चलो बैलेंस करते हैं (व्यंग्य)

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
  •  नवंबर 19, 2020   18:37
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चलो बैलेंस करते हैं (व्यंग्य)

पिछले कई वर्षों से देख रहा हूँ कि उसका निर्माण अधूरा ही है। जो भी हो इतनी बड़ी बिल्डिंग का अधूरा रूप देखने मात्र से मेरी आँखें चौंधिया जाती थीं। जब कोई इतनी बड़ी बिल्डिंग बना रहा है तो हो न हो आने वाले दिनों में मेरी जेब से पैसे जरूर वसूलेगा।

एल.बी. नगर के डी मार्ट शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के पास बने फ्लाइ ओवर पर बाइक चलाने का मजा ही कुछ और है। एक समय था जब इस फ्लाइ ओवर के न बनने से ट्राफिक के चलते बाइक के साथ मेरा भी कचूमर निकल जाता था। आधा पेट्रोल तो सिग्नल पार करने में लग जाता था। ऊपर से थकान अलग। एल.बी. नगर से वनस्थलीपुरम चेकपोस्ट जाने के लिए फ्लाइ ओवर पर चढ़ना जरूरी था। बाइक लेकर फ्लाइ ओवर पर दौड़ाते समय नीचे की ओर देखने पर एक अलग तरह की खुशी मिलती थी। ऊँचाई से ढलान की ओर देखने का मजा ही कुछ होता है। इसी क्रम में मेरी नज़र एक बहुत बड़ी बिल्डिंग पर पड़ी।

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पिछले कई वर्षों से देख रहा हूँ कि उसका निर्माण अधूरा ही है। जो भी हो इतनी बड़ी बिल्डिंग का अधूरा रूप देखने मात्र से मेरी आँखें चौंधिया जाती थीं। जब कोई इतनी बड़ी बिल्डिंग बना रहा है तो हो न हो आने वाले दिनों में मेरी जेब से पैसे जरूर वसूलेगा। मेरे मन में रह-रह कर तरह-तरह के ख्याल आने लगे कि वह किस तरह पैसे वसूलेगा। उसमें सिनेमा हॉल, शॉपिंग कॉम्पलेक्स, खाने-पीने की दुकानें खुलेंगी तब मैं भी तो जाऊँगा! यह सब सोच-सोच कर मेरा मन कभी उसमें सिनेमा देखने के बहाने तो कभी कपड़ों की शॉपिंग के नाम पर भटकने लगा। कभी ऐसा लगता कि मानो उसे मैंने अभी से पोस्ट डेटेड चेक दे दिये हों।

कुछ देर बाद इसी घटना का जिक्र अपने मित्र से किया। उसे उस बिल्डिंग के बारे में बताया। मैं आपको बता दूँ कि मेरा मित्र भौतिक रूप में दिखायी नहीं देता। वह सिर्फ मेरा खयाली मित्र है। मैं उससे अपनी सारी बाते साझा करता हूँ। हो सकता है कि यह आपको कोई मानसिक बीमारी लगे। अब है तो है। इसे यूँ बदल तो नहीं सकता। इसीलिए मैं कभी अकेला महसूस नहीं करता।

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मैंने अपने काल्पनिक मित्र से कहा – देखा न! मेरे जेब के चंद पैसे किस तरह से उससे बिल्डिंग बनवाने पर मजबूर कर रहे हैं। काल्पनिक मित्र भी कहां कम था। उसने तुरंत पलट कर पूछा– इस तरह सोचने से तुम्हें क्या मिलता है? मैंने कहा– शांति! यदि मैं केवल एक तरफा सोचूँगा तो मुझमें तनाव उत्पन्न होगा। इसलिए दोतरफा सोचता हूँ। इससे तनाव की कोई संभावना ही नहीं बचती। यह कला मैंने जीवन भर शांति प्राप्त करने के लिए सीखी है।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त'







