लोकतंत्र का स्वादिष्ट हलवा और रंगीन जलवा (व्यंग्य)

लोकतंत्र का स्वादिष्ट हलवा और रंगीन जलवा (व्यंग्य)

पहले एक बार में ही सैंकड़ों को जलवा दिखा दिया जाता था अब सिर्फ पांच को दिखा सकते हैं। लेकिन इससे जलवे की कीमत कम नहीं हुई बस थोड़ी मेहनत ज़्यादा करनी पड़ेगी। मेहनती तो हम खूब हैं ही। जलवा अनेक बार हलवे की तरह स्वाद देता है।

बाबा नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता है, ‘लोकतंत्र के मुंह पर ताला, बैठ गया है अफसर आला, पगलों से पड़ता था पाला, कहीं दाल में पानी पानी, कहीं दाल में काला काला’। इस कविता को बार बार दफनाने की कोशिश होती है लेकिन इसमें इतनी खरी सच्चाई की ताक़त है कि जीवित रहती है। नौकरशाही का जलवा हसीनों के जलवे की तरह है, कोई इससे बच नहीं सकता। वैसे तो गूगल, फेकबुक माफ कीजिए फेसबुक और व्हत्सएप व इनके यारों दोस्तों से भी बचना संभव नहीं। पहले एक बार में ही सैंकड़ों को जलवा दिखा दिया जाता था अब सिर्फ पांच को दिखा सकते हैं। लेकिन इससे जलवे की कीमत कम नहीं हुई बस थोड़ी मेहनत ज़्यादा करनी पड़ेगी। मेहनती तो हम खूब हैं ही। जलवा अनेक बार हलवे की तरह स्वाद देता है। नेता चुनाव जीत जाए और मंत्री बन जाए तो उनका जलवा चहुं ओर बरसात के पानी की तरह फैल जाता है। उन्हें पाँच साल बाद विपक्ष में बैठना पड़ जाए तो किसी और का फैला हुआ जलवा उन्हें बेस्वाद रायता लगने लगता है। अपनी आँखों के सामने वही गुस्ताखियाँ हो रही होती हैं जो उन्होंने की होती हैं मगर अब सुहाती नहीं मन ही मन कुढ़ते रहते हैं काश अपने पावरफुल जमाने में थोड़ी ज़्यादा कर ली होती। 

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खबरों में रहने के लिए इन्हें बहुत स्वादिष्ट पकाना पड़ता है। पूर्व सरकार के दौरान अपने नेताओं के खिलाफ जांच में अनियमितताएं सामने आने पर विजिलेंस विभाग चालान तैयार कर कोर्ट में पेश कर चुका होता है लेकिन सत्ता बदलने पर इन मामलों को राजनीतिक से प्रेरित बताकर वापिस लेना पड़ता है। इस तरह कितनी गहन व महंगी जांचें क़ुर्बान कर दी जाती हैं। जांच, चलन, रिकार्ड जुटाने में कितने लोगों का समय व सरकार के लाखों रुपए व्यर्थ जाते हैं। नेता को पता है कि अफसर ही उनसे सरकार चलवाते हैं वे भी तो इन अफसरों से क्या क्या करवाते हैं। नेताओं के काम करते करते खुद अफसरों पर पार्टी की मुहर लग जाती है। अगली सरकार फिर इन्हीं सांस्कृतिक रास्तों पर जलवा दिखाती चलती है। सरकार बदलने पर दिमाग में कितना हलवा हुआ होता है। जिन पर केस चले होते हैं, स्टोरनुमा विभाग में बिठाए हुए होते हैं वे इंतज़ार में होते हैं कब सूरज निकले और वे प्रतिभा का जलवा दिखाएं। नेताजी इस बात को दिमाग से मानते हैं कि जब सरकार उनकी थी तो मनमानी करना उनका अधिकार था लेकिन अब जो सरकार में मंत्री और संतरी हैं वे इतनी या उनसे ज़्यादा मनमानी न करें। उन्हें भूल जाता है कि बड़ी मुश्किल से सरकार बनती है। 

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कई दशकों से कितना कुछ दांव पर लगाकर मंत्री बनने का सपना पूरा होता है तो उनका ब्यान ज़रूर आता है, जबसे नई सरकार बनी है अफसरशाही की मनमानी बढ़ गई है। अफसर सवैंधानिक पदों का ख्याल नहीं रख रहे जैसे उनके जमाने में तो रख रहे थे। ऐसा बयान उन्हें लोकतंत्र की इज्ज़त बचाने के लिए देना पड़ता है। वैसे सभी नेता संविधान का बहुत ख्याल रखते हैं। हर निवृत सरकार के नुमाइंदे मौजूदा सरकार से परेशान होते हैं। वे हमेशा यही कहेंगे कि इन्हें सरकार चलानी नहीं आती, यह गलत हैं, इनके नेता, मंत्री और अफसर भ्रष्ट हैं, हर मामले में राजनीति है, जनता को उपेक्षित कर रखा है, इनके भाषण झूठ के पुलिंदे हैं। राजनीतिक विपदाओं को प्राकृतिक विपदा बना दिया जाता है। पहले ऐसा बिलकुल नहीं होता था। इन नेताओं ने जब अपना लोकतंत्र चलाया तो अपनी पसंद के अफसर चुनते थे तब ईमानदारी के अच्छे दिन थे। अब क्या हो गया। कहीं दाल में पानी पानी, कहीं दाल में काला काला। 

-संतोष उत्सुक