Vishwakhabram: Japan ने 75 साल पुरानी परम्परा तोड़ डाली, दुनिया के लिए खोल दिया अपने हथियारों का बाजार

जापान की रक्षा नीति में बदलाव के पीछे मुख्य कारण चीन की बढ़ती आक्रामकता और उत्तर कोरिया की उग्र सैन्य गतिविधियां मानी जा रही हैं। इन चुनौतियों ने जापान को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने और अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया है।
जापान ने अपनी परंपरागत शांति आधारित नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाते हुए अब अन्य देशों को घातक हथियार बेचने की अनुमति दे दी है। प्रधानमंत्री साने ताकाइची के नेतृत्व में लिया गया यह निर्णय न केवल जापान की सुरक्षा नीति में बड़े बदलाव का संकेत देता है, बल्कि एशिया प्रशांत क्षेत्र की सामरिक संरचना को भी गहराई से प्रभावित कर सकता है। हम आपको बता दें कि यह कदम द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने उस संवैधानिक ढांचे से स्पष्ट विचलन है, जिसमें जापान ने युद्ध और सैन्य आक्रामकता से दूरी बनाने की प्रतिज्ञा की थी।
द्वितीय विश्व युद्ध में पराजय के बाद जापान ने 1947 में एक नया संविधान अपनाया था, जिसे मुख्य रूप से अमेरिका के मार्गदर्शन में तैयार किया गया था। इस संविधान के अनुच्छेद 9 के तहत जापान ने युद्ध करने के अधिकार का त्याग कर दिया और स्वयं को एक शांतिवादी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। इससे पहले जापान बीसवीं सदी के पहले हिस्से में कई संघर्षों में उलझा रहा था, जिनमें 1905 का रूस जापान युद्ध और 1931 से 1945 तक चीन के साथ चला लंबा युद्ध शामिल है। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरने तथा टोक्यो पर भीषण बमबारी के बाद जापान ने आत्मसमर्पण किया और इसके बाद उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर हो गई थी।
इसे भी पढ़ें: North Korea Cluster Bomb Test | किम जोंग उन ने दागीं ऐसी मिसाइलें जो आसमान से बरसाएंगी तबाही! थर्राए अमेरिका और जापान!
1951 में जापान और अमेरिका के बीच सुरक्षा सहयोग संधि हुई और 1954 में जापान ने आत्म रक्षा बल की स्थापना की, जिसका उद्देश्य केवल देश की रक्षा तक सीमित था। इन बलों पर हथियारों और सैन्य गतिविधियों को लेकर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे।
हालांकि बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय हालात ने जापान को अपनी सुरक्षा नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। 2009 में सामूहिक आत्म रक्षा के अधिकार की पुनर्व्याख्या की गई, जिससे जापान को अपने सहयोगी देशों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाने की अनुमति मिली। 2015 में विदेशी सैन्य अभ्यासों में भागीदारी के नियमों को आसान किया गया। 2022 में जापान ने लंबी दूरी की मिसाइलों की खरीद कर प्रतिआक्रमण क्षमता विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
इसके साथ ही जापान ने रक्षा व्यय को भी तेजी से बढ़ाया है। 2024 में उसने जीडीपी के एक प्रतिशत की सीमा को समाप्त कर दिया और 2027 तक इसे दो प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। 2026 के बजट में जापान का रक्षा खर्च लगभग 52 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्षों की तुलना में बहुत बड़ी वृद्धि दर्शाता है। 2016 से 2025 के बीच जापान के रक्षा व्यय में लगभग 76 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
इस बदलाव के पीछे मुख्य कारण चीन की बढ़ती आक्रामकता और उत्तर कोरिया की उग्र सैन्य गतिविधियां मानी जा रही हैं। इन चुनौतियों ने जापान को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने और अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया है।
