घोड़ा मंडी में सर्वप्रजाती बैठक (व्यंग्य)

घोड़ा मंडी में सर्वप्रजाती बैठक (व्यंग्य)

''घोड़ों का ये अपमान, नहीं सहेगा हिन्दुस्तान''। अचानक हवा में नारों भरी हिनहिनाहट गूंजने लगी। विदेशी घोड़े चमत्कृत। विदेश से ही आए मस्टंग प्रजाति का घोड़ा बोला-''हिन्दुस्तानी घोड़ों की एकता देखकर अच्छा लग रहा है। लेकिन सिर्फ नारों से कोई लड़ाई नहीं जीती गई।

घोड़ा मंडी में जबर्दस्त शोर था। देश-विदेश से अलग-अलग प्रजातियों के घोड़े घोड़ामंडी में पहुंच रहे थे। पर्चेरॉन, एप्पालूसा, फ्रीजियन, मस्टंग, हाफलिंगर, अंडालूसीयन, लिपीजेन, फलाबेला, शीर, मॉ़र्गन, शेटलैंड, डचवार्म, लुसिटानो, अखाल टैके, कॉनिक, कॉब, अरबी, ट्राकेहनेर, पासो फिनो, ओल्डनबर्ग, फिनहॉर्स और पासो फिनो समेत घोड़ों की अलग अलग प्रजातियां कमर पर झंडा-बैनर बांधे आपात बैठक में पहुंची थीं। बैठक का आयोजन मुख्य रुप से हिन्दुस्तानी घोड़ों ने किया था। इनमें भी महाराष्ट्र के घोड़ों ने विशेष पहल की थी। एजेंडा था घोड़ों को बदनाम करने की साजिश के खिलाफ घोड़ा आंदोलन छेड़ना।

'देखिए, घोड़ों को बदनाम करने की पूरी साजिश हिन्दुस्तानी राजनीति और मीडिया में हो रही है। हमें बिकाऊ-दलाल वगैरह कहा जा रहा है। हमारा किसी थर्ड पार्टी से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन हमें बेवजह इंसान अपनी घटिया राजनीति में खींच रहे हैं। जो भ्रष्ट है, वो घोड़ा है, कुछ इस तरह की बातें लिखी जा रही हैं। हमें अब विरोध करना ही होगा।' विदेश से आए एप्पालूसा प्रजाति के घोड़े ने शालीनता से अपनी बात रखी।

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'घोड़ों का ये अपमान, नहीं सहेगा हिन्दुस्तान'। अचानक हवा में नारों भरी हिनहिनाहट गूंजने लगी। विदेशी घोड़े चमत्कृत। विदेश से ही आए मस्टंग प्रजाति का घोड़ा बोला-'हिन्दुस्तानी घोड़ों की एकता देखकर अच्छा लग रहा है। लेकिन सिर्फ नारों से कोई लड़ाई नहीं जीती गई। हमारे पास ठोस रणनीति होनी चाहिए।'

'अच्छा, तो हम उन्हें घर में घुसकर मारते हैं। विधानसभा या लोकसभा पर हमला बोल देते हैं। एक साथ दस हजार घोड़े हमला बोलेंगे तो नेताओं के तोते उड़ जाएंगे। उन्हें समझ आ जाएगा कि घोड़ों की घोड़ाई अस्मिता से छेड़छाड़ का मतलब क्या होता है। चलिए-सीधे ठुकाई करने चलते हैं।' अरबी नस्ल के इस घोड़े के बाप दादा ने पानीपत के द्वितीय युद्ध में हेमू की तरफ से लड़ाई लड़ी थी। इसके तेवर भी हेमू जैसे थे।

'अरे रुको। लड़ाई से हल नहीं निकलेगा। हमें ऐसी रणनीति बनानी होगी, जिससे नेतागण अपनी राजनीति में घोड़ों को बेवजह खींचना बंद कर दें। उन्हें दो कौड़ी में बिकना हो तो दो कौड़ा में बिकें और दो लाख डॉलर में बिकना हो तो वैसे बिकें। लेकिन हमें बख्श दें। लड़ाई लड़ने से मामला आर-पार का हो जाएगा।' इस बार पर्चेरॉन प्रजाति का घोड़ा बोला।

