भारत-चीन का नाम लेकर रूस का ऐलान, हिला अमेरिका!

लावरोव बताते हैं कि क्लिंटन ने उस वक्त एक ऐसी आवाज निकाली जिसे आम भाषा में झिझक या अनसुना कह सकते हैं। लावरोव का तर्क है कि पश्चिम कभी रूस को एक बराबर का खिलाड़ी नहीं मानना चाहता है।
रूसी विदेश मंत्री सरगई लावो ने एक ऐसा खुलासा किया है जिसने वाशिंगटन से लेकर मॉस्को तक हलचल मचा दी है। लावरोव ने उस पल का जिक्र किया जब रूस ने खुद हाथ बढ़ाकर नाटो का हिस्सा बनने की इच्छा जताई थी। आखिर अमेरिका ने रूस को गले लगाने से क्यों मना किया और आज दशकों बाद वही रूस क्यों कह रहा है कि भारत, चीन और ब्राजील जैसे दिग्गज अब दुनिया की नई किस्मत लिख रहे हैं। दरअसल लावरोव ने अपने हालिया इंटरव्यू में उस ऐतिहासिक लम्हे को याद किया जब पुतिन ने क्लिंटन से कहा था कि अगर शीत युद्ध खत्म हो गया सोवियत संघ नहीं रहा तो फिर दूरियां क्यों हमें नाटो में क्यों नहीं लेते। लावरोव बताते हैं कि क्लिंटन ने उस वक्त एक ऐसी आवाज निकाली जिसे आम भाषा में झिझक या अनसुना कह सकते हैं। लावरोव का तर्क है कि पश्चिम कभी रूस को एक बराबर का खिलाड़ी नहीं मानना चाहता है। वे चाहते थे कि रूस एक कंट्रोलोल्ड पार्टनर बनकर रहे जो बस पश्चिम के आदेशों का पालन करें। यही वह मोड़ था जहां से आधुनिक दुश्मनी की नींव पड़ी।
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खबर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अब आता है। लावरोव ने खुलकर कहा कि हम एक ऐसी युग बदलने वाली घटना के गवाह बन रहे हैं जो शायद सदियों में एक बार होती है। लावरोव के अनुसार भारत, चीन और ब्राजील की आर्थिक और राजनीतिक ताकत अब मल्टीपोलर रियलिटी बन चुकी है। अब भारत, चीन और ब्राजील के युग की बात करें तो सबसे पहले नाम आता है भारत के पावर का। लावरोव का भारत का नाम लेना बहुत महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि रूस अब पूरी तरह से ग्लोबल साउथ पर निर्भर है। भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और तेजी से बढ़ती जीडीपी ने पश्चिम के एकाधिकार को चुनौती दी है। चीन भी पीछे नहीं है। चीन की शक्ति की बात करें तो बीजिंग अब वाशिंगटन के सामने एक दीवार बनकर खड़ा है। ब्राजील की बात करें तो ब्राजील की भूमिका लैटिन अमेरिका में ब्राजील अब एक स्वतंत्र रूप में उभर रहा है। यानी लावो का साफ कहना है कि पश्चिम अब भी पुरानी मानसिकता में जी रहा है। वे दुनिया को अपने चश्मे से देखना चाहते हैं। लेकिन अब पैसा और पावर दोनों एशिया और दक्षिण अमेरिका की तरफ शिफ्ट हो चुके हैं। लावरो ने याद दिलाया कि रूस ने बार-बार यूरोप को समझाने की कोशिश की कि उनका इरादा हमला करना नहीं है।
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22 जुलाई और 12 जुलाई को रूसी अधिकारियों ब्लादिस लाओ, मस्लेनिको और खुद लावरोम ने संदेश दिया कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं। लेकिन नेशनल इंटरेस्ट सबसे ऊपर होगा। रूस अब जूनियर पार्टनर बनकर मेज पर नहीं बैठेगा। अब भारत के लिए इसके क्या मायने हैं? यह समझना जरूरी है और यह समझना जरूरी है कि लावरूप का यह बयान भारत को वैश्विक राजनीति के सेंटर स्टेज पर खड़ा करता है। रूस जानता है कि पश्चिम की घेराबंदी को तोड़ने के लिए उसे भारत जैसे विश्वसनीय दोष की जरूरत है। भारत अब केवल एक बाजार नहीं बल्कि एक ऐसा देश है जो मॉस्को और वाशिंगटन के बीच संतुलन बना सके। लावरोव का बयान भारत की बढ़ती सॉफ्ट और हार्ड पावर का एक ग्लोबल समूह है। तो क्या क्लिंटन ने उस वक्त रूस को ठुकराकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली थी?
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