वफादारी अगर वैक्सीन सी हो जाए तो (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  जनवरी 25, 2021   15:30
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वफादारी अगर वैक्सीन सी हो जाए तो (व्यंग्य)

इतिहास मानता है उनमें आम लोग ही नहीं ख़ासम खास लोगों से भी ज्यादा वफादारी साबित हुई है। वफादारी ने हर युग में कुछ भी करवाने का साहस दिखाया है, वैसे इस बहाने वफादारों का ख्याल रखने वालों में भी बढ़ोतरी हुई है।

चिर प्रतीक्षित, आदरणीय वैक्सीनजी ने अपने लावलश्कर के साथ पहुंचकर जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। तालियां और थालियां बजने को बेकरार हैं । लोकतंत्र की फ़िज़ा में खुशनुमा ख़बरें बर्फ के मनोरम फाहों की तरह उतर रही हैं, पृष्ठभूमि में मंगलगीत सुना जा सकता है, ‘वैक्सीनजी आ गई हैं तो नूर आ गया है’। एक महा वायरस धकेलने में ट्वेंटी ट्वेंटी हो गया, दबाव बकाया है और इधर पक्षियों ने डराना शुरू कर दिया है। मुर्गों और बतखों को भूल भी जाएं लेकिन ख़बरों के बदलाव बताते हैं कि वफादारी के लिए जाने जाने वाले प्रसिद्द प्राणी से भी डरने का वक़्त आ गया है। बताते हैं उधर खासे लोग अभी भी महामारी की छाया से डरे बैठे हैं। पता नहीं यह गोरखधंधा है या सिर्फ धंधा, उन्हें लग रहा है कि कहीं पागल कुत्तों की वजह से वह वायरस की चपेट में न आ जाएं। बताते हैं वेटेनरी कोरोना वैक्सीन की बिक्री भी कई गुना बढ़ गई है। दिलचस्प यह है कि इतिहास रचने वाले कोरोना से इसका कोई लेना देना नहीं है लेकिन बेचारी वफ़ादारी की परेशानी बढती जा रही है।

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डर वास्तव में चुम्बकीय वस्तु होती है, इसी डर ने इंसान, वेटेनरी वैक्सीन और चिकित्सक को मिला दिया है। कुत्ता यानि वफादारी पालने का शौक या मज़बूरी रखने वालों को खौफ के साए में जाना स्वाभाविक रहा, तभी तो इन भ्रांतियों ने ज़िंदगी की गलियों में घूमना शुरू कर दिया है कि कुत्तों से भी कोरोना हो सकता है। इतिहास मानता है उनमें आम लोग ही नहीं ख़ासम खास लोगों से भी ज्यादा वफादारी साबित हुई है।  वफादारी ने हर युग में कुछ भी करवाने का साहस दिखाया है, वैसे इस बहाने वफादारों का ख्याल रखने वालों में भी बढ़ोतरी हुई है। बजट की पुरानी दिलचस्पियों  में दर्ज है, एक बार बड़ी सरकार ने कुत्तों को खिलाए जाने वाले बिस्कुटस के दाम भी कम कर दिए थे। इन बिस्कुटों को भी तो व्यवहारिक वफादारी का ठोस प्रतीक माना जा सकता है। उस समय में लोगों ने कुत्ते ज़्यादा पालने शुरू किए होंगे तो वफादारी में भी उछाल आया होगा। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि इसी किस्म के बिस्कुट या अन्य खाद्य, बेवफा इंसानों को नियमित अंतराल पर खाने को दिए जाएं तो समाज में वफ़ा और वफादारी का प्रचलन बढ़ सकता है। पड़ोसियों में सदभाव बढ़ सकता है, आपसी झगड़े कम हो सकते हैं। पुलिस की सामाजिक परेशानियां कम हो सकती हैं।

