कोरोना काल में सारे त्योहार फीके जा रहे हैं (व्यंग्य)

coronavirus
खैर भूत-भविष्य को छोड़ वर्तमान में लौटें तो अनलॉक के मौजूदा दौर में लॉकडाउन से जुड़ा सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है। इन दिनों चाहे जिस तरफ निकल जाइए... एक ही सवाल सुनने को मिलता है... क्या गुरू, फिर लॉकडाउन?

जो बीत गई उसकी क्या बात करें। लेकिन जो बीत रही है उसे अनदेखा भी कैसे और कब तक करें। ऐसा डरा-सहमा सावन जीवन में पहली बार देखा लोग पूछते हैं... क्या कोरोना काल में इस बार रक्षाबंधन और गणेशोत्सव भी फीके ही रह जाएंगे। यहां तक कि खतरनाक वायरस की अपशकुनी काली छाया महापर्व दशहरा और दीपोत्सव पर भी मंडराती रहेगी।

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खैर भूत-भविष्य को छोड़ वर्तमान में लौटें तो अनलॉक के मौजूदा दौर में लॉकडाउन से जुड़ा सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है। इन दिनों चाहे जिस तरफ निकल जाइए... एक ही सवाल सुनने को मिलता है... क्या गुरू, फिर लॉकडाउन? यह सवाल खरीदार, मजदूर, मरीज, कामगार और छात्रों को जितना परेशान कर रहा है, उतना ही दुकानदार, व्यवसायी, शिक्षक और रोज कमा कर खाने वालों को भी। लॉकडाउन का सवाल लाख टके का हो चुका है। हर कोई इसका जवाब फौरन चाहता है, लेकिन जटिल और पेचीदिगियां किसी को आश्वस्त नहीं होने दे रही। लॉकडाउन पर समाज की अलग-अलग राय है। एक वर्ग वायरस संक्रमण रोकने के लिए लॉकडाउन को ही एकमात्र कारगर उपाय मानता है तो दूसरे वर्ग की दलील है कि दोबारा लॉकडाउन रोज कमा कर खाने वालों को भुखमरी की ओर धकेल देगा। नया बाजार से नीमपुरा तक खतरनाक बीमारी के साथ लॉकडाउन की ही चर्चा है। इसमें दिलचस्पी इसके समर्थक और विरोधी दोनों की है। रेल फाटक चौराहा पर गर्म चाय की घुंट गले में उतार रहे कुछ लोग आपसी बातचीत में व्यस्त हैं। चाय सुड़कते हुए एक बोला... का हो... फिर झांप गिरेगा का? दूसरे का उसी अंदाज में जवाब था... इसके सिवा और उपाय भी क्या है?? देख नहीं रहा केस कैसे उछल-उछल कर बढ़ रहा है!! खैनी में चूना मसलते हुए एक अन्य ने कहा... देखो शायद जल्दी ही कुछ एनाउंसमेंट होगा...! लेकिन इससे मर्ज कंट्रोल हो जाएगा, इसकी कोई गारंटी है?? कई जगह खत्म होकर ये फिर लौटा है... चाय का अंतिम घुंट गले में उतारने के बाद कप डस्टबिन में फेंकते हुए एक ने दलील दी।

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भीड़ भरे बाजार में फुटपाथ पर दुकान करने वालों का तो मानो यक्ष प्रश्न ही था... क्या भइया, फिर लॉकडाउन होगा क्या, सवाल पूछने वालों का बिन मांगा जवाब भी मौजूद था... क्या मरण है बोलिए तो, ए साल धंधा- पानी सब चौपट , क्या होगा भगवान जाने...!! महामारी के इस दौर में बुजुर्गों का अपना ही दर्द महसूस हुआ। जिसकी ओर हमारा ध्यान कम ही जाता है। थाने के नजदीक व्यस्ततम चौराहे के पास दो बुजुर्ग आहिस्ता-आहिस्ता बातचीत कर रहे हैं... क्यों इस खतरनाक रोग की कोई वैक्सीन ईजाद हुई... दूसरे ने निराश स्वर में जवाब दिया... अभी तक तो नहीं...!! 

- तारकेश कुमार ओझा

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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