CPEC & Gwadar Exposed | कैसे भारत की पश्चिमी सीमा पर पहुंचा चीन! | Teh Tak Part 2

प्रोजेक्ट के जरिए चीन पाकिस्तान में आधुनिक सड़कें, हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क, ऑप्टिकल फाइबर और रणनीतिक तेल-गैस पाइपलाइनें बिछाने के लिए भारी-भरकम कर्ज मुहैया करा रहा है। कहने को यह दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक समृद्धि की साझेदारी है, लेकिन असल में यह बीजिंग की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जिसे अपनी कम्युनिस्ट क्रांति के 100 साल पूरे होने यानी साल 2049 तक मुकम्मल करने का लक्ष्य तय किया गया है।
चीन का मकसद बेल्ट एंड रोड परियोजना के जरिये पूरी दुनिया को चीन से जोड़ने का है। इसके लिए वो कई देशों में भारी मात्रा में निवेश कर रहा है। सीपीईसी प्रोजेक्ट के तहत चीन सड़क, रेलवे और ऊर्जा पाइपलाइन बिछाने के लिए पाकिस्तान को बड़े पैमाने पर लोन दे रहा है। इस परियोजना को साल 2049 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस पूरे वैश्विक नेटवर्क का सबसे अहम और रणनीतिक मुकुट है—चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, यानी CPEC। करीब 3,000 किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर चीन के शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान के रास्ते सीधे अरब सागर से जोड़ता है। इस प्रोजेक्ट के जरिए चीन पाकिस्तान में आधुनिक सड़कें, हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क, ऑप्टिकल फाइबर और रणनीतिक तेल-गैस पाइपलाइनें बिछाने के लिए भारी-भरकम कर्ज मुहैया करा रहा है। कहने को यह दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक समृद्धि की साझेदारी है, लेकिन असल में यह बीजिंग की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जिसे अपनी कम्युनिस्ट क्रांति के 100 साल पूरे होने यानी साल 2049 तक मुकम्मल करने का लक्ष्य तय किया गया है।
कश्मीर से अरब सागर तक CPEC और ग्वादर का जाल
चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) का मुख्य ज़मीनी-से-समुद्री मार्ग है। शिनजियांग के काशगर से बलूचिस्तान में गहरे समुद्र वाले ग्वादर बंदरगाह तक फैले इस कॉरिडोर से पश्चिमी चीन (जो चारों तरफ़ ज़मीन से घिरा है) सीधे अरब सागर से जुड़ जाता है। CPEC खुंजेराब दर्रे से पाकिस्तान में प्रवेश करता है और पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुज़रता है। यह विवादित रास्ता सीमा से जुड़े आम संवेदनशील मुद्दों को दरकिनार करता है और चीन को काराकोरम हाईवे से सटा हुआ ज़मीनी परिवहन का सीधा रास्ता देता है। ट्रांज़िट स्पाइन (मुख्य मार्ग): यह कॉरिडोर एक्सप्रेसवे, माल-ढुलाई लाइनों और पावर-ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर के ज़रिए खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब और सिंध के ट्रांसपोर्ट नेटवर्क से गुज़रता है और अंदरूनी इलाकों के मुख्य केंद्रों को सीधे दक्षिणी तटों से जोड़ता है। दक्षिणी सिरा (ग्वादर): बलूचिस्तान में फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित ग्वादर बंदरगाह एक रणनीतिक केंद्र के तौर पर काम करता है, जहाँ ज़मीनी व्यापार खत्म होता है और अरब सागर के समुद्री रास्ते शुरू होते हैं।
ग्वादर में चीन का अतिक्रमण और पाक सरकार के अत्याचार
ग्वादर बंदरगाह 60 अरब डॉलर की चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना (सीपीईसी) का अहम हिस्सा है। ग्वादर बंदरगाह का उद्धाटन सबसे पहले 2002 में हुआ था। जब इसे चीन और पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) परियोजना का हिस्सा बनाया गया। तब फिर से इसका उद्घाटन हुआ। ग्वादर के लोगों से वादा किया गया था कि इस परियोजना से उनकी और पाकिस्तान की जनता की जिंदगी बदल जाएगी। लेकिन वर्तमान दौर में आलम ये है कि यहां पानी और बिजली की भारी किल्लत हो गई है और अवैध मछली पकड़ने से आजीविका पर खतरा आ गया है। जिसकी वजह से यहां के लोगों का जीना मुश्किल हो गया है।
अरब सागर में चीन का दोहरे इस्तेमाल वाला ठिकाना
सरकारी कंपनी 'चाइना ओवरसीज़ पोर्ट होल्डिंग कंपनी' (COPHC) द्वारा 40 साल की लीज़ पर चलाए जा रहे ग्वादर में आम नागरिकों के लिए सामान की आवाजाही बहुत कम रही है। इसकी असली अहमियत रणनीतिक है: यहाँ गहरे पानी वाले बर्थ, खास तरह के ब्रेकवाटर और एक आधुनिक एयरपोर्ट है, जो मिलिट्री लॉजिस्टिक्स और समुद्री सप्लाई में मदद करने के लिए बनाए गए हैं। कराची से सिर्फ़ 400 किमी दूर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास स्थित ग्वादर में PLA नेवी (PLAN) की मौजूदगी से चीन के युद्धपोत, परमाणु पनडुब्बियाँ और निगरानी करने वाले साधन सीधे मुंबई और कारवार में भारत के पश्चिमी नौसेना कमान के सामने आ जाते हैं। ग्वादर इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और एकोस्टिक मॉनिटरिंग नोड के तौर पर काम करता है। चीन उत्तरी अरब सागर में आने वाले भारतीय नौसैनिक जहाजों को ट्रैक कर सकता है, फारस की खाड़ी से होने वाले समुद्री ट्रैफिक पर नज़र रख सकता है, और भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए ज़रूरी समुद्री संचार मार्गों (SLOCs) को चुनौती दे सकता है। यह पोर्ट हैनान या जिबूती से दूर काम करने वाली PLAN पनडुब्बियों के लिए एक सुरक्षित विदेशी ठिकाना देता है। पाकिस्तान द्वारा चीनी हैंगोर-क्लास (टाइप 039B) पनडुब्बियाँ हासिल करने के साथ मिलकर, ग्वादर ऐसी अंडरवाटर ऑपरेशन क्षमता देता है जिससे भारत के पनडुब्बी-रोधी युद्ध साधनों को उलझाए रखा जा सके।
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