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किसी भी किस्म की वैक्सीन, बीमारी या संक्रमण से तो बचा सकती है लेकिन एक बार वफ़ा के बीजों से पौधे उगने शुरू हो गए तो कुत्तों की कद्र के साथ उनको पालने वालों का सम्मान भी खूब बढ़ सकता है। बस ख्याल ज़रूर रखना पड़ेगा कि बदलते वक़्त के साथ कहीं जानवर, इंसानी गुण इख़्तियार न कर ले। ऐसा हो गया तो जानवरों में बची खुची वफादारी, जानवरीयत का भी ख़ासा बड़ा नुक्सान कर सकती है। वफादारी की ज़रूरत तो पूरी ईमानदारी से बेवफाई करने वालों को भी रहती है। एक सैनिटाइज्ड सवाल यहां प्रवेश करना चाहता है कि क्या हमें किसी भी किस्म की वैक्सीन में वफादारी के साथ वफ़ादारी की वैक्सीन की भी ज़रूरत है या नहीं।  

संतोष उत्सुक







सुरक्षा विभाग के उचित सुरक्षा निर्देश (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  जनवरी 21, 2021   15:35
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सुरक्षा विभाग के उचित सुरक्षा निर्देश (व्यंग्य)

सुरक्षा अधिकारी ने परामर्श दिया कि सारे जेवरात साथ ले जाएं या फिर बैंक लाकर में रख दें। हां नकली गहने छोड़कर जा सकते हैं, जिन्हें चुराकर चोर दुख पाएंगे। यह बिलकुल सच बताया कि सर्दी के मौसम में चोरी व सेंध की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

विकास और विनाश पक्के यारों की तरह मज़े ले रहे होते हैं उधर असुरक्षा ज़िंदगी के खेत में पड़ी पराली में आग लगा रही होती है। समझदार नागरिकों को अधिक जागरूक करने के लिए, शहर के ज़िम्मेदार सुरक्षा विभाग ने नागरिक सुरक्षा समिति की बैठक की, हालांकि स्थायी ट्रेफिक जाम, अनुचित समय और मास्क न होने के कारण कम लोग आए। खूबसूरत हाल में मंच बढ़िया ढंग से सजाकर फ़्लेक्स का नष्ट न होने वाला बढ़िया बैनर लगाया गया । बैनर अंग्रेज़ी में लिखवाया गया क्योंकि हिन्दी मास जा चुका था। बिना लाल बत्ती वाली उदास गाड़ी में पधारे असली वीआईपी का ताज़ा फूलों से स्वागत किया गया जो नए पालिथिन में लिपटे हुए थे। क्षेत्र में पहली बार आयोजित इस बैठक में नागरिकों को समझाया गया, यदि आप किसी बेहद ज़रूरी काम से घर से बाहर जा रहे हैं तो इस बार बढ़िया सेंसर लॉक ज़रूर लगवा कर जाएं, आपका घर बेहद सुरक्षित रहेगा। लॉक कंपनी का बैनर हाल में लगाया हुआ था, लगा सुरक्षा विभाग के कर्मचारी का बेटा सुरक्षा उपकरणों में डील करता होगा।

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सुरक्षा अधिकारी ने परामर्श दिया कि सारे जेवरात साथ ले जाएं या फिर बैंक लाकर में रख दें। हां नकली गहने छोड़कर जा सकते हैं, जिन्हें चुराकर चोर दुख पाएंगे। यह बिलकुल सच बताया कि सर्दी के मौसम में चोरी व सेंध की घटनाएं बढ़ जाती हैं। यह राज़ खोल दिया गया कि पिछले साल छोटे से क्षेत्र में ही चोरी के डेढ़ दर्जन से ज़्यादा मामले दर्ज हुए। रिकार्ड के मुताबिक पिछले साल चोरों ने अनेक घरों से पचास लाख रूपए से ज़्यादा के गहने चुराए थे। उन्होंने यह नहीं माना कि चोर भी इंसान हैं उनके पास भी परिवार और पेट दोनों हैं, उनका व्यवसाय चोरी है जिसे उन्हें ईमानदारी व मेहनत से चलाना है। यह स्वीकार किया कि वह गहने आज तक नहीं मिले हैं हालांकि सीमित स्टाफ और कम सुविधाओं के बावजूद तप्तीश ईमानदारी से जारी है। वैसे तो नकली गहने पहनना ज्यादा सुरक्षित है या फिर पुरातन काल की तरह फूल पत्तियां पहनना शुरू कर, खुद को प्राचीन भारतीय संस्कृति से जुड़ा महसूस कर सकते हैं । 

