US Dollar का दबदबा हमेशा नहीं रहेगा, प्रोफेसर बैरी आइशेनग्रीन की पुस्तक में ऐतिहासिक विश्लेषण

प्रोफेसर बैरी आइशेनग्रीन की नई पुस्तक 'मनी बियॉन्ड बॉर्डर्स' में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व और उसके इतिहास का विश्लेषण किया गया है। लेखक के अनुसार इतिहास संकेत देता है कि किसी भी मुद्रा का अंतरराष्ट्रीय दर्जा हमेशा नहीं रहता है। हालांकि वर्तमान में यूरो या चीन की रेनमिंबी जैसी कोई भी मुद्रा डॉलर का स्थान लेने की स्थिति में नहीं है।
(जॉन हॉकिन्स, कैनबरा विश्वविद्यालय) कैनबरा, 31 जुलाई (द कन्वरसेशन) कुछ मानकों के अनुसार चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका को पहले ही पीछे छोड़ चुका है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था एवं व्यापार में अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व अब भी बरकरार है। यह स्थिति कब तक बनी रहेगी? बैरी आइशेनग्रीन की नयी पुस्तक ‘मनी बियॉन्ड बॉर्डर्स’ इतिहास के जरिये इस सवाल का जवाब तलाशती है। आइशेनग्रीन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान के प्रतिष्ठित प्रोफेसर हैं और इस विषय पर पुस्तक लिखने के लिए पूरी तरह योग्य हैं।
प्राचीन यूनान से चला आ रहा है सिक्कों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार
अतीत में भी अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में आम तौर पर किसी एक मुद्रा का वर्चस्व रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से यह स्थान अमेरिकी डॉलर के पास है। आइशेनग्रीन ने अपनी पुस्तक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल हुए शुरुआती सिक्कों के इतिहास का अध्ययन किया है। इनमें एथेंस के ‘आउल’ सिक्के शामिल भी हैं। इन सिक्कों का वजन, शुद्धता और डिजाइन सदियों तक एक जैसा रहा जिससे मुद्रा में लोगों का भरोसा बढ़ा। रोमन साम्राज्य की मुद्रा ‘डिनेरियस’ का इस्तेमाल विशाल रोमन साम्राज्य के बाहर भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में होता था। रोमन साम्राज्य का विस्तार करीब 117 ईस्वी में अपने चरम पर पहुंचा था। इसके बाद पांचवीं शताब्दी ईस्वी तक बाइजेंटाइन साम्राज्य के सोने के सिक्के ‘सॉलिडस’ का इस्तेमाल ब्रिटेन से भारत तक व्यापार में किया जाता था। यूरोप के पुनर्जागरण काल में फ्लोरेंस के यूरोपीय बैंकिंग और वित्तीय केंद्र बनने के साथ वहां का सोने का सिक्का ‘फ्लोरिन’ प्रमुख मुद्रा बन गया। स्पेन की मुद्रा ‘पीसेज ऑफ एट’ पहली वास्तविक वैश्विक मुद्रा बनी। इसके आठ सिक्कों से एक पेसो बनता था इसलिए इन्हें ‘पीसेज ऑफ एट’ कहा जाता था। बाद में एम्स्टर्डम के वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार का केंद्र बनने और डच ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तार के साथ डच गिल्डर का प्रभाव बढ़ा। ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार और लंदन के वित्तीय केंद्र के रूप में उभरने के साथ 18वीं शताब्दी में ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग ने यह भूमिका संभाल ली। इन मुद्राओं को जारी करने वाले देशों में कुछ समान विशेषताएं थीं जिनसे विदेशी व्यापारियों का उनके सिक्कों में भरोसा बढ़ता था। ये देश आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े केंद्र, राजनीतिक रूप से स्थिर और आर्थिक रूप से विकसित थे तथा अक्सर इनके उपनिवेश भी थे।
वैश्विक मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर का उदय