हम आपको बता दें कि जापान के पास अत्याधुनिक रक्षा तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाले हथियार प्रणालियां हैं। उसकी पनडुब्बियां, जैसे सोरयू और तैगेई वर्ग, दुनिया की सबसे उन्नत पनडुब्बियों में गिनी जाती हैं। माया वर्ग के युद्धपोत अत्याधुनिक तकनीक से लैस हैं, जबकि इजुमो वर्ग के हेलीकाप्टर विध्वंसक छोटे विमान वाहक के रूप में कार्य करते हैं। इसके अलावा जापान वायु रक्षा मिसाइल, तोप प्रणाली, जमीनी युद्ध वाहन और समुद्री गश्ती विमान भी बनाता है।
अब जब जापान ने हथियार निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को हटा दिया है, तो वह वैश्विक रक्षा बाजार में एक बड़ा खिलाड़ी बन सकता है। इससे उसके रक्षा उद्योग को नया बाजार मिलेगा और वह अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेगा। इस संदर्भ में भारत और जापान के संबंध विशेष महत्व रखते हैं। दोनों देश क्वॉड समूह के सदस्य हैं, जिसमें अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। यह समूह हिंद प्रशांत क्षेत्र को मुक्त, खुला और सुरक्षित बनाए रखने के उद्देश्य से कार्य करता है। भारत और जापान के बीच पहले से ही मजबूत सैन्य सहयोग है और दोनों देशों की तीनों सेनाएं नियमित अभ्यास करती हैं।
हाल के वर्षों में दोनों देशों ने रक्षा तकनीक के सह विकास और सह उत्पादन पर भी जोर दिया है। 2024 में भारत ने जापान के साथ यूनिकॉर्न नामक उन्नत रेडार और संचार प्रणाली के लिए समझौता किया, जो युद्धपोतों की पहचान क्षमता को कम करती है। इसके अलावा छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान परियोजना में भारत की भागीदारी पर भी चर्चा चल रही है। इसके अलावा, भारत जापान के साथ मिलकर जेट इंजन विकसित करने की संभावना भी तलाश रहा है। भारतीय नौसेना जापान के यूएस 2 उभयचर विमान में भी रुचि दिखा चुकी है। दोनों देशों के बीच अगस्त 2025 में सुरक्षा सहयोग पर संयुक्त घोषणा भी हुई, जिसमें रक्षा उत्पादन और क्षमता निर्माण में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।
भारत की तेजी से बढ़ती रक्षा निर्माण क्षमता भी जापान के लिए अवसर लेकर आई है। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों के तहत भारत ने रक्षा उत्पादन में महत्वपूर्ण प्रगति की है। भारत अब चिनूक, अपाचे, एफ 18, एफ 16 और सी 130 जैसे विमानों के लिए संरचनात्मक भाग बना रहा है। निजी क्षेत्र भी सक्रिय रूप से हथियार प्रणाली बना रहा है, जिनका उपयोग वास्तविक संघर्षों में हो रहा है। इस स्थिति में जापानी कंपनियां भारत में उत्पादन कर वैश्विक बाजार में अपने उत्पाद बेच सकती हैं। इससे दोनों देशों को आर्थिक और सामरिक लाभ मिलेगा।
सामरिक दृष्टि से देखा जाये तो जापान का यह कदम एशिया प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगा। इससे चीन के प्रभाव को चुनौती मिल सकती है और क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में नई प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो सकती है। साथ ही, यह कदम अमेरिका के साथ जापान के सुरक्षा संबंधों को भी और मजबूत करेगा। वहीं भारत के लिए यह अवसर है कि वह जापान के साथ अपने रक्षा सहयोग को और गहरा करे और नई तकनीकों तक पहुंच बनाए। इससे भारत की सैन्य क्षमता में वृद्धि होगी और वह क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को और मजबूत कर सकेगा।
बहरहाल, जापान का यह निर्णय केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं है, बल्कि वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परिवर्तन का संकेत है, जिसके दूरगामी प्रभाव आने वाले वर्षों में स्पष्ट रूप से दिखाई देंगे।
-नीरज कुमार दुबे
अन्य न्यूज़