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'सही कह रहे हो पर्चेरॉन। नेता और मीडिया-दोनों का भरोसा नहीं, कब-कैसे ठिकाने लगा दे। सोच समझकर ही कार्ययोजना बनानी होगी। मेरा सुझाव है कि हम एक अपील जारी कर दें।' वरिष्ठ मस्टंग ने सुझाव दिया।

'क्या कह रहे हैं आप। सिर्फ अपील। अरे नेताओं और मीडिया के लोगों को चार दुलल्ती दे दो-सब ठीक हो जाएंगे। इन्हें कोई पिटता ही नहीं, इसलिए सिर पर चढ़ गए हैं।' अरबी नस्ल का वही घोड़ा चिल्लाया, जिसके बाप दादा पानीपत की लड़ाई में शहीद हुए थे।

अब बहुत देर से कोने में बैठा एक बुजुर्ग घोड़ा उठा, जो बैठक की अध्यक्षता भी कर रहा था। उसने कई साल से हिन्दुस्तानी राजनीति को देखा-समझा था। बोला-'युवा घोड़ों में गुस्सा है, ये अच्छा है। लेकिन ये ऊर्जा डर्बी दौड़ में दिखाइए। रेसकोर्स में दिखाइए। पोलो के खेल में दिखाइए। सेना में विरोधियों के खिलाफ दिखाइए। नेता और मीडिया के खिलाफ मत दिखाइए।'

'फिर क्या करें' ? एक घोड़ा बोला।

बुजुर्ग घोड़ा बोला-'वही, जो विरोध में रेगुलरली किया जाता है। एक खुला खत लिखा जाए। राष्ट्रपति को एक ज्ञापन दे देते हैं। इंटरनेट पर एक सिग्नेचर कैंपेन शुरु करें युवा घोड़े। दिल्ली पहुंचकर जंतर-मंतर पर एक शाम प्रदर्शन भी कर सकते हैं।'

'बस'??? आस्ट्रेलिया से आया घोड़ा बोला।

अध्यक्ष की सीट पर बैठा घोड़ा बोला- 'हम घोड़े हैं। हमारा चरित्र घोड़े का है। मालिकों के प्रति आस्था के हमारे गुण को इन लोगों ने गाली बनाकर रख दिया है। हॉर्स ट्रेडिंग अब एक गाली है। लेकिन याद रखिए इंसान एक साथ बंदर, कुत्ता, सांप, गिरगिट, घोड़ा, गधा, उल्लू, मगरमच्छ सब हो सकता है। वो किसी भी हद तक गिर सकता है। और यदि इंसानों में भी राजनेताओं से पंगा लेने की सोच रहे हो तो वो तो ऐसी प्रजाति है, जो घोड़े को गधा साबित कर सकती है। नेताओं से पंगा ठीक नहीं।' 

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'फिर करें तो क्या करें। हम कहां कहां से यहां आए हैं।' एक युवा घोड़ा बोला।

'कुछ नहीं। आप लोग हिन्दुस्तान आए हैं। ताजमहल घूमिए। लाल किला देखिए। तफरीह कीजिए। सेल्फी लीजिए। बाकी-हमारे युवा घोड़े इसलिए खफा है कि इन दिनों में महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ, उससे घोड़ों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। ये देश में हर साल दो साल में चलता रहता है। घोड़ों को भी नेताओं की हरकत का ज्यादा लोड नहीं लेना चाहिए। इन दिनों देश की जनता, जो उन्हें वोट देकर चुनती है, वो भी उनका ज्यादा लोड नहीं ले रही।' वरिष्ठ घोड़े ने एक झटके में ऐसी बात कह दी, जिसके बाद घोड़े खुशी में हिनहिनाते हुए बैठक से बाहर निकल गए।

- पीयूष पांडे