आइशेनग्रीन बताते हैं कि 1913 में अमेरिका के केंद्रीय बैंक की स्थापना, अमेरिकी अर्थव्यवस्था के विस्तार और प्रथम विश्व युद्ध से ब्रिटेन के कमजोर पड़ने के बाद अमेरिकी डॉलर का अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल बढ़ा। मित्र राष्ट्रों ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था की योजना बनाने के लिए 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स में बैठक की। वे अप्रत्यक्ष स्वर्ण मानक पर सहमत हुए। सोने की कीमत अमेरिकी डॉलर में तय की गयी और अन्य मुद्राओं की विनिमय दर डॉलर से जोड़ दी गयी। इससे प्रमुख मुद्रा के रूप में डॉलर की भूमिका और मजबूत हुई। विदेशी मुद्रा बाजार में अब करीब 90 प्रतिशत लेनदेन अमेरिकी डॉलर में होता है। दुनिया के केंद्रीय बैंकों के अंतरराष्ट्रीय भंडार का बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर की संपत्तियों के रूप में है। वैश्विक व्यापार के करीब 40 प्रतिशत हिस्से में भुगतान के बिल अमेरिकी डॉलर में बनाए जाते हैं।
अमेरिकी डॉलर को मिला है ‘असाधारण विशेषाधिकार’
मेरिकी डॉलर की इस खास स्थिति को ‘असाधारण विशेषाधिकार’ कहा जाता है। इस विशेष स्थिति के कारण अमेरिकी डॉलर में जारी बॉन्ड की वैश्विक मांग बढ़ती है। इससे अमेरिकी सरकार और कंपनियों को कम ब्याज दरों पर कर्ज लेने में मदद मिलती है। अमेरिकी डॉलर की अधिक मांग से डॉलर आम तौर पर मजबूत होता है। आयातित वस्तुएं खरीदने या विदेश यात्रा करने वाले अमेरिकियों के लिए यह अच्छी बात है लेकिन इससे अमेरिकी निर्यात महंगा और कम प्रतिस्पर्धी हो जाता है। कई देशों में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। आइशेनग्रीन के अनुसार 2022 में यूक्रेन पर हमला करने के बाद रूस को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से बाहर किए जाने से ‘‘डॉलर पर निर्भरता को लेकर दुनिया भर में नये सिरे से विचार शुरू हुआ।’’ प्रमुख मुद्राओं का जीवन चक्र आइशेनग्रीन बताते हैं कि ‘‘अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का दर्जा हमेशा नहीं रहता।’’ हालांकि इतिहास में मुद्राओं ने अपना दर्जा लंबे समय तक, यहां तक कि सदियों तक बनाए रखा है और यह स्थिति तब भी बनी रही जब मुद्रा जारी करने वाला देश दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्ति नहीं रहा। आइशेनग्रीन का निष्कर्ष है कि ‘‘कोई अन्य मुद्रा डॉलर की जगह लेने की स्थिति में अभी नहीं है।’’ यूरो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरी सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली मुद्रा है लेकिन वह डॉलर से काफी पीछे है। चीन की मुद्रा रेनमिंबी इससे भी काफी पीछे है क्योंकि चीन सरकार देश के अंदर और बाहर पूंजी के आवागमन पर नियंत्रण रखती है। निजी रूप से जारी कोई भी क्रिप्टोकरेंसी वास्तव में मुद्रा के रूप में काम नहीं करती। सबसे प्रसिद्ध क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन की कीमत ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में पिछले एक वर्ष के दौरान आधी हो चुकी है। आइशेनग्रीन की पुस्तक एक प्रतिष्ठित विशेषज्ञ का बड़ा अकादमिक प्रयास है जो अपना पक्ष भरोसेमंद ढंग से रखती है। आर्थिक मामलों के पत्रकार मार्टिन वुल्फ ने इसे 2026 में अब तक प्रकाशित अर्थशास्त्र की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों में से एक बताया है लेकिन पुस्तक की थोड़ी नीरस है और 300 से अधिक पृष्ठों में कोई ग्राफ, नक्शा या चित्र नहीं है।
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