उन्होंने आग्रह किया कि चोरी की घटनाएं न हों तो सुरक्षा विभाग भी फालतू में परेशान न होगा। सूचित किया कि ऑन लाइन सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाने बारे शीघ्र निर्णय लिया जाएगा। यह भी सुझाया कि आम लोग अगर उनके सुझावों पर अमल करेंगे तो पछताना नहीं पड़ेगा, बात तो ठीक है, मगर चोरी होने के बाद तो पछताना ही पड़ेगा। सुरक्षा विभाग की सलाह के अनुसार घर से बाहर जाते समय पड़ोसी को सुरक्षित तरीके से ज़रूर बताकर जाएं। अगर उन्हें आपके बाहर होने की सूचना नहीं होगी तो घर में चोर के घुसने की स्थिति में पड़ोसी सोचेंगे कि घर में आप ही होंगे। कभी कभार पड़ोसी को चाय, बिस्किट और नमकीन की सादा दावत देने में बहुत फायदा है। आजकल तो वैसे भी कोई नहीं आएगा। इस विशेष सलाह पर अमल करने से पड़ोसी से अच्छे रिश्तों का विकास होगा, कभी आपको भी पड़ोसियों के काम आने का मौका मिलेगा, जो उन्हें भी अच्छा लगेगा।

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व्यक्तिगत सुरक्षा, गलत पार्किंग, सड़क के दोनों तरफ फुटपाथ न होने, दोपहिया वाहनों की दहशत भरी ड्राइविंग बारे गलती से पूछा तो मार्गदर्शन किया, कृपया इस बारे ऑनलाइन चैक कर लें, यह विशेष बैठक, सर्दियों के मौसम में होने वाली सिर्फ संभावित चोरियों के मामले में आयोजित की गई है। हमारे विभाग में अलग अलग सेक्शन है जो आवश्यकतानुसार, उचित समय पर ज़रूरी बैठक कर प्रेस विज्ञप्ति देते हैं। वैसे काम करने का यही सही तरीका है। यह बैठक बेहद सफल रही ऐसा अगले दिन समाचार पत्रों में छपी रिपोर्ट विद फोटो से पता चला। लोकतान्त्रिक सत्य जमा रहा कि सुरक्षा विभाग के पास आम नागरिकों की सुरक्षा के अतिरिक्त और भी बहुत से ज़रूरी राजनीतिक, धार्मिक व सामाजिक काम हैं, क्यूंकि अब यही उनकी असली ड्यूटी है। 

- संतोष उत्सुक







यूँ बुलबुलाते और फट जाते हैं (व्यंग्य)

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
  •  जनवरी 19, 2021   20:09
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यूँ बुलबुलाते और फट जाते हैं (व्यंग्य)

रात को अलार्म ऐसे लगा रखा था जैसे सुबह होते ही विश्वविजेता बनने के लिए सिकंदर की तरह कूच करना है। अब भला आपको क्या बताएँ कि घर का कुत्ता मौके-बेमौके भौंक देता है तो मैं उसको चुप नहीं करा पाता और चला था नए प्रण निभाने।

