अपराध, कट्टरपंथ और अल्पसंख्यक पर दबाव जैसे मुद्दे फिर सिर उठा सकते हैं। बीएनपी की बढ़त राहत है, पर भारत को सख्त कूटनीतिक और समरिक सोच के साथ आगे बढ़ना होगा।
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