मैंने प्रण किया कि कल से अक्खी जिंदगी की लाइफ स्टाइल बदलकर रख दूँगा। देखने वाले देखते और सुनने वाले सुनते रह जायेंगे। वैसे भी मैं दिखाने और सुनाने के अलावा कर ही क्या सकता हूँ। सरकार ने रोजगार के नाम पर ज्यादा कुछ करने का मौका दिया नहीं, और हमने खुद से कुछ सीखा नहीं। हिसाब बराबर। कहने को तो डिग्री तक पढ़ा-लिखा हूँ लेकिन जमीनी सच्चाई बयान करने की बारी आती है तो इधर-उधर ताकने लगता हूँ। सो मैंने मन ही मन ठान लिया। अब कुछ भी होगा लेकिन पहले जैसा नहीं होगा। कल से सब कुछ नया-नया। एकदम चमक-धमक वाली जिंदगी। कल मेरा ऐसा होगा जो पहले जैसा कभी न होगा। बस जीवन में कल-कल होगा। कल से याद आया कि हिंदी वैयाकरणशास्त्री की मति मारी गई थी जो उन्हें भूत और भविष्य के लिए केवल एक ही शब्द मिला था– ‘कल’। कल के चक्कर में कल तक भटकता रहा। देखने वालों ने गालिब हमें पागलों का मसीहा कहा। अब यह मसीहा बदलना चाहता है तो कम्बख्त नींद भी किश्तों में मिलने लगी है। क्या करें बार-बार मधुमेह की बीमारी के चलते शौचालय के दर्शन जो करने पड़ते हैं।

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रात को अलार्म ऐसे लगा रखा था जैसे सुबह होते ही विश्वविजेता बनने के लिए सिकंदर की तरह कूच करना है। अब भला आपको क्या बताएँ कि घर का कुत्ता मौके-बेमौके भौंक देता है तो मैं उसको चुप नहीं करा पाता और चला था नए प्रण निभाने। यह अलार्म शब्द जिसने भी रखा है वह कहीं मिल जाए तो उसकी अच्छे से खबर लूँ। जब भी गाढ़ी नींद में रहता हूँ तभी अल्लाह-राम (शायद प्रचलन में यही आगे चलकर अलार्म बन गया होगा) की अजान और मंदिर की घंटी बनकर बज उठता है। मुझे आभास हुआ कि जो घरवालों की डाँट-डपट से उठने का आदी हो चुका हो उसे दुनिया के अलार्म क्या उठा पायेंगे।

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जैसे-तैसे सुबह उठा तो देखा कि सूरज अभी तक आया नहीं है। मैंने आव देखा न ताव एक बार के लिए घरवालों की क्लास लगाने के बारे में सोचा। तभी बदन को तार करने वाली ठंडी ने अहसास दिलाया कि ये तो सर्दी के दिन हैं। सूरज दादा वर्क फ्रॉम होम की तर्ज पर बादलों की ओट से छिप-छिपकर ड्यूटी किए जा रहे हैं। मैंने सोचा जिस सूरज दादा की फिराक़ में लोग आस लगाए जीते हैं वे ही साल के चार महीने सर्दी और चार महीने बारिश के चक्कर में छिप-छिपकर रहते हैं। और मात्र चार महीने गर्मी के दिनों में अपनी चुस्त-दुरुस्त ड्यूटी देकर हमारा आदर्श बने बैठे हैं। उनसे ज्यादा तो ड्यूटी मैं ही कर लेता हूँ। इस हिसाब से देखा जाए मुझे नए प्रण लेने की आवश्यकता ही नहीं है। वैसे भी न जाने कितने मोटे लोग दुबले बनने की, न जाने कितने काले लोग गोरे बनने की, न जाने कितने जड़मति बुद्धिमति बनने की कोशिश करने के चक्कर में पानी पर प्रण के लकीरें खींचते रहते हैं। उनमें हम भी एक सही। वैसे भी–

पानी के बुलबुलों-सी सोच हमारी, यूँ बुलबुलाते और फट जाते हैं।

जैसे नींद में खुद को शहंशाह और, सुबह होते ही कंगाल पाते हैं।।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त







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